डॉ इति तिवारी
बॉलीवुड के परफेक्टनिस्ट आमिर खान के मुताबिक, ‘मैंने अपने करियर के शुरुआती दौर में जिन कमर्शियल फिल्मों में काम किया,उन फिल्मों की सफलता में संगीत का बड़ा योगदान था। पर आज हमारी फिल्मों की सबसे बड़ी दुविधा यही है कि उन्हें मेलौडी का बिल्कुल सहारा नहीं मिल रहा है।’ आमिर को इस बात का दुख है कि आज गुणी संगीतकार न के बराबर आ रहे हैं। यहां तक कि ’90 के चर्चित संगीतकारों को भी लगभग हाशिए में ला दिया गया है। फलत: आज बॉलीवुड में म्यूजिकल फिल्मों का अभाव साफ झलकता है। आइए इस संदर्भ मे आमिर के वक्तव्य से ही सिलसिलेवार इसकी चर्चा करते है-
हाल ही मे एक लंबी बातचीत के दौरान आमिर ने फिर इस बात को दोहराया है कि विगत वर्षो में बॉलीवुड फिल्मों के पराजय की बड़ी वजह बेसुरा संगीत भी रहा हैं। आमिर कहते हैं, ‘इसमें कोई शक नहीं है कि आज फिल्म निर्माण में किसी भी पक्ष में क्रियटीविटी कम ही देखने को मिल रही है। सभी जैसे एक जल्दबाजी में है। वरना एक दौर था, जब संगीतकार फिल्म के किसी गाने की सुर रचना में कई दिनों का वक्त ले लेते थे। उस समय भी हर क्षेत्र में नये लोगों का आगमन होता रहता था। लेकिन नए हो या पुराने जिसे भी इसकी जिम्मेदारी सौपी जाती थी,वह अपना बेस्ट देने की पूरी कोशश करता था। अब जैसे कि मेरी दिल,दिल है कि मानता नहीं, राजा हिंदुस्तानी, कयामत से कयामत जैसी फिल्मों को ले लीजिए, इनकी बड़ी सफलता में कर्णप्रिय म्यूजिक का बड़ा हाथ था। आज हमारी ज्यादातर फिल्में इसी बात को मिस कर रही है।’ अब यह दीगर बात है कि आमिर इसके लिए संगीत से जुड़े लोगों को जिम्मेदार ठहराने में हमेशा बच निकलते हैं।
निश्चित तौर पर म्यूजिकल फिल्मों का वह दौर अद्भुत था,जब एक अति साधारण फिल्म के भी सारे गाने बेहद कर्णपिय होते थे। जाहिर है ऐसे में पुराने दौर की फिल्में बार-बार याद आती है। उस दौर संगीतकार और गीतकार सजदा करने लायक है। यह एक दिलचस्प सत्य है कि फिल्मों के हर दौर के साथ संगीत हमेशा रचा-बसा रहा। यहां तक कि फिल्मों में हिंसा-रोमाच के प्रभाव के बावजूद यश चोपडा, आदित्य चोपडा, संजय लीला भंसाली जैसे कई संगीत रसिक फिल्मकारों ने एक्शन प्रधान फिल्मों में भी मेलौडी का दामन नही छोड़ा। लेकिन ‘90 के बाद दौर बदला तो म्यूजिकल फिल्मों की कमी साफ नजर आने लगी। आज कभी कधार किसी फिल्म का एक गाना हिट होता है,तो सभी झूमने लगते है।
मैलोडी की समझ-बात एकदम वाजिब है। दिल तो पागल है, दुश्मन, गदर जैसी कई फिल्मों में बेहद सुरीली संगीत बना चुके गुणी संगीतकार उत्तम सिंह बताते हैं, ‘मैलोडी कभी कृत्रिम नहीं होती है। इसके लिए तो आपको जोड़-तोड़ की बजाय पूरी तरह से सुर रचना में डुब जाना पड़ेगा। हर साज या वाद्य यंत्रों की समझ रखनी पड़ेगी। मुझे याद है, हमारे दौर में सचिन दा या मदन मोहन जी हमें यह समझाते थे कि वायलिन, सितार या बांसुरी जैसे साज उपयोग कहां करना पड़ेगा। उन्हीं से हमने समझा कि वायलिन का इस्तेमाल होना चाहिए। पर आज तो ज्यादातर संगीतकारों को इसकी पूरी समझ नहीं है। सब कुछ कृ़ित्रम हो गया है। एक मशीन ही सारी धुन निकाल रही है। आप ही बताइए, ऐसे माहौल में मैलोडी कहां रहेगी। फिर अब तो यश जी के जाने के बाद से म्यूजिक बेस्ड फिल्मों का निर्माण भी न के बराबर हो रहा है।’
कभी पंचम दा ने संगीतमय फिल्मों के बारे में कहा था कि ऐसी फिल्मों की सुर रचना में बहुत धैर्य की जरूरत पड़ती है। उन्होंने बताया था, ‘जब तक आप फिल्म के हर सिचुएशन में नहीं डूबते हैं, बेहतर सुर रचना की बात भूल जाइए। मुश्किल यह है कि कई बार कुछ सिचुएशन के गानों के सृजन में बहुत वक्त लग जाता है। तभी आपके धैर्य की प्रतीक्षा होती है। कई बार मेरे साथ ऐसा हुआ है कि मैंने किसी फिल्म के सारे गाने चंद बैठक में बना दिए, पर किसी एक गाने में मैं अटक गया। और कई दिनों के सृजन के बाद ही वह गाना मेरे मन-मुताबिक बन पाया।’
टी सीरिज का पतन-बात ज्यादा पुरानी नहीं है। टी .सीरिज के आका स्वर्गीय गुलशन कुमार ने आशिकी, साजन, सडक, दीवाना, दिल है कि मानता नहीं, हम हैं राही प्यार के आदि ढेरों संगीतमय फिल्मों को खूब बढ़ाया दिया था। कई फिल्मों का निर्माण तो उन्होंने सिर्फ संगीत को ध्यान में रखकर किया। पर उनकी अकाल मृत्यु के बाद उनके दो कर्णधार इस मामले में बहुत पीछे रह गए। संगीतमय फिल्मों के नाम पर कुछ सतही काम कर ही वह संतुष्ट हो गए। यही वजह है कि गुलशन कुमार की मृत्यु के बाद से उनके बैनर से अभी तक ऐसी कोई फिल्म नहीं आई है, जिसे म्यूजिकल कहा जा सके।
कई संजीदा गानों के गायक रूप कुमार राठौड कई दिग्गज संगीतकारों को याद करते हुए बताते हैं, ‘संगीत सृजन बिना धैर्य के संभव नहीं है। यही धैर्य था, जिसके जरिए कई गुणी संगीतकारों ने महान गीत-संगीत दिया। जब तक हम अपनी बनायी एक-एक धुन पर इतनी मेहनत करने से हमेशा बचते रहेंगे। अच्छी सुरीला संगीत हमसे दूर भागता रहेगा। सीधी-सी बात है, रेडीमेड और झटपट धुनों ने ही हाल के वर्षों में फिल्म संगीत को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। जिसको देखो, वही म्यूजिक डायरेक्टर यह दावा करता है कि उसके पास धुनों का अद्भुत खजाना मौजूद है। इस दौर के एक चर्चित संगीतकार अनू मलिक बताते हैं, ‘ज्यादा फिल्मों का आॅफर पाने के लिए मैं हिट गाने नहीं बनाता हूं। फिर आज के श्रोताओं की रूचि इतनी तेजी से बदल रही है, किसी तरह के बैंकिग की सारी परिभाषा बदल चुकी है। मुझे याद है दत्ता साहब ने आपनी फिल्मों बार्डर, रिफ्यूजी, एलओसी उमराव जान के लिए मुझसे कितना मेहनत करवाया था। मैं चाहता हूं कि मेरा हर निर्माता-निर्देशक इतनी धैर्य और समय लेकर मुझसे हर गाने बनवाये। मुझे दम लगा के हइसा जैसे फिल्मों में ऐसा कोई मौका मिला है। मैंने हमेशा आपकोे प्रूव किया है।

