Wednesday, March 25, 2026
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स्वदेशी का राग और हकीकत

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हमारे देश में स्वदेशी उत्पादों का इस्तेमाल करने के लिए प्राय: आवाज बुलंद की जाती है। भारत में स्वदेशी सामानों के इस्तेमाल पर जोर इसलिए दिया जाता है, क्योंकि इससे देश की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से कई महत्वपूर्ण लाभ होते हैं। देश में स्वदेशी सामान की खपत से स्वदेशी वस्तुओं का उत्पादन बढ़ता है, जिससे स्थानीय उद्योगों को बल मिलता है। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं और बेरोजगारी की समस्या कम होती है। इसके अतिरिक्त विदेशी उत्पाद पर निर्भरता भी कम होती है। इसीलिए कभी सरकार की तरफ से देश को आत्मनिर्भर बनाने के मकसद से स्वदेशी अपनाने के बारे में देश को जागृत करने के प्रयास किए जाते हैं तो कभी स्वदेशी उत्पादों के नाम पर अपना व्यवसाय चलाने वाले भी ‘स्वदेशी अपनाओ’ की बातें करते नजर आते हैं।

क्या वजह है कि हम तो स्वदेशी का राग ही अलापते रह जाते हैं उधर पड़ोसी देश चीन का बड़े भारतीय बाजार पर कब्जा हो जाता है? चीन निर्मित शायद ही कोई ऐसा जीवनोपयोगी उत्पाद हो, जिसकी भरपूर खपत भारत में न होती हो। परन्तु हमारे देश में स्वदेशी अपनाओ का शोर तो ज्यादा सुनाई देता है परन्तु उसकी गुणवत्ता सुधारने या उचित कीमत में आकर्षक, टिकाऊ व योग्य वस्तु का उत्पादन करने पर जोर कम दिया जाता है।

स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई प्रमुख अवसरों पर आत्मनिर्भर भारत बनाने हेतु स्वदेशी अपनाने के संबंध में जनता से अपील कर चुके हैं। वे दुकानों को स्वदेशी वस्तुओं से सजाने और भारतीय उत्पादों को गर्व से उपयोग करने के लिए नागरिकों को प्रेरित करते रहते हैं। प्रधानमंत्री का मानना है कि विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब भारतीय सामान वैश्विक बाजार में अपनी पहचान बनाएं और प्रत्येक नागरिक स्वदेशी उत्पादों के इस्तेमाल पर गर्व महसूस करे। इसीलिए प्रधानमंत्री अक्सर ‘वोकल फॉर लोकल’ की बात करते सुने जाते हैं जिसमें स्थानीय बाजार और उत्पादों को बढ़ावा देने पर बल दिया जाता है। नि:संदेह भारत की आत्मनिर्भरता का मार्ग तभी मजबूत होगा जब देशवासी अपने उत्पादन, तकनीक और नवाचार में स्वदेशी को प्राथमिकता दें। विदेशी वस्तुओं की जगह देसी उत्पाद को पहचान और सम्मान देना आज के दौर में राष्ट्रीय हित, सुरक्षा और आर्थिक मजजबूती के लिए अत्यंत आवश्यक है।

परन्तु सवाल यह है कि भारतवासियों के लिए स्वदेशी उत्पाद बनाने वाली कंपनियां या उद्योग अपने आप में कितने विश्वसनीय हैं? क्या वजह है कि देश के लोगों को भारतीय उत्पाद की तुलना में अनेक विदेशी उत्पाद ज्यादा पसंद आते हैं? कई विपक्षी नेता तो यहां तक कहते हैं कि स्वदेशी अपनाने का पाठ पढ़ने वाले प्रधानमंत्री स्वयं विमान से लेकर मोबाइल फोन, पेन, चश्मा व घड़ी आदि सब कुछ विदेशी प्रयोग करते हैं? पिछले दिनों तमिलनाडु में बने ‘कोल्ड्रिफ’ नामक कोल्ड सीरप ने देशभर में हंगामा खड़ा कर दिया। इस सिरप के पीने से अब तक मध्य प्रदेश, राजस्थान, केरल, और अन्य राज्यों के 26 से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है। यह मामला भारत में स्वास्थ्य और दवा सुरक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। तमिलनाडु की श्रीसन फार्मास्युटिकल कंपनी द्वारा निर्मित इस विषाक्त सीरप के सेवन से अनेक बच्चों की किडनी फेल हो गई और कई बच्चों की मौत हो गई। 14 वर्षों से निर्माणाधीन यही सीरप आखिरकार रिक्तियों, नियमों के उल्लंघनों और मिलावट के कारण अपनी गुणवत्ता पर खरा नहीं उतरा और जहरीला साबित हुआ। क्या इस तरह की घटना भारत की दवा सुरक्षा प्रणाली की गंभीर चूक का संकेत नहीं है? निश्चित रूप से इस जहरीली दवा के निर्माण में मानकों का उल्लंघन हुआ, और इसे कई वर्षों तक बिना उचित निगरानी के बाजार में फैलने दिया गया। बेशक सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया है और दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाने की बात भी की है परन्तु जिनके घरों के ‘चिराग’ बुझ गए न तो उन्हें वापस लाया जा सकता है न ही उनपरिवारों को स्वदेशी उत्पाद पर भरोसा करने का पाठ पढ़ाया जा सकता है।

आज पूरे देश में सरे आम जहरीली सब्जियां, विषाक्त फल, मिलावटी व जहरीले दूध, पनीर, घी मक्खन, खोया, कुट्टू का जहरीला आटा आदि तमाम चीजें बेचीं जा रही हैं। दूध की तो रोज के उत्पादन से कई गुना अधिक की खपत है, सरकार व प्रशासन को भी यह सब पता है परंतु मिलावट खोर मौत के सौदागर सरेआम ऐसी जहरीली सामग्री बाजार में खपा रहे हैं। तमाम नकली दवाइयां बाजार में बेचीं जा रही हैं। इसी तरह मिलावटी व जहरीली मिठाइयां व बेकरी के सामान बाजार में बेखौफ बिकते हैं। बाजार में इन सब चीजों की खपत का मुख्य कारण भ्रष्टाचार है। इन मौत के सौदागरों को भली भांति मालूम है कि उनके काले करतूतों का पर्दाफाश होने के बावजूद उनका कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं। केवल गुणवत्ता का ही प्रश्न नहीं बल्कि मिठाई वाला यदि आपको एक या दो हजार रुपए किलो मूल्य की मिठाई देता है तो वह गत्ते के डिब्बे को भी उसी रेट में तोल देता है। यानी आपको महंगी कीमत अदा करने के बावजूद पूरा सामान नहीं मिल पाता। किसी सामग्री पर छपे अधिकतम खुदरा मूल्य को लेकर भी बड़ा गोलमाल देखा जा सकता है। कई बार तो प्रिंटेड रेट से आधे मूल्य पर भी दुकानदार सामन बेच देता है। जबकि आधे मूल्य पर बेचने पर भी दुकानदार मुनाफा कमाता है।

हमारे देश में अभी भी किसी वस्तु के प्रयोग की तिथि समाप्त होने यानी एक्सपायरी डेट निकल जाने के बावजूद सीधे सादे व अनपढ़ लोगों को ऐसा सामान बेच दिया जाता है। कई कम गुणवत्ता वाले सामानों पर किसी ब्रांडेड कंपनी की मुहर लगा कर बाजार में बेच दिया जाता है। इस तरह की मानसिकता का केवल एक ही कारण है कि इस तरह के व्यापार करने वाला व्यक्ति कम समय में अधिक धन कमाना चाहता है। और अपने इस ‘अनैतिक व नापाक मिशन’ में वह यह भी भूल जाता है कि ऐसा कर वह आम लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहा है क्योंकि उसे इस बात का पूरा यकीन रहता है कि किन्हीं विशेष परिस्थितियों में उसके पकड़े जाने के बावजूद उसका कुछ बिगड़ने वाला नहीं। लिहाजा देशवासियों को स्वदेशी उत्पाद अपनाने की सलाह देने वालों को चाहिए कि पहले उत्पादनकर्ताओं को यह सख़्त निर्देश व संदेश दिया जाए कि गुणवत्ता से कोई समझौता न हो।

मिलावट खोरी, नकली व जहरीले खाद्य पदार्थ बाजार से पूरी तरह गायब हों। देशवासियों को जहरीली सामग्री बेचने वालों को सामूहिक हत्या के अभिप्रायपूर्वक किए गए प्रयास का दोषी मानकर दंडित किया जाए। भारतीय उत्पाद की कीमतें व नाप तौल ठीक हों। जब तक देशवासियों में स्वदेशी उत्पाद के प्रति पूरा विश्वास पैदा नहीं होता तब तक ‘राग स्वदेशी’ अलापना इसलिए मुनासिब नहीं, क्योंकि इसकी हकीकत कुछ और है जबकि असली फसाना कुछ और है।

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