- पंजाब के एक गांव में गुरुद्वारे में बरसों से रखा कुरान सिखों ने मुसलमानों को सौंपा
- 1938 में छपा था यह कुरान, सालों तक गुरुग्रंथ साहिब के साथ रखा रहा
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: ‘सात संदूको में भरकर दफन कर दो नफरतें, आज इंसा को मोहब्बत की जरूरत बहुत है’। बशीर बद्र की यह पंक्तियां आज पंजाब के उस गुरुद्वारे के सेवादारों पर बिल्कुल सटीक बैठतीं हैं जिन्होंने अपने गुरुद्वारे में दूसरे धर्म के धर्म ग्रन्थ को उतनी ही इज्जत बख्शी जितनी कि अपने धर्म ग्रन्थ को। गुरुग्रन्थ साहिब के साथ में इस धर्म ग्रन्थ को वर्षों तक हिफाजत के साथ रखा और अब आकर उसे उसी इज्जतो एहतराम के साथ संबधित धर्म के अनुयायियों को वापस कर दिया।
दरअसल, यह मामला है पंजाब के एक छोटे से गांव बुटड़ापीर का। यहां एक गुरुद्वारे में मुस्लिमों की पवित्र धार्मिक पुस्तक कुरान शरीफ बरसों से रखी हुई थी। यह कुरान 1938 में एक प्रिंटिग प्रेस का छपा हुआ है जिसे इस गुरुद्वारे में यहां के सेवादारों ने पूरे सम्मान के साथ गुरुग्रन्थ साहिब के पास ही जगह दी। मेरठ में राष्ट्रपति पुरस्कार से अलंकृत सरदार सरबजीत सिंह कपूर के बताते हैं कि यह मामला सोशल मीडिया पर भी काफी वायरल हो रहा है।
दरअसल, इस कुरान को हासिल करने वैसे तो कई मुसलमान इस गुरुद्वारे की प्रबंध कमेटी के पदाधिकारियों से मिले, लेकिन कुरान पर कोई आंच न आए इसलिए उक्त पदाधिकारियों ने फैसला किया कि वो इस कुरान को केवल उन्ही को सौंपेगे जिन्हें वो जानते होंगे। बाद में गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी ने ेअपने परिचितों में शामिल मौलाना नसीरुद्दीन पीरजादा व मौलाना शमशाद को गुरुद्वारे में आने की दावत दी।
कमेटी की दावत पर मुसलमानों का एक प्रतिनिधिमण्डल वहां पहुंचा और गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी ने पूरे सम्मान के साथ कुरान मुसलमानों के उक्त प्रतिनिधिमंडल को सौंप दिया। खास बात यह भी रही कि गुरुद्वारे के ग्रन्थी ने जब उक्त प्रतिनिधिमंडल से कुरान की कुछ आयतों को सुनने की इच्छा जाहिर की तो उन्होंने तर्जुमे (अनुवाद) के साथ कुरान की कुछ आयतों का गुरुद्वारे में ही पढ़ा।
इसके बाद गुरुद्वारे के ग्रंथी ने कहा कि हर मजहब की बुनियाद प्यार, प्यार और सिफ प्यार है। गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी ने मुसलमानों को सम्मान स्वरूप सरोपा भी भेंट किया जिसे पूरी अकीदत के साथ मुसलमानों ने भी ग्रहण किया। दोनों ही पक्षों ने इसे एक यादगार पल बताया।

