
एक थे पंडित जी! नाम था सज्जन प्रसाद। सज्जन, सदाचारी भी थे और ईश्वर भक्त भी, किंतु धर्म का कोई विज्ञान सम्मत स्वरूप भी है, यह वे न जानते थे। प्रतिदिन प्रात:काल पूजा समाप्त करके पंडित जी शंख बजाते। वह आवाज सुनते ही पड़ोस का गधा किसी गोत्रबंधु की आवाज समझकर स्वयं भी रेंक उठता। पंडित जी प्रसन्न हो उठते कि ये गधा जरूर कोई पूर्व जन्म का महान तपस्वी और भक्त है। एक दिन गधा नहीं चिल्लाया, पंडित जी ने पता लगाया मालूम हुआ कि गधा मर गया। गधे के सम्मान में उन्होंने अपना सिर घुटाया और विधिवत तर्पण किया। शाम को वे बनिए की दुकान पर गए। बनिये ने कहा, आज यह सिर घुटमुंड कैसा? अरे! भाई शंखराज की इहलीला समाप्त हो गई है। बनिया पंडित का यजमान था, उसने भी अपना सर घुटा लिया। बात जहां तक फैलती गई, लोग अपने सिर घुटाते गए। छूत बड़ी खराब होती है। एक सिपाही बनिये के यहां आया। उसने तमाम गांव वालों को सर मुड़ाए देखा, पता चला शंखराज जी महाराज नहीं रहे, तो उसने भी सिर घुटाया। धीरे-धीरे सारी फौज सिर-सपाट हो गई। अफसरों को बड़ी हैरानी हुई। उन्होंने पूछा-भाई बात क्या हुई। पता लगाते-लगाते पंडित जी के बयान तक पहुंचे और जब मालूम हुआ कि शंखराज कोई गधा था, तो मारे शरम के सबके चेहरे झुक गए। एक अफसर ने सैनिकों से कहा-ऐसे अनेक अंधविश्वास समाज में केवल इसलिए फैले हैं कि उनके मूल का ही पता नहीं है। धर्म परंपरावादी नहीं, सत्य की प्रतिष्ठा के लिए है, वह सुधार और समन्वय का मार्ग है, उसे ही मानना चाहिए।


