
जब डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ का तूफान वैश्विक व्यापार को झकझोर रहा है, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ऐसी कूटनीतिक चाल चलने को तैयार हैं, जो न केवल भारत-चीन संबंधों को नया आयाम दे सकती है, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति का रुख भी मोड़ सकती है। 31 अगस्त से 1 सितंबर 2025 तक चीन के तियानजिन में होने वाले शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के 25वें शिखर सम्मेलन में मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात वैश्विक नजरों का केंद्र होगी। सात साल बाद मोदी की पहली चीन यात्रा, जिसमें भारत पर 50 प्रतिशत और चीन पर 34 प्रतिशत टैरिफ्स की छाया मंडरा रही है, वैश्विक व्यापार, क्षेत्रीय स्थिरता और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को परिभाषित कर सकती है। सवाल यह है, क्या यह मुलाकात एशिया के दो दिग्गजों को करीब लाएगी, या सिर्फ एक औपचारिक कूटनीति बनकर रह जाएगी?
भारत-चीन संबंधों का इतिहास तनाव और अविश्वास की गाथा रहा है। 2020 के गलवान संघर्ष, जिसमें 20 भारतीय सैनिकों ने बलिदान दिया, ने दोनों देशों के बीच खाई को और गहरा किया। इसके जवाब में भारत ने चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध, निवेशों की कड़ी जांच और क्वाड को मजबूत कर अपनी स्थिति स्पष्ट की। हालांकि, 2024 के कजान ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में मोदी-शी की मुलाकात ने सकारात्मक संकेत दिए। सीमा पर सैनिकों की वापसी और कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली जैसे कदमों ने शांति की उम्मीद जगाई है। तियानजिन में होने वाला एससीओ शिखर सम्मेलन क्षेत्रीय कूटनीति का निर्णायक क्षण साबित होगा। एससीओ जिसमें भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, ईरान, बेलारूस सहित 10 पूर्ण सदस्य और कई पर्यवेक्षक देश शामिल हैं, क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक सहयोग को गति देता है। मोदी और शी के बीच दो द्विपक्षीय बैठकें संभावित हैं, जहां सीमा प्रबंधन, व्यापार असंतुलन और ट्रंप के टैरिफ्स जैसे ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा होगी। यह यात्रा भारत की ह्यमल्टी-अलाइनमेंटह्ण नीति को और मजबूती देगी, जो क्वाड और एससीओ के बीच संतुलन बनाए रखती है।
ट्रंप का टैरिफ दांव उल्टा पड़ रहा है। चीन ने इन टैरिफ्स को ‘धौंस’ करार देते हुए भारत का साथ दिया है। तियानजिन में मोदी और शी वैकल्पिक व्यापार मार्गों जैसे चाबहार पोर्ट और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) पर सहमति जता सकते हैं। भारत का चीन के साथ 99.2 बिलियन डॉलर का व्यापार घाटा एक बड़ी चुनौती है, मगर यह सम्मेलन निवेश और बाजार पहुंच को बढ़ावा दे सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप की नीतियां भारत और चीन को करीब ला रही हैं, जो अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति के लिए करारा झटका साबित हो सकता है। तियानजिन सम्मेलन में रूस के पुतिन, पाकिस्तान के शहबाज शरीफ सहित कई नेता शिरकत कर रहे हैं। मोदी-पुतिन मुलाकात में रूसी तेल और हथियारों पर चर्चा होगी। भारत एससीओ के रीजनल एंटी-टेररिस्ट स्ट्रक्चर (आरएटीएस) को मजबूत करने पर जोर देगा, खासकर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ। भारत आतंकवाद का स्पष्ट उल्लेख सुनिश्चित करेगा, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा को नई दिशा मिल सकती है।
आर्थिक मोर्चे पर भारत चाबहार पोर्ट और आईएनएसटीसी के जरिए मध्य एशिया से जुड़ाव को गति देगा। रॉयटर्स के मुताबिक, भारत यूपीआई जैसे डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को एससीओ देशों में विस्तार देने की रणनीति पर काम कर रहा है। चीन के साथ लिपुलेख और शिपकी ला जैसे सीमा व्यापार मार्गों को पुनर्जनन की संभावना है। हालांकि, पाकिस्तान की मौजूदगी और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) पर भारत का विरोध चुनौतियां खड़ी करता है। फिर भी, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास पर भारत का नेतृत्व वैश्विक मंच पर चमकेगा। मोदी का मानना है कि भारत-चीन के स्थिर संबंध क्षेत्रीय शांति की नींव हैं। जुलाई 2025 की डोभाल-वांग वार्ता से बनी 10-सूत्री सहमति सीमा शांति को मजबूत करती है। मगर 99.2 बिलियन डॉलर का व्यापार घाटा, चीन का पाकिस्तान समर्थन और सीमा तनाव रास्ते में रोड़े हैं। यह यात्रा ‘रणनीतिक विश्वास’ को बढ़ाएगी, पर पूर्ण मित्रता अभी दूर है। भारत को ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति और अमेरिका के साथ संबंधों में संतुलन साधना होगा।
मोदी की चीन यात्रा भारत-चीन संबंधों को नई दिशा दे सकती है। सफलता मिली तो 2026 तक सीमा डीलिमिटेशन पर प्रगति संभव है। मगर 1962 का युद्ध याद दिलाता है कि भरोसा धीरे-धीरे बनता है। यह यात्रा भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूती देगी, जो क्वाड और एससीओ के बीच संतुलन बनाए रखेगी। तियानजिन की निगाहें एक सवाल पर टिकी हैं: क्या मोदी और शी एशिया का नया युग शुरू करेंगे, या यह पुरानी प्रतिद्वंद्विता का एक और पड़ाव है? इसका जवाब समय देगा।

