
1948 में वह 30 जनवरी यानी आज के दिन की ही शाम थी, जब नई दिल्ली के बिड़ला भवन में सांध्यकालीन प्रार्थना सभा में जा रहे महात्मा गांधी पर चलाई गई तीन गोलियों ने उनको हमसे छीन लिया था। उस समय शाम के पांच बजकर सत्रह मिनट हुए थे और जानकारों के अनुसार 1934 के बाद से यह उनकी हत्या का सातवां प्रयास था। पहले छ: प्रयास विफल रहे थे, जबकि यह सातवां उनको चिर निद्रा में सुलाकर ही माना।
लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि 1934 से 17 साल पहले 1917 में भी उनकी हत्या की एक साजिश रची गई थी। तब, जब उन्होंने बिहार के चम्पारण अंचल में गोरे नील बागान मालिकों के हाथों उत्पीड़ित हो रहे किसानों की मुक्ति के लिए ऐतिहासिक सत्याग्रह किया था।
इस साजिश के पीछे कुछ कुटिल अंग्रेज थे, जो उनको छलपूर्वक जहर दिलवाकर उनकी सारी संभावनाओं का एकमुश्त अंत कर देना चाहते थे। वह तो भला हो, बिहार के ही मोतिहारी जिले के बंजरिया थाना क्षेत्र के सिसवा अजगरी गांव में जन्मे बतख मियां अंसारी का, जिन्होंने अपनी जान व जीविका दोनों को संकटग्रस्त करके उनके प्राण बचा लिए थे। आज की तारीख में यह कल्पना भी डराती है कि वह साजिश सफल हो जाती तो क्या होता! दरअसल, दक्षिण अफ्रीका में अपने सत्याग्रह की सफलता के उत्साह से भरे महात्मा का चंपारण सत्याग्रह देश में उनका इस तरह का पहला ही प्रयोग था और उनके महात्मा बनने में भी देर थी। उस वक्त उनकी जान चली जाती तो देश में सत्याग्रह के उनके प्रयोग की भ्रूणहत्या तो हो ही जाती, क्या पता कि बाद में सत्य व अहिंसा के उनके प्रयोगों के ही इर्द-गिर्द घूमती रही हमारी आजादी की लड़ाई का क्या स्वरूप होता?
बतख मियां अंसारी (वल्द मुहम्मद अली अंसारी) इसी इरविन के यहां रसोइये का काम करते थे। एक दिन जब उसने उन्हें बुलाकर महात्मा को मार डालने की अपनी साजिश में शामिल करना चाहा और इसके बदले वेतन बढ़ाने, साथ ही भरपूर ईनाम और जमीन वगैरह देकर मालामाल कर देने का प्रलोभन दिया तो उन्हें अपने पांवों के नीचे की धरती सरकती-सी महसूस होने लगी। फिर भी बात न मानने पर कठोरतम दंड, बदले की कार्रवाई और अंजाम भुगतने की क्रूर धमकी के कारण वे उसे साफ-साफ या दो टूक जवाब देखकर नाराज करने का जोखिम नहीं उठा पाए। लेकिन जब उसने मोतिहारी जिला मुख्यालय स्थित अपने घर पर महात्मा को उनके सहयोगी डॉ. राजेंद्र प्रसाद (जो बाद में देश के पहले राष्ट्रपति बने) के साथ दावत पर बुलाया और बतख मियां को उन्हें जहर भरा दूध पिलाने भेजा तो बतख मियां से रहा नहीं गया। उन्होंने अपने भीतर का सारा संकल्प जगाया और जब तक महात्मा दूध का गिलास हाथ में लेकर होंठों से लगाते, रुद्ध कंठ से बता दिया कि उसमें जहर मिला हुआ है और वे उसे न पीएं। कहते हैं कि इसके बाद बतख मियां भावुक होकर हिचक-हिचक व फफक-फफक कर रोने भी लगे।
साजिश विफल हो गई तो कुछ देर को इरविन निष्प्रभ जरूर हुआ, लेकिन बाद में उसके क्रोध व कोप का कोई पारावार नहीं रह गया। उसने न सिर्फ बतख मियां को अपना रसोइया नहीं रहने दिया, बल्कि बहुत मारा-पीटा भी। फिर जेल भिजवाकर उनकी सारी संपत्ति जब्त, घर नीलाम और उनके गांव से उनका निर्वासन करा दिया। फिर तो बेघर-बेदर बतख मियां को अपने परिवार के साथ जानें कहां-कहां भटकना पड़ा। फिर भी उन्होंने आजादी के विषम युद्ध में उलझे महात्मा, डॉ. राजेंद्र प्रसाद या किसी और नेता से किसी भी तरह के अनुग्रह या मदद की मांग नहीं की।
आजादी के कुछ साल बाद देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद एक कार्यक्रम में सभा को संबोधित करने मोतिहारी आए तो पाया कि सभा के एक कोने से एक व्यक्ति बार-बार उनके पास आने की कोशिश कर रहा है और पुलिस के सिपाही उसे रोक रहे हैं। तब उन्होंने उस व्यक्ति को मंच पर बुलाकर गले से लगाया, आसन देकर अपने पास बैठाया और सभा में उपस्थित लोगों को बताया कि वे बतख मियां हैं, जिन्होंने 1917 में महात्मा गांधी को जहर देकर मार देने की इरविन की साजिÞश से उनके प्राण बचाये थे।
बतख मियां की आपबीती सुनने के बाद उन्होंने वहां उपस्थित जिलाधीश को उनके परिवार की गुजर-बसर के लिए पचास (कुछ स्रोतों के अनुसार पैंतीस) एकड़ खेती लायक भूमि प्रदान करने का आदेश दिया। लेकिन यह आदेश भी बतख मियां के किसी काम नहीं आया और उनके परिवार की दुर्दशा बदस्तूर जारी रही। उन्होंने अपना आगे का जीवन भूमि देने के उक्त आदेश के क्रियान्वयन के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटते और अफसरों व बाबुओं के संदेहभरे व अड़ंगेबाजी करने वाले सवालों के जवाब देते हुए बिताया। इसके बावजूद चार दिसंबर, 1957 को अंतिम सांस लेने तक उन्हें संतुष्ट करके भूमि पाने में सफल नहीं हो पाए।

