
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में तीन न्यायाधीशों की पीठ कोलकाता रेप-मर्डर कांड की सुनवाई कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इस कांड का स्वत: संज्ञान लिया है। पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी की सरकार और पुलिस को खूब फटकार लगाई है और उनकी भूमिका पर कई सवाल उठाए हैं। बेशक संदर्भ कोलकाता अस्पताल में एक युवा प्रशिक्षु डॉक्टर के साथ बर्बर बलात्कार और बाद में हत्या का है, लेकिन शीर्ष अदालत का सरोकार राष्ट्रीय है। विशेषकर अस्पतालों में महिला डॉक्टर और नर्स आदि कैसे सुरक्षित रहें, इसके मद्देनजर एक टास्क फोर्स बनाने और अस्पतालों की सुरक्षा केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) को सौंपने के महत्वपूर्ण फैसले सुनाए गए हैं।
मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी देशवासियों की आत्मा में लगातार गूंजती रहनी चाहिए कि बदलाव के लिए देश एक और दुष्कर्म और हत्या का इंतजार नहीं कर सकता। टास्क फोर्स को अपनी अंतरिम रपट तीन सप्ताह में देनी है और अंतिम रपट दो माह की अवधि में देनी है। फोर्स महिला सुरक्षा के उपाय सुझाएगी। गौरतलब यह है कि ‘निर्भया कांड’ के एक साल बाद पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता में सख्त ‘पॉक्सो एक्ट’ बनाया गया। उसके बाद ‘पॉश’ (प्रिवेंशन आॅफ सेक्सुअल हैरेसमेंट आॅफ वूमन एट वर्कप्लेस) एक्ट बनाया गया। फांसी की सजा का प्रावधान रखा गया। क्या इन कानूनों ने दुष्कर्मियों को डराया? हमारी व्यवस्था में कई विसंगतियां हैं। करीब 2.43 लाख केस फास्ट ट्रैक कोर्ट में लंबित पड़े हैं। इनमें पोक्सो केस भी हैं।
हर रोज दुष्कर्म के केस आ रहे हैं और सरकारें फास्ट टै्रक कोर्ट के आश्वासन देती रहती हैं। पीड़िता को इंसाफ मिलना बहुत दूर की कौड़ी है। बहरहाल अब मौजूदा संदर्भ में सर्वोच्च अदालत के अंतिम फैसले की प्रतीक्षा है, लेकिन आदमी की ‘पाशविक हवस’ अब दरिंदगी की हदें भी पार कर चुकी है। हम दुष्कर्मियों, हत्यारों को इंसान नहीं मान सकते, वे ‘जानवर’ से भी अधिक खौफनाक हैं। अब हालात ये बन गए हैं कि बेशक बेटी 3-4 साल की हो और स्कूल जाना शुरू ही किया हो। बेटी बड़ी होकर कॉलेज में पढ़ती हो अथवा गहन पढ़ाई करके डॉक्टर बनी हो और एक सरकारी अस्पताल में कार्यरत हो।
बेटी कहीं जाने के लिए राज्य परिवहन की बस में बैठी हो या बाजार में किसी काम से गई हो। उम्र 60 पार कर चुकी हो और विधवा महिला हो! अब ऐसी बेटियां, नाबालिग या बालिग लड़कियां अथवा उम्रदराज विधवा महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। वे सामूहिक दुष्कर्म का शिकार हो रही हैं। आखिर यह देश कैसा बन गया है? कोई भी राज्य इन जघन्य, बर्बर अपराधों से अछूता नहीं है। अभी तो सर्वोच्च अदालत के सामने वे ही तथ्य और आंकड़े आएंगे, जो पुलिस ने दर्ज किए होंगे। जिन्हें डर, खौफ के कारण दर्ज नहीं कराया गया अथवा पुलिस ने टालमटोल कर अपराध पर मिट्टी डाल दी, उन अपराधों का संज्ञान कौन लेगा?
9 अगस्त 2024 को बंगाल से लेडी डॉक्टर से रेप और मर्डर का मामला उठा था और उसके बाद सोशल मीडिया पर हर जगह उनके लिए इंसाफ की गुहार लगी। घटना ने इंसानियत को ऐसे झकझोरा कि हर किसी को 2012 में निर्भया के साथ हुई वीभत्सता की याद आ गई। तुलना करते हुए कहा जाने लगा कि इतने साल बीत गए लेकिन समाज के हालात बिलकुल नहीं बदले हैं। आज भी जब बलात्कार का मुद्दा हर जगह गरमाया हुआ है उस समय भी किसी किसी जगह कहीं महिला को कोई हैवान अपना निशाना रहा है। न छोटी बच्ची को छोड़ा जा रहा है न ही बुजुर्ग महिला को। मौका मिलते ही लड़कियों को दबोचा जा रहा है और फिर वहशियत की हर हद पार हो रही है।
बहुत पीछे न जाएं और ये सोचें कि 9 अगस्त की घटना के बाद तो जैसे विरोध हो रहा है उससे इन घटनाओं में कमी आई होगी तो ऐसा बिलकुल भी नहीं है। हर रोज दरिंदगी की नई सीमा तय होती है। बदलापुर से आज एक शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है। चार साल की दो बच्चियों का यौन शोषण उनके ही स्कूल के सफाईकर्मी ने किया। बच्चियाँ उस सफाईकर्मी को ‘दादा’ कहती थीं, उन्हें अपना परिचित समझती थीं, लेकिन उस जानने वाले ने उनके साथ क्या किया। मौका मिलते ही कपड़े उतारकर उनके निजी अंगों को छूने का काम किया, उनका शोषण किया। इस घटना से कुछ दिन पहले 16 अगस्त 2024 राजस्थान के सिरोही जिले के आबूरोड रीको थाना क्षेत्र में एक 63 वर्षीय महिला का घर में घुसकर सामूहिक रेप किया गया था। रिपोर्ट्स में बताया गया था कि आरोपित घर में घुसे तो लूटपाट के लिहाज से थे लेकिन महिला को देख उन्होंने उसके साथ बारी-बारी रेप कर लिया।
शर्म की बात है कि हम उस समाज का हिस्सा हैं जहां न छोटी बच्ची सुरक्षित है, न स्कूल-कॉलेज जाती लड़कियां और न घर में अकेले रहने वाली बुजुर्ग…महिलाओं पर यौन दुराचार के मामले पहले भी बढ़ रहे थे और आगे भी बढ़ेंगे…कारण हमारी ऐसे मामलों को हैंडल करने की अप्रोच है, ढीला रवैया है और घृणित मानसिकता है। 2012 के नई दिल्ली के ‘अमानवीय’ निर्भया कांड के बाद भी 3.33 लाख दुष्कर्म किए गए हैं, जबकि 1971-2022 के लंबे कालखंड में 8.23 लाख दुष्कर्म के केस दर्ज किए गए थे। दुष्कर्म किस गति और अनुपात से बढ़ रहे हैं, आश्चर्य होता है। क्या देश में बेटियां, बहनें और महिलाएं सिर्फ ‘दुष्कर्म की वस्तु’ बनकर रह गई हैं? क्या अब वे ‘देवी’ नहीं रहीं?
रेप की इन घटनाओं ने देश के सामने सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर सभ्य कहलाए जाने वाले समाज में यह सब क्यों हो रहा है, क्यों अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं। क्यों किसी को पुलिस और कानून का खौफ नहीं रह गया है। ऐसी घृणित वारदातों के बाद देश की लगातार बिगड़ती छवि के लिए आखिर किसकी जिम्मेदारी तय की जाएगी। कब तक सरकारें अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ती रहेंगी। सरकारों का काम क्या सिर्फ कानून बनाने तक सीमित रह गया है। सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीशों ने ऐसे हालात, परिवेश, अपराधों पर चिंता जताई है। उससे क्या होगा? कल ही 32 लंबे सालों के बाद औरतों को इंसाफ मिला है-आधा, अधूरा।
1992 में 100 लड़कियों के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया था। विशेष अदालत ने सिर्फ 6 अपराधियों को आजीवन कारावास की सजा दी है। मौजूदा संदर्भों में क्या न्याय मिलेगा, देखते हैं। इस मुद्दे पर हो रही घिनौनी राजनीति भी बंद होनी चाहिए। यह मसला बहनों और बेटियों की अस्मिता से जुड़ा है। सारे समाज को मिलकर इस बुराई और बुरी प्रवृत्ति के खिलाफ खड़ा होना होगा।
इसमें दो राय नहीं कि चिकित्सा वर्ग की सुरक्षा व संरक्षा की मांग तार्किक है, जिसे नजरअंदाज नहीं ही किया जाना चाहिए। रात-दिन मुश्किल हालात में अपने दायित्वों का निर्वहन करने वाले डॉक्टरों को जिन संकटों से गुजरना पड़ता है, उसको लेकर चिंता होना वाजिब ही है।


