
जिसे आज ‘डॉनरो सिद्धांत’ कहा जा रहा है, उसका उदय इक्कीसवीं सदी में अमेरिकी शक्ति की प्रकृति और उसकी अभिव्यक्ति में एक गहरे बदलाव का संकेत देता है। उन्नीसवीं सदी के मुनरो सिद्धांत और डोनाल्ड ट्रंप से जुड़ी समकालीन विश्वदृष्टि के संयोग से जन्मा यह सिद्धांत केवल प्रभाव जमाने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रत्यक्ष संरक्षकत्व (गार्जियनशिप) की खुली घोषणा करता है। यह ऐसे विश्व की तस्वीर पेश करता है, जहां संयुक्त राज्य अमेरिका न केवल उन क्षेत्रों में हस्तक्षेप करने का अधिकार अपने पास मानता है जिन्हें वह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समझता है, बल्कि वहां की राजनीतिक प्रक्रियाओं, सत्ता परिवर्तन और शासन व्यवस्था की निगरानी को भी अपना वैध दायित्व मानने लगता है। इस संदर्भ में वेनेजुएला मात्र एक लैटिन अमेरिकी संकट नहीं रह जाता, बल्कि वह मंच बन जाता है जहां अमेरिकी शक्ति का यह नया और असहज स्वरूप अभ्यास में लाया जा रहा है।
अपने मूल में, डॉनरो सिद्धांत प्रभाव क्षेत्रों (स्फीयर आॅफ इन्फ्लुएंस) की अवधारणा को पुनर्जीवित करता है, विशेषकर पश्चिमी गोलार्ध को एक विशिष्ट रणनीतिक क्षेत्र के रूप में स्थापित करते हुए। अंतर यह है कि पहले ऐसे दावे अक्सर कूटनीतिक भाषा और नैतिक तर्कों में लिपटे रहते थे, जबकि आज उनकी अभिव्यक्ति कहीं अधिक प्रत्यक्ष और स्पष्ट है। इन क्षेत्रों में सक्रिय बाहरी शक्तियों को वैध हितधारक के रूप में नहीं, बल्कि घुसपैठियों के रूप में चित्रित किया जाता है। स्थानीय राजनीतिक घटनाक्रमों को अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के चश्मे से देखा जाने लगता है। इस प्रकार घरेलू शासन और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है और हस्तक्षेप को दबाव या प्रभुत्व के रूप में नहीं, बल्कि आत्मरक्षा की अनिवार्यता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
इस सिद्धांत की एक प्रमुख विशेषता उन मुद्दों का ‘सुरक्षाकरण’ है, जिन्हें पहले सामाजिक, आर्थिक या विकासात्मक समस्याओं के रूप में देखा जाता था। प्रवासन, मादक पदार्थों की तस्करी, संगठित अपराध और ऊर्जा अस्थिरता अब सहयोग और साझा समाधान की मांग करने वाले अंतरराष्ट्रीय प्रश्न नहीं रह जाते, बल्कि उन्हें सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अस्तित्वगत खतरे के रूप में परिभाषित किया जाता है। जब किसी समस्या को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है, तो बल प्रयोग, प्रतिबंध और दबाव जैसे कठोर साधनों का उपयोग न केवल आसान हो जाता है, बल्कि उन पर सवाल उठाना भी कठिन हो जाता है। सीमाएं केवल भौगोलिक रूप से नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से भी धुंधली हो जाती हैं और किसी अन्य देश की आंतरिक अस्थिरता को सीधे अमेरिकी मातृभूमि के लिए खतरा बताया जाने लगता है।
डॉनरो सिद्धांत में प्रयुक्त नैतिक भाषा का परिवर्तन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। शीत युद्ध के बाद के दौर में लोकतंत्र की स्थापना और मानवाधिकारों की रक्षा अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की नैतिक आधारशिला हुआ करती थी। इस नए सिद्धांत में ये आदर्श धीरे-धीरे पीछे छूटते दिखाई देते हैं और उनकी जगह स्थिरता, पूवार्नुमेयता और नियंत्रण जैसे व्यावहारिक लक्ष्य ले लेते हैं। लोकतांत्रिक परिणामों को उनकी अंतर्निहित वैधता के कारण नहीं, बल्कि इस आधार पर महत्व दिया जाता है कि वे रणनीतिक हितों के अनुकूल हैं या नहीं। यह दृष्टिकोण उदार अंतरराष्ट्रीयतावाद के सार्वभौमिक दावों को कमजोर करता है और वैश्विक राजनीति में नैतिकता के चयनात्मक प्रयोग को उजागर करता है।
डॉनरो सिद्धांत के व्यावहारिक क्रियान्वयन के अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इसका सबसे तात्कालिक प्रभाव प्रभाव क्षेत्रों की अवधारणा का सामान्यीकरण है, जिसे लंबे समय से संप्रभु समानता के सिद्धांत के विपरीत माना जाता रहा है। यदि बड़ी शक्तियाँ अपने पड़ोस में विशेष अधिकारों पर जोर देने लगें, तो अंतरराष्ट्रीय कानून की संरचना हर जगह कमजोर होगी। छोटे और मध्यम देश, विशेषकर वे जिनका इतिहास बाहरी हस्तक्षेपों से भरा रहा है, ऐसे सिद्धांतों को कभी भी निष्कलुष या हितकारी नहीं मानेंगे। लैटिन अमेरिका में सैन्य हस्तक्षेप, सत्ता परिवर्तन और आर्थिक दबाव की स्मृतियाँ आज भी जीवित हैं और किसी भी नए संरक्षकत्व को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।
वैधता का प्रश्न यहां केंद्रीय बन जाता है। बल, प्रतिबंध या राजनीतिक दबाव से आज्ञाकारिता तो हासिल की जा सकती है, लेकिन वास्तविक सहमति शायद ही कभी उत्पन्न होती है। बाहरी समर्थन के माध्यम से वैधता गढ़ने के प्रयास अक्सर उलटे पड़ते हैं और साम्राज्यवाद की धारणा को और मजबूत करते हैं। इससे स्थानीय नेतृत्व की विश्वसनीयता भी कमजोर होती है, जिन्हें विदेशी शक्तियों का प्रतिनिधि समझ लिया जाता है। इसके अतिरिक्त, यदि किसी एक क्षेत्र में बाहरी निगरानी और हस्तक्षेप को स्वीकार्य मान लिया गया, तो अन्य शक्तियों के लिए भी दुनिया के दूसरे हिस्सों में वैसा ही व्यवहार उचित ठहराना आसान हो जाएगा। इस तरह डॉनरो सिद्धांत की तर्कप्रणाली एक ऐसे विखंडित विश्व को जन्म दे सकती है जहां साझा नियमों के स्थान पर प्रतिस्पर्धी प्रभुत्व हावी हों।
भारत के लिए ऐसे सिद्धांतों का उभार एक जटिल दुविधा पैदा करता है। संप्रभुता और गैर-हस्तक्षेप भारतीय विदेश नीति के मूल स्तंभ रहे हैं, जो किसी भावुक आदर्शवाद से नहीं, बल्कि औपनिवेशिक अनुभवों से उपजे व्यावहारिक सबकों पर आधारित हैं। भारत की रणनीतिक संस्कृति बाहरी निगरानी में होने वाले सत्ता परिवर्तनों के प्रति सशंकित रही है, क्योंकि इतिहास बताता है कि बाहर से थोपी गई स्थिरता अक्सर दीर्घकालिक स्वायत्तता को कमजोर कर देती है। साथ ही, अमेरिका के साथ भारत की बढ़ती साझेदारी, विशेषकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में प्रौद्योगिकी, समुद्री सुरक्षा और एशिया में शक्ति संतुलन जैसे क्षेत्रों में वास्तविक हित-साम्य को भी दर्शाती है।
इस संतुलन को साधने के लिए रणनीतिक परिपक्वता आवश्यक है। साझेदारी का अर्थ यह नहीं हो सकता कि भारत उन सिद्धांतों का बिना आलोचना समर्थन करे, जो उन्हीं मानकों को कमजोर करते हों जिन पर उसकी अपनी सुरक्षा और स्वतंत्रता टिकी है। रणनीतिक स्वायत्तता कोई अमूर्त नारा नहीं, बल्कि उस विश्व में एक अनिवार्य आवश्यकता है जहां शक्ति का प्रयोग संवाद से अधिक दबाव के माध्यम से होने लगा है। इसलिए भारत को अमेरिका के साथ सहयोग करते हुए भी स्वतंत्र विवेक बनाए रखना होगा, जहां हित मेल खाते हों वहाँ साथ चलना, और जहाँ सिद्धांतों पर आंच आती हो वहाँ संयमित असहमति प्रकट करना।
डॉनरो सिद्धांत एक ऐसे खतरनाक नए विश्व का प्रतीक है, जहां शक्ति अधिक स्पष्ट और मानदंड कम प्रभावी हो गए हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मौन हमेशा कमजोरी का संकेत नहीं होता; कभी-कभी वह संतुलन और विवेक की रणनीति भी हो सकता है। बहुपक्षवाद, संप्रभुता के सम्मान और संरक्षकत्व की दीर्घकालिक लागतों पर शांत किंतु दृढ़ पुनर्स्मरण आवश्यक है।

