
पिछले दिनों देश के पांच राज्यों में हुये विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के अनअपेक्षित प्रदर्शन के बाद पार्टी में घमासान मचा हुआ है। साफ शब्दों में कहा जाए तो जिन ‘पैराशूट’ नेताओं ने सारी जिंदगी नेहरू-गांधी परिवार के नेतृत्व उनकी लोकप्रियता तथा उनके राष्ट्रीय जनाधार की बदौलत सत्ता सुख भोगा उन्हीं में से अनेक नेता कांग्रेस की सत्ता में यथाशीघ्र वापसी न होती देख अब उसी नेहरू-गांधी परिवार के नेतृत्व पर सवाल उठाने लगे हैं। वे यह भूल जाते हैं कि देश की वर्तमान सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति,झूठ व लांछन के दौर ने कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष व गांधीवादी राजनीति को ही हाशिये पर डाल दिया है। परन्तु जिन नेताओं को शीघ्र सत्ता चाहिए वे कांग्रेस के सिद्धांतों की तिलांजलि देकर किसी न किसी बहाने से या तो पार्टी छोड़ कर सत्ताधारी पार्टी में समाहित हो चुके हैं या नेतृत्व के विरुद्ध मुखर होकर पार्टी छोड़ने के बहाने तलाश रहे हैं।
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जहां तक नेहरू गांधी परिवार द्वारा लिए गए कुछ ऐसे फैसलों का प्रश्न है, जिनसे कथित रूप से कांग्रेस को अतीत में नुक़्सान होता रहा है उदाहरण के तौर पर नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाना अथवा कैप्टेन अमरेंद्र सिंह को मुख्य मंत्री पद से मुक्त करने का फैसला देर से लेना आदि तो इस तरह के फैसले भी सोनिया अथवा राहुल गांधी द्वारा अकेले नहीं लिए गए। इस परिवार में शीर्ष पर हमेशा कोई कोई न कोई सलाहकार रहे हैं, जिनकी सलाह व कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के सलाह मशविरे से ही ऐसे कदम उठाये जाते हैं। परंतु जब पंजाब की जनता ने ही राज्य में तीसरी राजनैतिक शक्ति के रूप में भरपूर समर्थन देने का मन ही बना लिया हो तो उसमें पार्टी नेतृत्व कर ही क्या सकता है? जी-23 कहे जाने वाले नेताओं के गुट में सबसे मुखर नाम गुलाम नबी आजाद का है। कांग्रेस में शुरू से ही इन्हें बिना जनाधार वाला परंतु गांधी नेहरू परिवार का वफादार नेता समझा जाता रहा है।
यह उस समय भी राजीव गांधी के खास सलाहकारों में गिने जाते थे, जब बोफोर्स के झूठे आरोपों का सामना कर रहे अमिताभ बच्चन द्वारा इलाहबाद संसदीय सीट से त्याग पत्र दिया था। उसके बाद हुए उपचुनाव में वीपी सिंह के विरुद्ध पुन: अमिताभ बच्चन को बोफोर्स की चुनौती स्वीकार करने हेतु पार्टी प्रत्याशी के रूप में खड़ा करने की इलाहाबद की जनता की अकांकक्षाओं के विरुद्ध सुनील शास्त्री जैसे कमजोर उम्मीदवार को खड़ा किया गया। यह इन्हीं सलाहकारों द्वारा लिया गया एक ऐसा गलत फैसला था, जिसके परिणाम स्वरूप देश में गठबंधन सरकारों का दौर चला। तभी से देश में अनेक क्षेत्रीय राजनैतिक दल बने और कांग्रेस के वोट अनेक क्षेत्रीय दलों में समाहित हो गए। आज वही ‘सलाहकार’ नेतृत्व पर प्रवचन दे रहे हैं?
उधर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में जहां कांग्रेस पार्टी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही थी, प्रियंका गांधी की मेहनत, उनके जुझारूपन व पूर्णकालिक सक्रियता की वजह से वहां कांग्रेस चर्चा में आई। राज्य में नए सिरे से संगठन खड़ा हुआ, लोगों में कांग्रेस से उम्मीदें जगीं। परंतु अपेक्षित सीटें न मिल पाने के लिए नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराने के बजाये संगठन की खामियों को देखना चाहिए और यह काम दूसरी व तीसरी पंक्ति के नेताओं का है कि वे प्रियंका गांधी द्वारा बनाये गए सकारात्मक वातावरण को वोट में बदलने के लिए समर्पित व जिम्मेदार कार्यकर्ताओं का नेटवर्क स्थापित करें और उनसे उनके सामर्थ्य के अनुसार बूथ स्तर तक यथा उचित काम लें।
नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में जितनी सशक्त व मुखर विरोध की भूमिका राहुल गांधी व प्रियंका गांधी ने निभाई है, इतना मुखर विरोध करते देश का कोई नेता नहीं दिखाई दिया। कई बार इनके विरोध ने सत्ता को बैकफुट पर जाने के लिए भी मजबूर किया है। हम दो हमारे दो का कटाक्ष हो या चौकीदार पर प्रहार, राफेल सौदे का विरोध हो या पेगासेस का प्रबल विरोध, ऐसे तमाम मुद्दों को संसद से सड़क तक अपनी पूरी क्षमता व सामर्थ्य के अनुसार राहुल गांधी ने उठाया है। पिछले चुनाव में मोदी और उनके कई नेताओं ने जनता से ‘नमक’ के बदले वोट मांगा जिस पर प्रियंका गांधी ने ऐसी झाड़ लगाई कि मोदी फौरन बैकफुट पर आ गए और चुनावी सभा में यह बोलते नजर आए कि नमक आपने नहीं नमक तो आपका मैंने खाया है। यह साहस और हिम्मत केवल इसी परिवार के सदस्यों में देखा जा सकता है। इन्हें कोई पद्मश्री या पद्म भूषण अथवा मंत्री या मुख्यमंत्री का पद कांग्रेस व उसके सिद्धांतों से विमुख नहीं कर सकता।
देश इस समय सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के साथ साथ झूठ और दुष्प्रचार के दुर्भाग्यपूर्ण दौर से गुजर रहा है। मीडिया सहित अनेक सरकारी संस्थाएं सत्ता के समक्ष दंडवत हैं। अपने विपक्षियों को डरा धमकाकर या लालच देकर उन्हें या तो अपने पक्ष में किया जा रहा है या खामोश किया जा रहा है। कांग्रेस इस समय एक ऐसे अभूतपूर्व चुनौती काल से गुजर रही है जिसमें पूरी कांग्रेस को एक मुट्ठी की तरह एकजुट होने तथा अपने कुंबे का विस्तार करने की जरूरत है न कि पार्टी छोड़ने के लिए नए नए बहाने तलाशने की। कांग्रेस में आज भी गांधी नेहरू परिवार के सिवा भीड़ इकट्ठी करने वाला कोई नेता नहीं है। परंतु जिन्हें सत्ता हासिल करने की जल्दी है, उन्हें नित नए बहाने तलाशने से भी कोई रोक नहीं सकता। हकीकत तो यही है कि नेहरू गांधी परिवार का नेतृत्व नहीं बल्कि सत्ता से वनवास है बगावती सुर बुलंद करने वाले नेताओं की असल समस्या। जैसे की कांग्रेस का सत्ता मिलेगी, ये नेता फिर गांधी परिवार की परिक्रमा करने लगेंगे। फिलहाल बागी बने हुए हैं।


