नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक अभिनंदन और स्वागत है। आज सरकारें चाहे जितना दावा कर लें मगर, गरीबी तो गरीबी है जनाब! उसे कोई नहीं मिटा रहा। देश को आजाद होने का दंभ 1947 भरने वाले नेता गरीबी मिटा रहे हैं मगर, गरीबी तो नहीं मिट रही अलबत्ता गरीब जरूर मिटते जा रहे हैं।
देने वाले किसी को गरीबी न दे मौत दे दे मगर बदनसीबी न दे… ये गाना तो फिलहाल साल 1960 में बनी फिल्म पतंग का है। इस गाने में आवाज स्वर कोकिला लता मंगेशकर की है। ये तो रही रील स्टोरी की जानकारी।
अब हम बात कर रहे हैं एक ऐसे रीयल स्टोरी की जिसे पढ़कर आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ेगा। यकीन नहीं आ रहा तो पूरी रीयल स्टोरी को ध्यान से पढ़कर सोचिएगा। यह घटना आखिर कहती क्या है। एक लाचार बेबस बाप जहर लाकर खुद भी खा लेता है और पढ़ने लिखने वाली होनहार बेटी को भी माहुर खिलाकर जिंदगी खत्म कर लेता है। यह फैसला कितना कठिन रहा होगा।
कहते हैं कि देने वाले किसी को गरीबी न दे मौत दे दे मगर बदनसीबी न दे… यह गाना आज गरीबों पर सटीक बैठ रहा है। मगर, शासन हो प्रशासन नेता हों या समाजसेवी उनके सिर पर जूं भी नहीं रेंगेगी। कोई फर्क नहीं पड़ता।
मामला वेस्ट उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले का है। बताया जा रहा है कि आर्थिक तंगी के चलते एक बाप इतना अधिक लाचार हो गया कि अपनी लाड़ली बेटी की पढ़ाई जब पूरी नहीं कर पाया तो बेबस पिता ने बेटी के साथ मिलकर माैत का सफर तय कर लिया।


