Monday, September 20, 2021
- Advertisement -spot_imgspot_imgspot_imgspot_img
- Advertisement -spot_imgspot_imgspot_imgspot_img
Homeसंवादसवाल विपक्ष के पक्ष का है

सवाल विपक्ष के पक्ष का है

- Advertisement -


बीते मानसून सत्र में विपक्षी दलों के नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ एकजुट होने के संकेत मिले। इस संकेत ने सत्र के ठीक बाद कुछ अधिक ठोस रूप लिया, जब 19 विपक्षी दलों ने एक साथ बैठक की। बैठक के बाद एक साझा बयान जारी किया गया। उसमें कहा गया-‘हम, 19 विपक्षी पार्टियों के नेता, भारत के लोगों का आह्वान करते हैं कि वे हमारी धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणतंत्रीय व्यवस्था की रक्षा के लिए अपनी पूरी ताकत के साथ उठ खड़े हों। हमें आज भारत को बचाना है, ताकि हम इसे एक बेहतर कल के लिए बदल सकें।’ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने विपक्षी नेताओं की ओर से साझा बयान को पढ़ते हुए कहा कि इन पार्टियों का अंतिम लक्ष्य 2024 का लोक सभा चुनाव है। उनका मकसद उस चुनाव के बाद देश को एक ऐसी सरकार देना है, जो ‘स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों और संविधान के सिद्धांतों एवं प्रावधानों में यकीन करती हो।’

2024 के अपने चुनावी उद्देश्य की दिशा में बढ़ते हुए इन 19 पार्टियों ने उन मांगों को भी तय किया, जिसको लेकर उन्होंने साझा संघर्ष करने का इरादा जताया है।

प्रश्न यह है कि क्या विपक्ष के पास असल विकल्प तैयार करने की इच्छाशक्ति और क्षमता है? अब तक का अनुभव इसकी उम्मीद नहीं जगाता।

2019 के आम चुनाव में दोबारा बड़ी जीत दर्ज करने के बाद 23 मई की शाम को दिए अपने विजय भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि इस चुनाव में भाजपा की असल जीत यह है कि किसी दल ने धर्मनिरपेक्षता शब्द बोलने की हिम्मत नहीं जुटाई, जबकि पहले उसके नाम पर गठबंधन बना करते थे।

हकीकत से परिचित कोई व्यक्ति इस बिंदु पर शायद ही मोदी या उनकी पार्टी को चुनौती देने की स्थिति में हो। आज का दुखद यथार्थ यह है कि संघ/भाजपा ने लगभग सभी दलों को अपनी पिच पर खेलने के लिए मजबूर कर दिया है।

पश्चिम बंगाल के हाल के चुनाव में प्रचार के दौरान अगर जन सभा में ममता बनर्जी चंडी पाठ करके अपने हिंदू होने का सर्टिफिकेट देने पर मजबूर हुई, तो यही कहा जा सकता है कि भले उन्होंने चुनावी जीत हासिल कर ली, लेकिन विचाराधारा के मैदान में उन्होंने समर्पण कर दिया।

दरअसल, जिस बिंदु से विपक्ष शुरुआत कर सकता है, वह भी उसके विमर्श से बाहर है। नरेंद्र मोदी सरकार ने एक खास तरह की राजनीतिक-अर्थव्यवस्था तैयार की है। चंद उद्योगपतियों के धन से चुनावी अभियान चलाते हुए और सत्ता में आने के बाद देश की तमाम जायदाद उन्हीं उद्योगपतियों को सौंपने की ये पोलिटिकल इकॉनमी देश की लगभग पूरी आबादी को बहुत भारी पड़ रही है।

मगर सरकार की सफलता इस बात में निहित है कि उसने इस सवाल को आम चर्चा से बाहर कर रखा है। मोदी की हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति एक तरह से ‘अच्छे दिन’ के बदले सांस्कृतिक मुआवजे का काम कर रही है।

सवाल है कि संतुलन बनाने का यह प्रयास कब तक सफल रहेगा, और जब ऐसा नहीं होगा, तब क्या होगा? अभी हाल तक विपक्ष की रणनीति यह दिखती थी कि जब आम जन को ‘अच्छे दिन’ के बदले हिंदुत्व के सांस्कृतिक मुआवजे से संतुष्ट रखना संभव नहीं होगा, तब मतदाता स्वत: उसके पाले में आएंगे।

अब उसने संघर्ष और एकजुटता की इच्छा जरूर दिखाई है। लेकिन इसमें समस्या यह है कि उसकी इच्छा में वैचारिक स्तर पर कोई नई पहल नजर नहीं आती। विपक्षी दलों का हालिया इतिहास ऐसा है कि अपने ऐसे किसी विकल्प के प्रति लोगों में भरोसा पैदा करने के लिए उन्हें अतिरिक्त श्रम करना होगा।

इसलिए कि जिस नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था पर मोदी सरकार दौड़ रही है, उस पर चलने की शुरुआत उन्हीं दलों ने की थी। इसलिए जब ये दल आय कर के दायरे से बाहर लोगों को 7,500 रुपए प्रति महीने देने की मांग करते हैं या चुनाव में ऐसा वादा करते हैं (2019 में कांग्रेस ने 6,000 रु. का वादा किया था) तो लोग उस पर सहज यकीन नहीं करते।

इसलिए कि इसके साथ ये पार्टियां राजस्व के स्रोत नहीं बतातीं। आखिर सरकार नोट छाप कर असीमित खर्च तो नहीं कर सकती। तो रास्ता यह है कि धनी तबकों और कॉरपोरेट सेक्टर पर टैक्स बढ़ाया जाए, वेल्थ टैक्स और उत्तराधिकार कर लगाने की नई पहल की जाए। मगर इस बिंदु पर आकर विपक्षी दलों की जुबान भी चुप हो जाती है।

वे जब निजीकरण का विरोध करते हैं, तो यह सवाल दिमाग में बना रहता है कि क्या ये दल अब सचमुच फिर से पब्लिक सेक्टर के नेतृत्व वाली नियोजित विकास नीति में भरोसा करने लगे हैं? अगर वे ऐसा नहीं कहते, तो फिर निजीकरण का उनका विरोध अवसरवादी है। और यह भी लोगों को याद है कि अर्थव्यवस्था में पब्लिक सेक्टर के महत्व को घटाने की शुरुआत असल में कांग्रेस के राज में ही हुई थी।

आजाद भारत का सच यह है कि इसमें वामपंथी दलों को छोड़ कर किसी दल के पास अपनी आर्थिक नीति रही, तो वह सिर्फ कांग्रेस है। बाकी दल इधर-उधर कुछ समायोजन के साथ उन्हीं आर्थिक नीतियों को अपनाते रहे हैं, जो कांग्रेस तय करती रही है।

इसीलिए जब बात विकल्प की आती है, तो ध्यान कांग्रेस पर केंद्रित होता है। मगर कांग्रेस की हालत आज यह है कि नई आर्थिक सोच तो दूर की बात है, वह अपने संगठन में भी कोई नयी पहल करने में अक्षम बनी हुई है।

विपक्ष की ताजा एकता और उसके एकजुटता के संघर्ष के इरादे से भी इस स्थिति पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा, अगर विपक्ष जनता में उत्साह पैदा करने वाला अपना पक्ष सामने रखने में विफल बना रहता है। यह तो अब जाहिर हो चुका है कि भाजपा को उसके ही पिच पर नहीं हराया जा सकता।

और अगर ऐसा संभव हो भी जाए, तो जन हित के लिहाज से सरकार में वैसे बदलाव का मामूली असर ही होगा।


What’s your Reaction?
+1
0

+1
0

+1
0

+1
0

+1
0

+1
0

+1
0

- Advertisement -

Leave a Reply

- Advertisment -spot_imgspot_imgspot_imgspot_img

Most Popular

- Advertisment -spot_img

Recent Comments