
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आम जनता तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया एक असरदार जरिया बन कर उभरा है। भारत की सवा अरब से अधिक की जनसंख्या में लगभग सत्तर करोड़ लोगों के पास फोन हैं, जिसमें से पच्चीस करोड़ लोगों की जेब में स्मार्टफोन हैं। 15.5 करोड़ लोग हर महीने फेसबुक पर और सोलह करोड़ लोग हर महीने व्हाट्सऐप पर रहते हैं। आज अगर भारत अपने लोकतात्रिक स्वरूप और संविधान पर गर्व करता है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसी कारण भारत को चीन जैसे देशों से अधिक सम्मान देता है तो इसका मुख्य कारण यही है कि यहां की जनता को संविधान के माध्यम से अभिव्यक्ति की आजादी जैसे अधिकार प्राप्त हैं।
वैसे आज इंटरनेट ब्रॉडबैंड और मोबाइल इंटरनेट सेवाएं भारत के लोगों की जीवन-रेखा बन चुकी है। यह न केवल सूचनाएं प्राप्त करने और सोशल मीडिया के साथ-साथ संचार का साधन है, बल्कि उससे भी अधिक बड़ी अभिव्यक्ति के आजादी की सहायक है। आज के समय में वैचारिक और सूचना के आदान-प्रदान के लिए समुदायों और समाज के विभिन्न समूहों को आपस में जोड़ने हेतु सोशल मीडिया का प्रचलन बहुत बढ़ गया है। वाट्सएप, ट्विटर, फेसबुक आदि कुछ लोकप्रिय साधन हैं, जिन मंचों पर कुछ ऐसे कार्यकर्ता सक्रिय रहते हैं, जो सरकार, समाज और मीडिया पर नियंत्रण रखने की दृष्टि से समय-समय पर उनकी आलोचना में भी पीछे नहीं हटते। ऐसे कार्यकर्ता किसी घटना से जुड़कर उस पर तुरंत सुधारात्मक रवैया, न्याय या निष्पक्षता के लिए प्रतिकार, प्रतिशोध और दंड जैसे साधनों को अपनाए जाने पर जोर देने लगते हैं।
वास्तविकता यह है कि आज जहां एक ओर सूचना की यह क्रांति अनेक सकारात्मक परिवर्तन लेकर आई है तो वहीं इसके चलते सरकारों के लिए सिरदर्द भी बढ़ा है और समाज में कुछ नकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिल रहे हैं। सरकारों का सिरदर्द इसलिए बढ़ रहा है,क्योंकि कुछ लोग अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इंटरनेट का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं। सोशल मीडिया का उपयोग संवाद के माध्यम के रूप में किया जा रहा था तो कुछ हद तक ठीक था मगर राजनीति के अखाड़ा में तब्दील होने के बाद यह आरोप-प्रत्यारोप का माध्यम तो बना ही|
इसके जरिए राजनीतिक दलों के समर्थक गाली-गलौज भी करते नजर आ रहे हैं जिसके कारण सोशल मीडिया से प्रबुद्ध व्यक्तियों का पलायन होता जा रहा है। इसलिए आज विकृत होते सोशल मीडिया मंचों की समीक्षा करना आवश्यक हो गया है। यहां सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सरकार इस पर कोई विशेष कार्यवाही क्यों नहीं करती है? वास्तविकता तो यह है कि हाल में सोशल मीडिया पर पक्षपात के आरोप भी लग चुके हैं कि यह प्लेटफॉर्म प्रोपोगेंडा फैलाने और फेक न्यूज डालने पर उसे हटाने में लापरवाही करते हैं।
चिंता की बात है कि सोशल मीडिया पर नियंत्रण का कोई उपाय नहीं खोजा गया है। कारण यह है कि अभिव्यक्ति की आजादी का यह एक अच्छा माध्यम है, लेकिन आजादी जब दूसरों की स्वतंत्रता में बाधा बनने लगे तो युक्ति-युक्त निर्बंधन का भी संविधान में प्रावधान है लेकिन सोशल मीडिया पर ऐसा कोई नियम नहीं है। इंटरनेट के मामले में समस्या इसलिए गंभीर है, क्योंकि इसमें कोई कुछ भी लिखने और प्रसारित करने के लिए स्वतंत्र है।
समाचार पत्रों अथवा इलेक्ट्रानिक माध्यमों में तो आपत्तिजनक अंश हटाने की व्यवस्थाएं होती हैं, लेकिन सोशल मीडिया के मामले में ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। सवाल यह है कि इस समस्या का समाधान कैसे निकले? समाधान कोई कठिन नही है, लेकिन हकीकत यह है कि आज सोशल मीडिया के लिए कोई अथॉरिटी ही नहीं बन पायी है जो चेक कर सके और आपराधिक गतिविधियों को चिन्हित कर सके। यही वजह है कि आज सोशल मीडिया फूहड़ता का प्रतीक बन चुका है और लोगों का एक वर्ग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से दूर होता जा रहा है।
इसलिए जरूरी हो गया है कि सोशल मीडिया और मोबाइल फोन वेरीफाइड होना चाहिए, तभी सांप्रदायिकता फैलाने वाली फेक न्यूज, बढ़ती फूहड़ता और अपराध पर रोक लगाई जा सकेगी। प्रावधान ऐसे बनाए जाएं जिससे सोशल मीडिया पर तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत की गई फोटो, खबरों का स्रोत और पहचान प्रकट की जा सके। साथ ही, कानून के द्वारा उस व्यक्ति को दंडित करने का प्रावधान भी हो और सरकार को उन्हें ही लक्ष्य करना चाहिए|
जो सोशल मीडिया जैसे मंचों का दुरुपयोग करके समाज में जहर फैलाने का काम कर रहे हैं। साथ में, भारत को मलेशिया, थाईलैंड जैसे देशो की तर्ज पर कड़े और त्वरित दंड का विधान करना चाहिए, क्योंकि मलेशिया में इसके लिए दोषी व्यक्ति को छ: साल की सजा देने का प्रावधान है, जबकि थाईलैंड में सात साल की सजा का प्रावधान है। इसके अलावा सिंगापुर, चीन, फिलीपिंस आदि देशों में भी गलत खबरोंं पर रोक लगाने के लिए सख्त कानून बनाए गए हैं।


