
ईरान के विरुद्ध इस्राइल-अमेरिका द्वारा 28 फरवरी को प्रारंभ किया गया संयुक्त आक्रमणकारी युद्ध विगत एक महीने से अपनी संपूर्ण विनाशकारी सैन्य शक्ति के साथ निरंतर जारी है। यदि यह विनाशकारी युद्ध भविष्य में भी इसी गति से चलता रहा तो फिर पहले से आच्छादित हो चुका वैश्विक ऊर्जा संकट अत्यंत विकट और विकराल स्थिति में पहुंच जाएगा। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले 5 दिनों के लिए और फिर 10 दिनों के लिए ईरान के ऊर्जा उपक्रमों पर विध्वंसकारी आक्रमण अंजाम नहीं देने का ऐलान किया है।
साथ ही यह चेतावनी भी जारी की है कि यदि ईरान द्वारा भविष्य में खाड़ी देशों के ऊर्जा प्रोजेक्ट्स पर ईरान द्वारा आक्रमण किया जाता है तो फिर अमेरिका ईरान के गैस और तेल निर्माण के ठिकानों परपर भयंकर आक्रमण अंजाम देगा और उसके तमाम ऊर्जा उपक्रमों को नष्ट कर देगा। साथ ही डोनाल्ड ट्रंप ने दावा पेश किया है कि ईरान के साथ युद्ध को खत्म करने के लिए शांति वार्ता निरंतर जारी है। युद्ध के कारणवश उत्पन्न हुई वैश्विक ऊर्जा संकट के चलते हुए भारत पर भी इसका जबरदस्त प्रभाव स्थापित हो गया है। फिलहाल भारत में पेट्रोल और डीजल का तो कोई तत्काल संकट उपस्थित नहीं हुआ है। क्योंकि भारत सरकार के अनुसार अभी दो महीनों का पेट्रोल और डीजल स्ट्रैटेजिक रिजर्व के तौर पर भारत के पास विद्यमान है। किंतु कतर का लिक्विड नेचुरल गैस उत्पादन एकदम बंद हो जाने के कारण भारत में लिक्विड नेचुरल गैस और एलपीजी का संकट अवश्य उत्पन्न हो गया है।
वैश्विक ऊर्जा संकट के मध्य एक शुभ समाचार आया कि अमेरिका ने ईरान के क्रूड आॅयल निर्यात पर आयद की गई अंतरराष्ट्रीय पाबंदी को अस्थाई तौर पर स्थूल कर देने का ऐलान किया है। अमेरिका के वित्तमंत्री स्कॉट बेसेंट ने फॉक्स न्यूज को दिए गए साक्षात्कार में फरमाया है कि डोनाल्ड ट्रंप सरकार द्वारा फिलहाल समुद्र में खड़े हुए ईरान के तेल जहाज पर आयद पाबंदी में अस्थाई तौर पर ढील प्रदान करने का फैसला लिया है। अमेरिका द्वारा ईरानी तेल पर आयद पाबंदी में तत्कालीन ढील प्रदान करने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में करोड़ों बैरल तेल की सप्लाई प्रारंभ हो सकती है और इस युद्ध के कारण शिपिंग और क्रूड आॅयल निर्यात में उत्पन्न हुई गंभीर रुकावट की क्षतिपूर्ति भी हो सकती है।
अमेरिका द्वारा फिलहाल ईरानी तेल के निर्यात पर पाबंदी समाप्त कर देने का सबसे अधिक फायदा जिन देशों को भविष्य में उपलब्ध हो सकता है, उनमें भारत भी एक प्रमुख दैश है। खाड़ी जंग प्रारंभ होने के बाद विश्व पटल पर एनर्जी मार्केट पर जबरदस्त संकट बढ़ गया है और अमेरिका द्वारा समुद्र में कार्गो जहाज में विद्यमान ईरानी तेल के निर्यात से यह विकट संकट कुछ कम हो सकता है। उल्लेखनीय है कि भारत को अपनी आवश्यकता के 90 प्रतिशत पेट्रोल और डीजल के लिए अंतरराष्ट्रीय आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।
अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के अनुसार समुद्र में फिलहाल अभी 17 करोड़ बैरल तेल के कार्गो विद्यमान हैं। भले ही ईरानी क्रूड आयल की अंतरराष्ट्रीय बिक्री के लिए 10 से 15 दिनों तक छूट क्यों ना प्रदान की जा सकती है। अमेरिकन खरीदारों तक इसके पहुंच की मंजूरी प्रदान करने से क्रूड आॅयल सप्लाई की दिक्कतें कम होने और कीमतों को नियंत्रित करने में निश्चित तौर पर निर्णायक मदद मिल सकती। अमेरिकन वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के अनुसार इस कदम से ईरान का जो तेल चीन में जा रहा है, वो क्रूड आॅयल दूसरे एशियाई देशों की तरफ भी अपना रुख मोड़ सकता है। जिससे चीन को बाजार दर पर तेल खरीदना पड़ सकता है। साथ ही साथ भारत, जापान, मलेशिया, फिलिपींस आदि दक्षिण एशिया के देशों के लिए क्रूड आॅयल उपलब्ध हो सकेगा। चीन अभी तक ईरानी क्रूड आॅयल का सबसे बड़ा खरीदार रहा है।
फिलहाल तो भारत की रिफाइनरियों ने समुद्र में विद्यमान कार्गो जहाजों पर लदे हुए लाखों बैरल रूसी क्रूड आयल को ही खरीदा है। उल्लेखनीय है कि भारत द्वारा आयातित क्रूड आयल का तकरीबन 60 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी मुल्कों से आता रहा है। इन मुल्कों में इराक, सऊदी अरब, कुवैत,संयुक्त अरब अमीरात मुख्यत: शामिल हैं। खाड़ी देशों से आयातित होने वाले क्रूड आयल का अधिकांश हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है। फिलहाल युद्ध के जारी रहते हुए होर्मुज स्ट्रेट से कार्गो जहाजों की आवाजाही अत्यंत बाधित हो चुकी है। सन् 2018 में ईरान पर सख्त अंतरराष्ट्रीय पाबंदियां आयद किए जाने से पहले तक भारत द्वारा कुल आयातित क्रूड आयल का तकरीबन 15 प्रतिशत हिस्सा ईरान से आयात किया जाता था।
अमेरिकन वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के मुताबिक इस वक्त तकरीबन ईरान का 17 करोड़ बैरल क्रूड आॅयल समुद्र में कार्गो शिप्स पर विद्यमान है। ईरान का यह समस्त तेल पहले से अनुबंधों कदाचित बंधा हुआ नहीं है। ईरानी क्रूड आयल का एक हिस्सा इस समय विक्रय के लिए तैयार है। अगर अमेरिका द्वारा इन पाबंदियों को ढीला कर दिया जाता है अथवा उनका शक्ति से पालन नहीं होता तो फिर इस क्रूड आॅयल की अतिरिक्त सप्लाई अंतरराष्ट्रीय मार्केट में आ सकती है। उल्लेखनीय है कि भारतीय रिफायनरियां ईरानी तेल को अपने सिस्टम में लाने के लिए सक्षम रही हैं और उसके प्रोसेसिंग के लिए बहुत कम आपरेशन बदलाव की आवश्यकता उत्पन्न होगी। क्योंकि भारतीय रिफायनरियों के पास पहले से ही ईरानी क्रूड आयल को प्रोसेस करने का बाकायदा अनुभव और तकनीक उपलब्ध रही है।
देखना है कि विश्व पटल पर भारत वस्तुत क्रूड आयल को रिफाइन करने वाला सबसे बड़ा चौथा देश है। क्रूड तेल और गैस सप्लाई में विकेट बधाओं का सामना करते हुए भी भारत ने चीन की तरह रिफाइन तेल के अंतरराष्ट्रीय निर्यात पर रोक आयद नहीं की है। हालांकि भारत के समक्ष भी ऊर्जा संकट की कड़ी चुनौतियां विद्यमान हैं। ईरानी तेल पर पाबंदियां अस्थाई तौर पर ढीली करने से पहले अंतरराष्ट्रीय रूप से क्रूड आॅयल की सप्लाई जारी रखने और अंतरराष्ट्रीय मूल्य को नियंत्रित करने की गरज से अमेरिका द्वारा पहले ही रूस से क्रूड आॅयल की खरीदारी करने के लिए आयद की गई पाबंदियां को तीस दिनों के लिए समाप्त कर दिया गया था। युद्ध के निरंतर जारी रहते हुए, संभव है कि रूसी तेल से खरीदारी करने पर आयद पाबंदियों को और अधिक काल के लिए अमेरिका द्वारा बढ़ा दिया। फिलहाल तो भारत के सामने पेट्रोल और डीजल की समुचित सप्लाई का कोई तत्कालीन संकट उपस्थित नहीं है, किंतु अगर युद्ध इसी गति से जारी रहता है तो फिर भारत में पेट्रोल और डीजल की सप्लाई पर विकट संकट संकट का सामना करना पड़ सकता है। ईरान पर आयद पाबंदियों को ढीला करने के लिए अमेरिका के वित्त मंत्री स्काट बेसेंट के ऐलान को अमलीजामा पहनाने में अभी और वक्त लग सकता है, क्योंकि उनके ऐलान पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कोई स्पष्ट ऐलान नहीं किया गया है।

