Wednesday, May 25, 2022
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विज्ञान और साहित्य के बीच पुल है ‘छूटा पीछे पहाड़’!

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इस पुस्तक की एक और महत्वपूर्ण बात है। इसमें आपको विज्ञान और साहित्य के ध्रुव दिखाई देंगे। ऐसा लगता है मानो लेखक इनके बीच कोई पुल बनाना चाहता है। यह किताब साहित्य की पिछली सदी के 7वें दशक की दुनिया देखने के लिए भी जरूरी है और इसलिए भी जरूरी है कि उस समय अनुसंधान की दुनिया में क्या हो रहा था। लेखन की अपनी शैली में भी देवेंद्र मेवाड़ी ने एक प्रयोग किया है। ऐसा आभास होता है कि वह पूरी कहानी ईजू (मां) को सुना रहे हैं। अध्याय समाप्त होने पर जब लेखक पूछता है कि आगे की कहानी बताऊं, तो ईजू हुंकारा सा भरते हुए कहती हैं…ओं। और कहानी आगे बढ़ जाती है।

पहाड़ आपको संयम सिखाता है, पहाड़ से आप विनम्रता सीखते हैं, प्रकृति से प्रेम का सबक भी पहाड़ ही देता है, मजबूती के साथ पहाड़ आपको अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा भी देता है, पहाड़ आपको जीवन जीने का ढंग सिखाता है, पहाड़ से आप प्रेम करना, कविताएँ-कहानियां लिखना सीखते हैं, पहाड़ आपको तार्किकता और विज्ञान की समझ भी देता है। पहाड़ कभी आपका साथ नहीं छोड़ता। वह आपके अवचेतन में हमेशा जीवित रहता है। पहाड़ कभी पीछे नहीं छूटता। वरिष्ठ लेखक और विज्ञान कथाकार देवेंद्र मेवाड़ी की पुस्तक ‘छूटा पीछे पहाड़’ (संभावना प्रकाशन, हापुड़) वास्तव में जीवन यात्रा वृतांत है। इसे आप देवेंद्र मेवाड़ी का आत्मकथात्मक आख्यान भी कह सकते हैं।

इस पुस्तक की पहली कड़ी के रूप में आप उन्हीं की लिखी ‘मेरी यादों का पहाड़’ पढ़ सकते हैं। आत्मकथा या आत्मकथात्मक आख्यान पढ़ते समय मेरे जेहन में हमेशा यह बात आती है, कि मुझे इसे क्यों पढ़ना चाहिए, मुझे इस किताब से क्या मिलेगा, लेखक जो जीवन जी चुका है, उसके बारे में जानकर मैं क्या करूंगा! लेकिन देवेंद्र मेवाड़ी की पुस्तक ऐसे ही बहुत से सवालों के जवाब देती है।

भौजी का आशीर्वाद लेकर देबी (देवेंद्र मेवाड़ी) एक युवक, अपनी बड़े भाई के साथ ओखलकांडा से नैनीताल पहुंच जाता है। आँखों में बहुत से सपने लिए, विज्ञान और साहित्य एक साथ साधने की इच्छा लिए। कॉलेज में उसका एडमिशन हो जाता है। पढ़ाई शुरू होती और शुरू होता है जीवन का चक्र। यहां वह युवक पहाड़ों, पशुओं, पेड़ों और प्रकृति के बीच अपने लक्ष्य निर्धारित करता है। बहुत कुछ सीखने को मिलता है। यायावरी, स्विमिंग, घुड़सवारी, एनसीसी और डांसिंग। बहुत से मित्र मिलते हैं। मन के साथ-साथ शरीर भी अनुशासन का पाठ पढ़ता है।

साहित्य में युवक की गहरी रुचि है। शायद यहीं से उन्हें साहित्य और विज्ञान को एक साथ साधने की प्रेरणा मिलती है। यहीं उनकी मुलाकात लक्ष्मण सिंह बटरोही से होती है। बटरोही जी उन्हें खूब प्रेरित करते हैं। समय का चक्र घूमता रहता है। वह युवक बीएससी पास कर लेता है। नैनीताल में पढ़ने वाले छात्रों के बीच प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने की बहुत इच्छा होती है। इस युवक का स्वप्न आईएएस या आईपीएस में जाने का नहीं है, बल्कि वह पीएफएस यानी प्रांतीय वन सेवा में जाने का स्वप्न देखता है।

इस बीच पढ़ाई और लेखन दोनों समानांतर चलते रहते हैं। अंतत: वह युवक भारतीय अनुसंधान संस्थान (पूसा इंस्टीट्यूट) में चुने जाने के बाद दिल्ली की ओर प्रस्थान करता है। नैनीताल की उसके पास बहुत सी यादें हैं। इनमें बटरोही और शैलेश मटियानी जैसे मित्र हैं। वीरेन डंगवाल जैसे साथी हैं। शैलेश मटियानी ने एक पत्र में उन्हें लिखा था-देवेन, अपने जीवन में किसी पेड़ की तरह बढ़ने की कोशिश करना, जो स्वयं अपनी जड़ों पर खड़ा रहता है, उस बेल की तरह नहीं, जो दूसरों के सहारे आगे बढ़ती है और सहारा गिरने पर खुद भी गिर जाती है।

वह युवक पूसा इंस्टीट्यूट में काम संभाल लेता है। साहित्य और विज्ञान दोनों मोर्चों पर काम करता है। अपनी कहानियों में वह गांवों के बिम्ब उतारते और भारतीय अनुसंधान संस्थान में मक्का के प्रजनन पर काम करते। कई अर्थों में वह साहित्य और विज्ञान के रिश्ते को पुन:परिभाषित कर रहे थे। नैनीताल को अलविदा कहने पर, हालांकि उसे यह भी समझ आ जाता है कि प्रवासी पक्षियों की तरह छात्र भी पढ़-लिखकर नैनीताल से विदा हो जाते हैं।

साहित्य की दुनिया उस समय खासी बड़ी और फैली हुई थी। एक तरफ वह अनुसंधान में जुटे रहे और दूसरी तरफ लेखकों से जुड़ गए। दिल्ली में भीष्म साहनी से उनके पारिवारिक रिश्ते बने। एक दिन वह भीष्म जी के घर पहुंचे तो उनकी पत्नी ने कहा, हम लोग धीरे-धीरे बात करेंगे। भीखम (भीष्म जी को वे घर में इसी नाम से संबोधित करती थीं) कहानी पूरी करने वाले हैं। हमारी बातचीत से कहीं उनका ध्यान न बंट जाए।

यह पहली बार पता चला कि उनकी पत्नी घर में उन्हें भीखम कहकर पुकारती थी। अब वह युवक देवेंद्र मेवाड़ी बन चुका था। कॉफी हाउस में उस समय लेखकों की महफिल जमा करती थी। रमेश उपाध्याय, रमेश रंजक, शेरजंग गर्ग, योगेश गुप्त, बलदेव वंशी, ब्रजेश्वर मदान और कई साहित्यकारों से उनकी मुलाकातें होने लगीं। हिमांशु जोशी से भी दिल्ली में ही उनकी मुलाकात हुई और रवींद्र कालिया से भी वह इसी शहर में मिले।

टी हाउस भी उनका कई बार जाना हुआ। वहां देवेंद्र मेवाड़ी को विष्णु प्रभाकर, मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मनोहरश्याम जोशी, गंगाप्रसाद विमल, महेद्र भल्ला, प्रदीप पंत, धर्मेंद्र गुप्त और प्रयाग शुक्ल जैसे महत्वपूर्ण लेखक दिखाई दिए। यह वह समय था, जब अकहानी के स्वर तेज हो रहे थे। लेखकों को पत्र तो वह लंबे समय से लिखते ही रहे थे। यानी लेखकों से उन्होंने बाकायदा आत्मीय रिश्ता बना लिया था। उनके पूरे आत्मकथात्मक आख्यान में कहीं ऐसा नहीं दिखाई देता कि उन्होंने किसी और लेखक जैसा बनना चाहा हो या किसी को देखकर अपना रास्ता बदला हो।

उन्होंने अपने लक्ष्य एकदम स्पष्ट रखे। वह उस समय की अनेक साहित्यिक पत्रिकाएँ पढ़ते थे। वह नौकरी करते रहे, अनुसंधान करते रहे, अनेक विज्ञान लेखों का अनुवाद करते रहे और अपने मन का लिखते रहे। उनकी प्राथमिकता में भी शायद विज्ञान पहले नंबर पर था। शायद इसीलिए वह कहते हैं, मैं साहित्य की कलम से विज्ञान लिखता हूं। नौकरी के दौरान ही उन्हें हैदराबाद और गोधरा भी जाने का अवसर मिला। दिल्ली के उनके घर पर कभी शैलेश मटियानी आ जाते तो कभी वीरेन डंगवाल।

इस बीच देवेंद्र मेवाड़ी का विवाह भी हो चुका था। वह भी लेखकों की दुनिया को जानने समझने लगी थीं। एक दिन अचानक गांव से उनके पिता पंत नगर आ पहुंचे। पिता के आने से उन्हें लगा कि गांव ही शहर चलकर आ गया है। देवेंद्र मेवाड़ी ने इस आत्मकथात्मक आख्यान में पहाड़ से बिछड़ने की पीड़ा को भी साहित्यिक दृष्टि से चित्रित किया है। यही वजह है कि वहां के फूल, पौधे और मित्र हमेशा उनके साथ रहे। तल्लीताल, मल्लीताल, नैनीताल और वहां के बाजार आज भी उनके भीतर जीवित हैं।

इस पुस्तक की एक और महत्वपूर्ण बात है। इसमें आपको विज्ञान और साहित्य के ध्रुव दिखाई देंगे। ऐसा लगता है मानो लेखक इनके बीच कोई पुल बनाना चाहता है। यह किताब साहित्य की पिछली सदी के 7वें दशक की दुनिया देखने के लिए भी जरूरी है और इसलिए भी जरूरी है कि उस समय अनुसंधान की दुनिया में क्या हो रहा था। लेखन की अपनी शैली में भी देवेंद्र मेवाड़ी ने एक प्रयोग किया है। ऐसा आभास होता है कि वह पूरी कहानी ईजू (मां) को सुना रहे हैं। अध्याय समाप्त होने पर जब लेखक पूछता है कि आगे की कहानी बताऊं, तो ईजू हुंकारा सा भरते हुए कहती हैं…ओं। और कहानी आगे बढ़ जाती है।

सुधांशु गुप्त


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