Thursday, March 19, 2026
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खाकी पर भी पड़े थे भूरा हत्याकांड के छींटे

  • कभी भोपाल सिंह का था करीब, बाद में दौरालिया का बना जानी दुश्मन
  • सुरेंद्र दौरालिया व उसकी पत्नी की हत्या में भी आया था रविंद्र भूरा का नाम

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: भरी कचहरी में 16 अक्टूबर, 2006 को पुलिस कस्टडी में गोलियों से भून दिए गए रविंद्र भूरा हत्याकांड के छींटे तब के कुछ बड़े पुलिस अफसरों की वर्दी पर पड़े थे। सुनने में तो यहां तक आया था कि सारी पटकथा ही मेरठ के तत्कालीन एक बड़े पुलिस अफसर की कलम से लिखी गयी थी। चर्चा यहां तक भी थी कि जो कुछ भी उस दिन कचहरी में किया गया, उससे पहले उस पुलिस अफसर को विश्वास में लिया गया। शायद यही वजह रही होगी जो हत्याकांड के बामुश्किल से दो मिनट में उक्त पुलिस अफसर मौक पर पहुंच गए थे और हत्याकांड में शामिल जिस राजेन्द्र उर्फ चुरमुडा को मौके से जिंदा पकड़ लिया गया था।

बाद में अफसर के पहुंचने के बाद खबर मिली कि उसको भी मार दिया गया। चुरमुडा इकलौता ऐसा शख्स था जो किसी निष्पक्ष पुलिस अफसर के यदि हत्थे चढ़ जाता तो रविंद्र भूरा हत्याकांड को लेकर कई बेनकाब हो जाते। एक और बात जिस पुलिस अफसर का नाम रविंद्र भूरा हत्याकांड में आया वह पुलिस अफसर और अजय जडेजा सजातीय हैं। तब कि सपा सरकार के एक बड़े मंत्री के करीबी दोनों को बताया जाता था।

भोपाल सिंह की बैठक से शुरू हुआ था भूरे का सफर

दौराला के भोपाल सिंह जो बाद में छपरौली से विधायक भी बन गए थे उनकी बैठक से ही दौराला के वलीदपुर में रहने वाले रविंद्र भूरा का क्राइम की दुनिया का सफर शुरू हुआ। बताया जाता है कि शुरुआती दौरा में भूरे का कोई अपराधिक इतिहास नहीं था, लेकिन भोपाल सिंह का हुक्का छोड़कर कब उसने हथियार थाम लिए यह उसको करीब से जानने वालों को भी नहीं पता, लेकिन रविंद्र से भूरा बनने तक का सफर भोपाल सिंह की बैठक से ही हुआ था।

भूरा के अलावा शिवचरण भी

केवल भूरा ही नहीं था, जिसकी जिंदगी का सफर भोपाल सिंह की छत्रछाया में शुरू हुआ हो। एक और भी बड़ा नाम था वो था चाचा शिवचरन का। दरअसल, उस वक्त भोपाल सिंह व शिवचरण सिंह सेना में भर्ती के नाम पर एक रैकेट चला रहे थे। तब शिवचरण 510 बेसवर्क शॉप में नौकरी किया करते थे, लेकिन उनकी आमदनी का बड़ा जरिया फौज में भर्ती के नाम पर चलाया जा रहा रैकेट था।

दरअसल में होता यह था कि मानों 100 युवाओं से पैसे लिए और उनमें से 10 अपनी मेहनत से भर्ती हो गए तो नाम यही होता था कि भोपाल व शिवचरण ने करायी है भर्ती और जिसने एक बार इन्हें पैसे दे दिए उसकी इतनी हिम्मत नहीं होती थी कि इनसे अपनी रकम वापस मांग ले। शिवचरण के साथ एक अन्य शख्स भी जुड़ा था उसका नाम था जनक यादव उर्फ जडेजा।

ऐसे बदली दोस्ती दुश्मनी में

भोपाल सिंह और शिवचरण की दोस्ती जग जाहिर थी, लेकिन इस दोस्ती के दुश्मनी में बदलने के पीछे एक लंबी और फिल्मी कहानी है। यह कहानी शुरू हुई थी सदर थाना क्षेत्र लाल क्वाटर से। वहां कैंट बोर्ड में मुलाजिम का परिवार रहता था। उस मुलाजिम की पत्नी से भोपाल व शिवचरण दोनों की दोस्ती थी। पुरानी कहावत है कि एक म्यान में दो तलवारे नहीं रह सकतीं वैसा ही कुछ भोपाल सिंह व शिवचरण के बीच हुआ।

दोस्ती कब दुश्मनी में बदल गयी यह शायद दोनों को नहीं पता चला, लेकिन दोस्ती से दुश्मनी की पटकथा छावनी के लाल क्वाटर में लिखी गयी थी और अंत हुआ बेगमपुल पीपी पेट्रोल पंप पर जहां शिवचरण की सरेआम गोलियां बरसा कर हत्या कर दी गयी। उस हत्याकांड में भोपाल सिंह के छोटे भाई सुरेंद्र दौरालिया एंड गिरोह का नाम आया था।

भोपाल की हत्या से हिसाब चुकता

शिवचरण की हत्या के बदला भोपाल सिंह की जिला अस्पताल में हत्या कर लिया गया। भोपाल सिंह की हत्या भी पुलिस कस्टडी में हुई थी। भोपाल की हत्या में शिवचरण के करीबी समझे जाने वाले चुरमुडा का नाम आया था। इनके अलावा भी कई नाम इसमें सामने आए थे। तब तक रविंद्र भूरा की भी भोपाल सिंह के परिवार यानी उनके छोटे भाई से भीतर ही भीतर दुश्मनी हो गयी थी। दुश्मनी भी ऐसी कि जिसको पहले मौका मिले वहीं एक-दूसरे को मार दे। फिर हुआ भी वैसा ही।

सुरेंद्र दौरालिया की हत्या में भूरे का नाम

सुरेंद्र दौरालिया की हत्या बाउंड्री रोड कोठी 22-बी के बराबर वाली कोठी में घुसकर की गयी। बताया जाता है कि वक्त शाम का था, सुरेंद्र दौरालिया उस कोठी में उस वक्त मौजूद थे। उन्हें आवाज देकर नीचे बुलाया गया और गोली मार दी। उसके बाद हत्यारा ऊपर की ओर गया। वहां पर सुरेंद्र दौरालिया की पत्नी मौजूद थी। हत्यारों ने उनके पहले पांव छूएं और फिर उनकी भी गोली मारकर हत्या कर दी। इससे पहले सुरेंद्र दौरालिया अपनी जान बचाने को ऊपर की ओर भागा ताकि हथियार उठा सके, लेकिन जो मारने आए थे, उन्होंने मौका ही नहीं दिया। दौरालालिया हत्याकांड में रविंद्र भूरा का नाम सामने आया था।

केबल की धनवर्षा

साल 2002 में केबल के कारोबार में अकूत संपदा बरस रही थी। मेरठ में केबल का काम जिनके हाथ में था उन्हें तब भूरा का आदमी माना जाता था। हालांकि बाद में केबल के धंधे में बदन सिंह बद्दो ने भी हाथ आजमाने का प्रयास किया, लेकिन बात नहीं बन सकी और खून खराब हो गया। कहा जाता है कि केबल के धंधे में हो रही धन वर्षा में भूरा का भी हिस्सा होता था। इस बीच शिवचरण खेमे में गिना जाने वाले जडेजा भी केबल के धंधे की धन वर्षा में हिस्सा मांगने लगा। जो केबल का धंधा संभाल रहे थे सुनने में आया है कि उन्होंने जडेजा से साफ कह दिया कि वो तो केवल एक को हिस्सा दे सकते हैं। बस यही से रविंद्र भूरा की मौत की पटकथा लिखे गयी। उसके बाद जो कुछ हुआ सब के सामने है।

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