Thursday, March 19, 2026
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जाति और धर्म की राजनीति घातक

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जातिवाद हमारे समाज में एक कोढ़ की तरह है, और इसकी जड़ें बहुर गहरे तक हैं। और हमारे देश की शांति – सुकून भाईचारा, सद्भाव में सबसे बड़ा रोड़ा भी है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि भेदभाव ने लोगों का शोषण किया है, परंतु अब स्थिति बदल रही है, सदियों से चली आ रही कुप्रथाओं को चुटकियों में समाप्त नहीं किया सकता, ये धीरे – धीरे सही किया जा सकता है। अभी पिछले दिनों प्रशांत किशोर ने एक साक्षात्कार में जाति सूचक शब्द का प्रयोग किया जो उचित नहीं ठहराया जा सकता, परंतु प्रशांत किशोर पढ़े – लिखे युवा हैं, अगर लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं तो उन्हें बड़े दिल से मुआफी मांग लेनी चाहिए इससे उनकी छवि अच्छी ही होगी। प्रशांत किशोर शिक्षित हैं युवा हैं इसलिए उनसे उम्मीद की जा सकती है कि वे पुन: किसी को अपने बयानों से आहत न करें।

दूसरी बात कुछ बहुजन लोगों के ठेकेदार बनकर बैठे ही होते हैं कि कोई कुछ बोले तो हम समाज में खुदी हुई खाई को और खोद कर खुद की राजनीति चमका लें। कुछ नेताओ की जुबां इतनी गंदी है कि वे स्वर्ण समाज को गरियाने के नाम पर देवी-देवताओ लोगों के इष्ट आदि को गरियाने पूरे समाज को गरियाने एवं समाज में लोगों की भावनाओं को भड़काने से आगे बढ़ जाते हैं, जबकि ये किसी भी सूरत में उचित नहीं है। अतिवाद अक्षम्य है। आज सारे के सारे स्वर्ण बहुजन लोगो का शोषण नहीं करते, और न ही ये गुंजाइश बची है, जो लोग पढ़ते-लिखते हैं, वे आगे बढ़ते चले जा रहे हैं, धीरे-धीरे ही सही ये खाई भरी जा सकती है, परंतु हिंसा, कट्टरता के जरिए बढ़ी बल्कि आपसी सद्व्यवहार के जरिए। आज संविधान सभी को बराबरी का हक देता है, सभी को अपनी रोजी -रोटी कमाने की भी स्वतंत्रता देता है। आज किसी की भी हैसियत नहीं है कि कोई किसी का शोषण करे, कुछ घटनाएं होती हैं तो कानून उन्हें कुचल देता है।

अब दूसरे पक्ष में रोशनी डालते हैं बीते कुछ सालों से जाति के आधार पर नेतागिरी करने वाले नेताओ की बाढ़ आ गई है, जाति के नाम पर समाज में खाई खोदने के मामले बढ़ते जा रहे हैं, इससे मुल्क का भला नहीं हो सकता। दलित-पिछड़ा वर्ग के लोगों को अपने नेताओं का चयन सिर्फ जाति के आधार पर नहीं करना चाहिए, बल्कि योग्यता एवं उसकी शख्सियत की खूबियों को देखकर ही चुनाव करना चाहिए। यही बात स्वर्ण लोगों पर भी लागू होती है अपने नेताओं का चयन योग्यता एवं उनकी शख्सियत की खूबियों के आधार पर चुनाव कीजिए, अन्यथा ये आपको आपसे में लड़ाने के बाद अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते हैं। राजनीतिक दलों की राजनीति भी जातीय समीकरण के इर्द गिर्द घूमती रहती है। इन्हें वही लोग चाहिए जो जाति के नाम पर वोट बटोर लाएं भले ही वो व्यक्ति चाहे जितना बड़ा अपराधी क्यों न हो!

भारत में सभी पार्टियां और संगठन जाति और धर्म के आधार पर ही बने हुए हैं। पार्टियां अपने प्रत्याशी जाति और धर्म के आधार पर ही खड़े करती हैं। जब तक पार्टियां ऐसे दांव-पेंच बंद नहीं करेगी तब तक मुश्किल है। ईमानदार और सच्चे समाज सेवक राजनीति में नहीं आएंगे तब तक सुधार नहीं होगा। जबकि राजनीतिक दलों को स्पष्ट करना चाहिए कि वे जाति और धर्म आधारित फैसले लेना बंद करें। अपितु सर्वजन हिताय एवं सर्वजन सुखाय राजनीति की शुरूआत करें। इससे सभी धर्म एवं जाति के लोगों में यह विश्वास उत्पन्न होगा कि उनके हितों को ध्यान रखा जाएगा। चुनाव में जाति और धर्म के आधार पर टिकटों का बंटवारा बंद हो किया जाना चाहिए। जाति और धर्म की कट्टरता को बढ़ावा देने वाली शिक्षा व्यवस्था इस देश मे बंद हो। किसी जाति और धर्म को विशेषाधिकार नहीं मिलना चाहिए। जो लोग राजनीति के लिए लोगों में भेदभाव पैदा करते हैं उनको अस्वीकार करें। मीडिया देश में सद्भावना पैदा करने के लिए प्रयास करे। मीडिया धर्म व जाति के नाम पर राजनीति करने वालों के हौसलों को बुलंद ना करे। जनता में जागरूकता पैदा करे। ऐसा होने पर धीरे-धीरे नफरत फैलाने वालों की राजनीति खत्म हो जाएगी।

उच्च शिक्षा से ही भारत में जाति और धर्म आधारित राजनीति खत्म हो सकती है क्योंकि शिक्षा से ही व्यक्ति का सर्वांगीण विकास होता है, जब हमारी उच्च शिक्षा अंतिम।ोर पर बैठे व्यक्ति तक पहुंच जाएगी तो निश्चित मानिए भारत में सभी लोग जागरूक हो जाएंगे। इसके साथ ही जाति और धर्म से जुड़ी समस्याएं स्वत: ही खत्म हो जाएंगी। नेता अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोगों को ज्यादा प्रभावित करते हैं और उनको बरगलाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। जब प्रत्येक व्यक्ति उच्च शिक्षित होगा तो राजनीति में धर्म और जाति का दुरुपयोग समाप्त हो जाएगा। परंतु ध्यान रहे ये सतत सामूहिक प्रयासों से सम्भव हो सकता है, आपसी सद्भाव बिगाड़ने के बाद कुछ ठीक नहीं होता, समाज विखण्डित होता है। जातिवाद की राजनीति देश के लिए कोढ़ की तरह है। इसे खत्म किया जाना चाहिए।

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