यकीन मानिए, रुपया-पैसा फल फूल गया है। इसके चलते अठन्नी-चवन्नी ही क्या अपितु दस-बीस रुपयों की भी आजकल के दौर में कोई कीमत नहीं रही। और तो और राह चलते याचक भी अब रुपए दो रुपए की बात नहीं करते। सीधे-सीधे ऊपर वाले के नाम पर सौ-पचास की मांग करते है। जहां तक अधिकार संपन्न वर्ग (?) की बात है, तो चाय पानी के नाम पर हजारों क्या, कहीं कहीं तो लाखों से कम पर बात नहीं बनती। और यदि चाय पानी से जरा ऊपर उठकर मीठा-नमकीन या दावत दरकार हो जाएं, तो बस यूं समझ लीजिए कि जेब या दराज गरम नहीं करना है, बल्कि तिजोरी या बड़े-बड़े लॉकर गरम करना है।
कल तक ऊंचे लोगों की ही ऊंची पसंद होती थी, लेकिन आजकल के दौर में निचले स्तर पर भी अपनी पसंद को लगातार नई ऊंचाइयां दी जा रही है। चतुर सुजान कहते हैं कि बीते दौर में भ्रष्टाचार के इतने विकल्प नहीं थे जितने कि आज हैं। आदमी रचनात्मक एवं सृजनशील होना चाहिए। उसे यह पता होना चाहिए कि सामने वाले की नजरों में उसके काम की क्या अहमियत है? पता तो यह भी होना चाहिए कि इसका ऊपर कोई होता सोता तो नहीं है। हर तरफ से निश्चिंत होकर ही मुंह खोला या फाड़ा जाता है। वैसे धीरे-धीरे आदमी इस मामले में बहुत कलाकार हो ही जाता है। वैसे ऊपर वालों से पटरी बैठ जाने पर अपनी रेल पटरी से कभी नहीं उतरती।
जब कहीं अखबार में किसी शख्सियत को रंगे हाथों पकड़ लेने की बात चलती है, तो मौके पर दो-चार या दस-बीस बड़े नोटों पर नहीं बल्कि गड्डियों पर केमिकल चोपड़ा गया होता है। यानी कि गड्डियों पर हाथों की पकड़ के चलते हाथों को धोने पर रंगीन पानी निकलने लगता है। जिसे रंगे हाथ पकड़े जाना कहा जाता है। अब ऐसा नहीं होता कि मुट्ठी में दबाकर रुपया जेब में उड़ेल दिया जाएं। दरअसल अब तो गड्डियों को तोक कर या झोले में भरकर सुपुर्दगी दी जाती है। वैसे देखा जाएं तो किसी काम को करने या न करने के लिए वजनदारी से बात ही नहीं अपितु वजन रख कर बात करना होती है।
जब आदमी का कहीं से कहीं तक कोई काम नहीं होता तो उसका रुपया उसकी पैरवी कर सकता है। दरअसल रूपयों में इतनी ताकत होती है कि यह जिसकी जेब में होता है वह नाचने लगता है। ऐसे में बहुत स्वाभाविक है कि किसी की जेब में रख दिया जाए तो वह नाचेगा ही नाचेगा। बस एक बार किसी से खाता खुल जाए या टांका भिड़ जाएं, फिर तो सरपट-सरपट हर काम आसान हो जाते हैं। या यूं कहे कि एकदम खुलापन आ जाता है। हर कोई निश्चिंत हो जाता है क्योंकि सौजन्य से तो आखिर सभी को प्रसन्न होना ही होता है। अब किस नगर एवं गांव में कितने करोड़पति ऐसे हैं जिसे नगर सेठ का दर्जा दिया जाए? यह तय करना लगभग नामुमकिन है।
इस स्थिति के चलते अनंत ‘संभावनाओं के द्वार’ खुल जाते हैं। पहले इक्का दुक्का काम में आते थे लेकिन अब तो हर कोई काम में आ सकता है। है कि नहीं !

