- सपा के वफादारों को नहीं मिली किसी प्रकोष्ठ में जगह
- सालों की मेहनत करने वालों को कर दिया किनारे
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: सालों से संगठन का विपरीत परिस्थितयों में भी झंडा और वकार बुलंद करने वाले समाजवादी पार्टी के वफादारों को घर बैठा दिया गया है। सपा का गठन करने वाले नेताजी के संघर्ष के दिनों के साथी और मजबूती से पार्टी का झंडा थामे रखने वालों को सपा के वर्तमान सुप्रीमो ने बिल्कुल नजरअंदाज कर दिया है।
अब सपा के विभिन्न प्रकोष्ठों में ऐसे नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी जा रही है, जो जुम्मा-जुम्मा आठ दिन से समाजवादी पार्टी में आकर सियासत कर रहे हैं। जबकि लंबे समय से भाजपा से संघर्ष करने वालों को अब अपना वजूद बचाने के लिए इनाम से नवाजना तो दूर, उनको यह साइलेंट संदेश दे दिया गया है कि यहां मेहनतकशों नहीं, आराम तलबों की ही राजनीति फले फूलेगी।
ख्वाब तो देखा जा रहा है मुल्क के सिंहासन का, लेकिन अपने दरक रहे घर को संभालने की सपा सुप्रीमो को शायद फुर्सत नहीं है। या यूं भी कह सकते हें कि सपा में सिर्फ उनको ही महत्व मिल रहा है, जो कागजी किलेबंदी में माहिर हैं। सालों से भाजपा का खुलकर विरोध करने वालों को घर बैठा दिया गया है। राज्यसभा चुनाव के घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश में प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और उसके प्रमुख अखिलेश यादव को इशारा कर दिया है कि अगर उन्होंने अपनी राजनीति के तरीके को ठीक नहीं किया

तो लोकसभा चुनाव 2024 में पार्टी कुछ भी हासिल नहीं कर पाएगी। यूपी में हाल के घटनाक्रमों ने साफ कर दिया कि अखिलेश की पार्टी पर अस्तित्व का संकट आ गया है। सपा सुप्रीमो के साथ प्रारंभ से रहकर संघर्ष करने वाले पूर्व पार्षद अफजाल सैफ ी को इस बार उम्मीद थी कि किसी प्रकोष्ठ में उनको जिम्मेदार बनाया जायेगा। वह ईमानदारी से संगठन का झंडा बुलंद किये हुए हैं। लेकिन उनको मायूस कर दिया गया है। जानू चौधरी भी इस वक्त हाशिये पर समेट दिये गये हैं।
जबकि उनके साथ बड़ी संख्या में यूथ जुड़ा हुआ है, लेकिन उनका इस्तेमाल ही नहीं किया जा रहा है। कैंट विधान सभा में पिछले दसियों साल से अधिक समय से संघर्ष कर रहे तथा गाहे-बेगाहे सरकार के सभी हिटलरशाही फैसलों के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले सरदार परविन्दर सिंह ईशु को भी पैदल ही रखा गया है। इसी तरह ओमपाल गुर्जर को भी सालों की मेहनत का कोई सिला नहीं दिया गया है। सपा संरक्षक मरहूम मुलायम सिंह यादव के करीबियों में शामिल महमूद इकबाल कस्सार को भी हाशिये पर रखा गया है। जबकि महमूद इकबाल ने संगठन का हर स्थिति में साथ दिया। इसी तरह शरीफ मेवाती को भी नजर अंदाज कर दिया गया है।
जबकि यह दोनों नेता मुस्लिम यूथ को समाजवादी पार्टी से लगातार जोड़े रखते हैं। अपनों को न संभालने का बड़ा झटका समाजवादी पार्टी को फिर झेलना पड़ सकता है और लोकसभा चुनाव के मौके पर अपनों का पार्टी से किनारे होने से सबसे बड़ा नुकसान पार्टी को तो भुगतना पड़ेगा, साथ ही बड़ा नुकसान पार्टी प्रत्याशी को भी भुगतना पड़ सकता है। समाजवादी पार्टी को राज्यसभा में कहने को सपा को दो सीटें हासिल हो गई हैं, लेकिन सपा अंतर्कलह को खत्म नहीं करेगी तो बगावत के झंडे बुलंद होते रहेंगे।

