- 1985 के बाद बिजनौर लोकसभा में कांग्रेस जीत को तरसी
- इस बार जिले की दोनों सीटों पर कांग्रेसी के हिस्से में नहीं आई कोई सीट
बृजवीर चौधरी |
बिजनौर: भले ही कांग्रेस पार्टी देश की मुख्य विपक्षी पार्टी हो, लेकिन बिजनौर जिले में कांग्रेस का जनाधार गिर गया। हालात ये है कि 33 वर्ष से लगातार कांग्रेसी प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा पा रहे। वर्ष 1985 के बाद कोई कांग्रेसी बिजनौर लोकसभा सीट पर परचम नहीं लहरा सका। इस बार कांगे्रस सपा गठबंधन से चुनाव लड़ रही तो उसके हिस्से में बिजनौर जिले की कोई सीट हिस्से में नहीं आई।
आजादी के बाद देश के लोकसभा चुनाव 1952 में कांग्रेस ने परचम लहराया। बिजनौर लोकसभा में कांग्रेस के नमीशरण चुनाव जीते। इसके बाद 57 में कांग्रेस के अब्दुल लतीफ विजयी रहे। हालाकि वर्ष 1962 में निर्दलीय प्रत्याशी प्रकाशवीर शास्त्री ने कांग्रेस का तिलिस्म तोड़ दिया और जीत दर्ज की। वर्ष 1967 और 71 में फिर से बिजनौर सीट पर कांग्रेस के रामानंद शास्त्री चुनाव जीते। इसके बाद वर्ष 1974 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रामदयाल निर्विरोध सांसद भी चुने गए। इमरजेंसी के बाद बिजनौर लोकसभा सीट पर जनता पार्टी के महिलाल ने रिकार्ड मतों जीत दर्ज की।
1980 में जनता पार्टी एस के मंगलराम प्रेमी सांसद चुने गए। 1984 में कांगे्रस के गिरधारी लाल सांसद बने। इसके बाद 1985 में फिर से बिजनौर सीट पर उपचुनाव हुआ और मीरा कुमार कांग्रेस से सांसद बनी। इसके बाद कांग्रेस का ग्राफ लगातार गिरता गया। 1989 में बिजनौर सीट पर मायावती पहली बार बसपा से सांसद बनी और कांग्रेस की आशा चौधरी करीब एक लाख वोट लेकर तीसरे नंबर पर रही। रामलहर के चुनाव में कांग्र्रेस चौथे नंबर पर रही। आशा चौधरी कांग्रेस प्रत्याशी को 39738 मत मिले। वर्ष 1996 में बनवारी लाल को मात्र 6117 वोट ही मिले। वर्ष 1989 के बाद कोई कांग्रेसी अपनी जमानत नहीं बचा सका। इस बार कांग्रेस के हिस्से में जिले में कोई सीट नहीं आई।

