Friday, June 26, 2026
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तब अजित सिंह पर भारी पड़े थे मुलायम सिंह यादव

  • वर्ष 1989 में मुलायम और अजित सिंह आ गए थे आमने-सामने

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: बात दिसंबर 1989 की हैं। जब जनता दल (ब) और चौधरी अजित सिंह जनता दल (अ) के रूप में बट गया था। कुर्सी को लेकर दोनों नेता आमने-सामने आ गए थे। तब प्रधानमंत्री रहे वीपी सिंह ने ऐलान किया था कि चौधरी अजित सिंह को यूपी के मुख्यमंत्री तो मुलायम सिंह यादव को डिप्टी सीएम के रूप में शपथ दिलाई जाए। चौधरी अजित सिंंह को यूपी के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाने की तमाम तैयारियां लखनऊ में चल रही थी।

इसी बीच मुलायम सिंह यादव ने बगावत कर दी, जिसके बाद जनता दल (अ) और जनता दल (ब) के रूप में बटवारा हो गया। दिल्ली से कुछ नेताओं को सुलह के लिए लखनऊ भी भेजा गया, लेकिन मुलायम सिंह यादव डिप्टी सीएम बनने को तैयार नहीं हुए। इसके बाद ही यह तय किया गया था कि गुप्त वोटिंग की जाए, जो वोटिंग में जीतेगा, उसके सिर मुख्यमंत्री का ताज सजेगा।

गुप्त वोटिंग बंद कमरे में हुई, जिसमें चौधरी अजित सिंह ग्रुप के विधायकों को मुलायम सिंह यादव ने तोड़ लिया तथा जहां अजित सिंह को मुख्यमंत्री की शपथ लेनी थी, वहां पर मुलायम सिंह यादव को सीएम पद की 5 दिसंबर 1989 को शपथ दिलाई गयी। इसके बाद चौधरी अजित सिंह कभी यूपी के सीएम नहीं बन सके। हालांकि केन्द्र सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे, लेकिन यूपी सीएम के पद पर आसीन नहीं हो सके।

इसमें यह भी महत्वपूर्ण है कि चौधरी अजित सिंह के करीबी माने जाने वाले बरनावा विधाससभा क्षेत्र से विधायक रहे चौधरी भोपाल सिंह, बुलंदशहर से किरणपाल सिंह समेत ग्यारह विधायकों को तोड़ने में मुलायम सिंह कामयाब रहे थे। भोपाल सिंह के क्रास वोटिंग के बाद अजित को बड़ा झटका लगा था।

80 के दशक में जनता पार्टी, जनमोर्चा, लोकदल को मिलाकर एक पार्टी बनी थी, जिसके मुखियां बीपी सिंह को बनाया गया था। तब मुलायम सिंह पहली बार यूपी के मुख्यमंत्री बने थे। जनता दल (ब) के मुखिया मुलायम सिंह थे। उस दौरान यूपी विधानसभा में जनता दल ने 208 सीटें जीती थी। 14 विधायकों की कमी थी, तब यूपी में 425 सीटे हुआ करती थी। लखनऊ में अजीत के जनता दल की ओर से यूपी के मुख्यमंत्री होंगे।

यह घोषणा बीपी सिंह ने की थी, तभी कि मुलायम सिंह डिप्टी सीएम होंगे, लेकिन मुलायम सिंह ने यह पद ठुकरा दिया था। लोकदल (ब) के नेता मुलायम सिंह और लोकदल (अ) के नेता अजित सिंह बने थे। दोनों एक-दूसरे के सामने आ गए थे। कुछ विधायक भी बागी हो गए थे। उधर, वीपी सिंह ने फैसला किया था कि की गुप्त मतदान से विधायक का मुख्यमंत्री का फैसला करेंगे।

कुछ लोगों ने मुलायम सिंह यादव को डिप्टी सीएम के लिए राजी करने का प्रयास भी किया, लेकिन मुलायम सिंह नहीं माने। मुलायम सिंह यादव ने माफिया डीपी यादव से विधायकों को तोड़ने में मदद मांगी। क्योंकि उस दौरान डीपी यादव भी विधायक थे। तब 11 विधायकों को तोड़ने में डीपी यादव ने कामयाबी हासिल कर ली, जिसके बाद तो यूपी का सियासी रंग ही बदल गया था।

तब गुप्त मतदान शुरू हुआ और अजित सिंह मुलायम सिंह से पांच वोटों से हार गए थे, जिस स्थान पर अजित सिंह के शपथ ग्रहण करने की तैयारी चल रही थी, वहां का नजारा ही बदल गया। अजित सिंह को बजाय मुख्यमंत्री की शपथ 5 दिसंबर 1989 को मुलायम सिंह यादव ने पहली बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। इसके बाद तो राजनीति में ऐसे चमके कि उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

लंबे समय तक मुलायम सिंह यादव और चौधरी अजित सिंह के बीच राजनीतिक मतभेद रहे। हालांकि बाद में जो गांठ मुलायम सिंह और चौधरी अजित सिंह के बीच मतभेद की लगी थी, वो 2003 में खुली। तब अजित सिंह एनडीए का हिस्सा हुआ करते थे। तब अजित सिंह ने एनडीए भी छोड़ा और 14 विधायकों का समर्थन भी मुलायम सिंह यादव को दे दिया था।

1989 के बाद फिर से मुलायम सिंह यादव और अजित सिंह एक साथ आ गए थे, जिसके बाद मायावती की सरकार गिर गई थी और मुलायम सिंह यादव अजित सिंह के समर्थन से फिर यूपी के मुख्यमंत्री बन गए थे। 2003 में जो दोस्ती मुलायम और अजित के बीच हुई, वो 2004 के लोकसभा चुनाव में भी कायम रही थी।

चौधरी चरण सिंह की कर्मभूमि से रहा है मुलायम का करीबी नाता

चौधरी चरण सिंह की कर्मभूमि से पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का बेहद करीबी नाता रहा है। जब मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे, उस दौरान कई बड़े तोहफे दिए। तब उन्होंने बड़ौत तहसील का दर्जा देने का ऐलान किया था। 1994 में मुलायम सिंह यादव ने चौधरी चरण सिंह के नाम पर मेरठ यूनिवर्सिटी का नाम चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी घोषित किया था।

दरअसल, मुलायम सिंह यादव पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। एक तरह से विश्वविद्यालय का नाम अपने राजनीतिक गुरु के नाम पर घोषित कर यह स्व. चौधरी चरण सिंह को समर्पित कर दिया था। यह नामकरण 25 जनवरी 1994 को हुआ था। अमौसी हवाई अड्डा का नाम स्व. चौधरी चरण सिंह के नाम पर कर दिया था। यही नहीं, लखनऊ विधानसभा के बाहर स्व. चौधरी चरण सिंह की मूर्ति स्थापित की थी। ये भी मुलायम सिंह यादव का बड़ा कदम रहा हैं।

स्व. चौधरी चरण सिंह को मुलायम सिंह अपना राजनीतिक गुरु मानते थे, जिसके चलते कई तोहफे चौधरी चरण सिंह के नाम पर दिये गए। हेमरा डिग्री कॉलेज का नाम भी चौधरी चरण सिंह के नाम पर घोषित किया था। ये हेमरा डिग्री कॉलेज इटावा और सैफई के बीच में स्थित हैं। दरअसल, वेस्ट यूपी चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक कर्मभूमि रहा हैं। वेस्ट यूपी में मुलायम सिंह यादव ने पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह के नाम पर तमाम तोहफे दिये हैं, जो वर्तमान में स्मृति शेष हैं।

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