
वास्त्व में रंगमंच जीवंत कला को समझने-सम्मानित करने का एक अवसर होता है। विश्व रंगमंच दिवस की शुरुआत 1961 में अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संस्थान(आईटीआई) द्वारा की गई और 27 मार्च 1962 को पेरिस में ‘थिएटर आॅफ नेशंस’ सत्र के उद्घाटन के साथ मनाया गया। तभी से इस दिन को विश्वभर में विभिन्न कार्यक्रमों, प्रस्तुतियों, वार्ताओं और अन्य गतिविधियों के साथ मनाया जाने लगा। नाटक-अभिनय हर संस्कृति का अहम हिस्सा होते हैं। ये वैश्विक स्तर पर समाज और रंगमंच के गहरे प्रभाव की न केवल याद दिलाते हैं बल्कि रंगमंचीय कलात्मकता और रचनात्मकता का जश्न भी मनाते हैं।
यह एक ऐसा अवसर और कला का प्रदर्शन है जिससे समाज में सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व भी सामने आते हैं। दुनिया भर में इस मौके पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय नाट्य कार्यक्रम आयोजित होते हैं। इसी कड़ी में सबसे खास विश्व रंगमंच दिवस के संदेश का प्रसार होता है, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संस्थान के बुलावे पर वैश्विक हस्तियां रंगमंच और शांति की संस्कृति विषय पर अपने विचार साझा करती हैं। इस आयोजन की शुरूआत करते हुए पहला विश्व रंगमंच दिवस संदेश 1962 में जीन कोक्ट्यू जो प्रख्यात फ्रांसीसी लेखक, नाटककार और निर्देशक थे, उनके द्वारा लिखा गया।
हर वर्ष, थिएटर समुदाय में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति को अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संस्थान द्वारा विश्व रंगमंच दिवस संदेश की रचना हेतु चुना जाता है, जो ‘रंगमंच और शांति की संस्कृति’ यानी थिएटर एंड ए कल्चर आफ पीस की थीम पर आधारित होता है। रंगमंच की खूबसूरती इसी में है कि यह कल्पनाओं पर आधारित न होकर समाज में घटित घटनाओं, मानव भावनाओं और जीवन संघर्षों को प्रभावी ढंग से दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत करता है। रंगमंच यानी थिएटर केवल मनोरंजन ही नहीं बल्कि उससे कहीं अधिक है। यह अभिव्यक्ति का प्रभावी और सशक्त जरिया है जो इंसानी अनुभवों और भावनाओं की विविधता को दशार्ता है।
इसके जरिए प्राचीन ग्रीक त्रासदियों से अब तक तमाम प्रस्तुतियों का मंचन कर लगातार रंगमंच निखरता रहा है। सच कहें तो पीढ़ियों और संस्कृतियों के दर्शकों के हृदय को यही तो छूता है! दरअसल यह अपनी कहानी कहने का भी मंच प्रदान करता है। अवसर कुछ ऐसा होता है जिसमें व्यक्ति जटिल से जटिल विषयों का अन्वेषण कर, चिंतन के लिए बढ़ सकता है। परिवर्तन की प्रेरणा को साकार मूर्त रूप देने का भी यह अवसर होता है।
चाहे समाज में जागरूकता बढ़ाना हो या अंधविश्वास उजागर करना, इन सारे महत्वपूर्ण विषयों में थिएटर की भूमिका अहम होती है। कला के जरिए प्रोत्साहन का इससे बेहतर अवसर और मंच की आवश्यक्ता को यह सिध्द करता है।
कार्यशालाओं, प्रदर्शनों और चचार्ओं के जरिए एक दूसरे की भाषा से अनभिज्ञ दुनिया भर के लोग रंगमंच के जादू और इसकी परिवर्तनकारी क्षमता का जश्न मनाते एक साथ आकर भाषा न समझे लेकिन, भावनाओं को समझते हैं। सच कहें तो रंगमंच न केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करता है, बल्कि आर्थिक विकास में भी महत्वपूर्ण भागीदार होता है। रोजगार सृजन से लेकर पर्यटन के आकर्षण और आर्थिक विकास को गति देने में रंगमंच उद्योग की महत्वपूर्ण भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, रंगमंच रचनात्मक, आलोचनात्मक सोच और सहानुभूति को बढ़ावा देता है, जो व्यक्तिगत और सामाजिक विकास के लिए आवश्यक कौशल है। सांस्कृतिक आदान-प्रदान और संवाद को बढ़ावा देकर, रंगमंच विभिन्न पृष्ठभूमियों के व्यक्तियों के बीच दूरियों को कम करता है और समझ को बढ़ाता है। यह सहयोग और समन्वय भी प्रोत्साहित करता है, जिससे समुदाय और अपनेपन की भावना विकसित होती है।
रंगमंच महज मनोरंजन का साधन न होकर समाज का आईना भी है। जिसमें हमें, हमारी छवि साफ दिखती है। इसके जरिए समाज की हकीकत भी सामने आती हैं। मंच पर प्रस्तुत सारी कहानियां, संवाद और अभिनय कहीं न कहीं हमारे वास्तविक जीवन की किसी न किसी सच्चाई को प्रतिबिंबित करते हैं। इसका जरिया कुछ भी हो सकता है। चाहे ग्रीक ट्रैजेडी हो, कॉमेडी या फिर लोकनाट्य या फिर हमारा मौजूदा थिएटर सबका मकसद एक ही होता है कि किस प्रकार समाज को जागरूक करें, कैसे नई दिशा और दृष्टि देकर, सुधार ला सकें।
कई व्यावसायिक थियेटर ग्रुप अच्छा काम कर रहे हैं। इनसे जुड़कर अच्छे रोजगार की संभावनाएं भी बनती हैं और रंगमंच में पहचान अलग। रंगमंचीय अभिनय, निर्देशन, परिकल्पना और अन्य कई विधाएं जैसे कोरियोग्राफर, आर्ट डायरेक्टर, स्क्रिप्ट लेखक, सेट डिजाइनर,लाइट, साउंड और तकनीक आदि हमारी कला और संस्कृति को जीवंत रखते हुए रोजगार और पहचान के भी बेहतरीन अवसर देती हैं।

