
हाल ही में एक फिल्म आई है छोरी-2, जो भ्रूण हत्या जैसे संवेदनशील विषय पर बात करती है। इस फिल्म ने एक बार फिर भ्रूण हत्या को चर्चा में ला दिया है। कन्या भ्रूण हत्या और शिशु हत्या ऐसी सामाजिक बुराई है, जिसके आंकड़े न केवल डरावने हैं, बल्कि समाज को झकझोरने वाले भी हैं। भारत सरकार के आंकड़ों के आधार पर प्यू रिसर्च सेंटर की एक रिपोर्ट कहती है कि 2000 से 2019 तक भारत में कम से कम 90 लाख कन्या भ्रूण हत्याएं हुर्इं। इनमें से 86.7 फीसदी हिंदुओं (80 फीसदी आबादी), 4.9 प्रतिशत सिखों (1.7 फीसदी आबादी) और 6.6 फीसदी मुस्लिमों (14 प्रतिशत आबादी) में दर्ज की गर्इं। हालांकि पुत्र वरीयता में कमी आई है, फिर भी लिंग-चयनित गर्भपात जारी हैं।
भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार, 0-6 वर्ष आयु वर्ग में लिंग अनुपात 914 लड़कियां प्रति 1,000 लड़के था, जो 1991 में 945 से कम है। वहीं संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट की एक रिपोर्ट कहती है कि पिछले 50 वर्षों में विश्व में लापता महिलाओं की संख्या में भारत का योगदान 4.58 करोड़ है, जिसमें कन्या भ्रूण हत्या और शिशु हत्या मुख्य कारण हैं। भारत और चीन मिलकर हर साल 15 लाख लापता कन्या जन्मों के लिए 90-95 फीसदी जिम्मेदार हैं। इधर, द लैंसेट की दो रिपोर्ट बताती हैं कि 1981 से 2016 तक 21 लाख जन्म इतिहास के विश्लेषण से पता चला कि लिंग-चयनित गर्भपात के कारण लापता कन्या जन्म बढ़े हैं। भारत का जन्म लिंग अनुपात 110 पुरुष प्रति 100 महिलाएं हैं, जो भ्रूण हत्या की ओर इशारा करता है, जबकि इसका वैश्विक औसत 101 महिलाएं है। द लैंसेट की दूसरी रिपोर्ट कहती है कि हर साल 2.39 लाख अतिरिक्त बालिका मृत्यु (5 वर्ष से कम) दर्ज की जाती हैं, जो मुख्य रूप से उपेक्षा और कुपोषण के कारण होती हैं, न कि प्रत्यक्ष शिशु हत्या के।
वहीं राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो का डाटा बताता है कि देश में 2022 में 63 शिशु हत्या के मामले दर्ज किए गए, जिनमें महाराष्ट्र में सबसे अधिक 25 मामले थे। कन्या शिशु हत्या के विशिष्ट आंकड़े अलग से नहीं दिए गए। यह संख्या वास्तविकता से बहुत कम हो सकती है, क्योंकि कई मामले उपेक्षा या भुखमरी के रूप में दर्ज नहीं होते। असल में कन्या भ्रूण हत्या के सटीक आंकड़े अनुमान पर आधारित हैं, क्योंकि अवैध गर्भपात दर्ज नहीं होते। शिशु हत्या के मामले भी कम दर्ज होते हैं, क्योंकि इन्हें अक्सर मृत जन्म या प्राकृतिक मृत्यु के रूप में दिखाया जाता है। क्षेत्रीय भिन्नताएं हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड जैसे राज्यों में गंभीर लिंग असंतुलन स्थिति की भयावहता को दशार्ते हैं।
उत्तराखंड में 2019 में 132 गांवों में तीन महीने तक कोई कन्या जन्म नहीं हुआ, जिसने भ्रूण हत्या की आशंका को बहुत हद तक बढ़ाया। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि लड़कियों के प्रति इस नकारात्मक स्वभाव के गंभीर सामाजिक और अन्य प्रभाव हो सकते हैं। बार-बार गर्भपात से औरतों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। उनका मानना है कि यदि महिलाओं की संख्या यूं ही घटती रही तो महिलाओं के खिलाफ हिंसात्मक घटनाएं बढ़ जाएंगी। शादी के लिए उनका अपहरण किया जाएगा, उनकी इज्जत पर हमले होंगे, उन्हें जबरदस्ती एक से अधिक पुरुषों की पत्नी बनने पर मजबूर भी किया जा सकता है। कुल मिलाकर लड़कियों की कम संख्या उनके सम्मानजनक जीवन जीने के अवसरों को कम कर देगी और उनसे जुड़ी कुप्रथाओं को बढ़ावा देगी। लड़कियों की कम संख्या के कारण कहीं-कहीं तो एक से अधिक पति होने की परंपराएं भी प्रचलित हैं। जब तक लड़कियों की संख्या कम है, तब तक बहु पति जैसी कुप्रथाओं को रोक पाना संभव नहीं है।
इस क्षेत्र में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि लड़कियों की संख्या घटने का एक कारण यह भी कि सरकारों के जनसंख्या नियंत्रण अभियानों में कमियां रही हैं और इसमें कई जबरदस्ती के पहलू भी शामिल हैं। वे कहते हैं कि आंध्र प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में सरकार ने दो से अधिक बच्चे रखने वाले माता-पिता को कुछ अधिकारों से वंचित किया है जैसे कि तीन बच्चों की मां को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती। यदि वह सरकारी कर्मचारी है, तो कई तरह के अवकाश नहीं मिलेंगे। तीसरे बच्चे के कारण कई सुविधाओं से वंचित कर दिया जाएगा। वहीं कन्या भ्रूण हत्या में बढ़ोतरी होने के बाद कई राज्यों में युवाओं को शादी के लिए लड़की नहीं मिल पा रही है, जिसके चलते नेपाल, पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के गरीब परिवारों की लड़कियों को खरीदकर बहू बनाया जा रहा है। दलालों को पैसे देकर लड़की खरीदने का यह सिलसिला दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। कन्या भ्रूण हत्या से लिंगानुपात बिगड़ रहा है, जिससे आने वाले समय में सामाजिक असंतुलन बढ़ता ही जाएगा।

