Saturday, February 28, 2026
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बोतल में बंद प्यास

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भारत में बोतलबंद पानी पर बढ़ती निर्भरता केवल उपभोक्ता व्यवहार में आए बदलाव की कहानी नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक जल प्रशासन में व्याप्त गहरी और बहुस्तरीय प्रणालीगत समस्याओं की ओर भी स्पष्ट संकेत करती है। कभी जो नल का पानी नागरिकों के लिए बुनियादी अधिकार और राज्य की जिम्मेदारी माना जाता था, वही आज अविश्वास, असुरक्षा और असमानता का प्रतीक बनता जा रहा है। शहरों से लेकर कस्बों और यहां तक कि ग्रामीण इलाकों में भी लोग पीने के लिए प्लास्टिक की बोतलों पर निर्भर होते जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल आर्थिक बोझ बढ़ाती है, बल्कि पर्यावरण, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक शासन की अवधारणा पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

आधुनिक भारत में जल संकट को अक्सर वर्षा की कमी, जलवायु परिवर्तन या बढ़ती जनसंख्या से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि ये सभी कारक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बोतलबंद पानी की लोकप्रियता का मूल कारण इनसे कहीं अधिक गहरा है। असल समस्या यह है कि नागरिकों का भरोसा सार्वजनिक जल आपूर्ति प्रणालियों से लगातार टूटता जा रहा है। नलों से आने वाले पानी की गुणवत्ता पर संदेह, नियमित आपूर्ति का अभाव, और पारदर्शिता की कमी ने लोगों को वैकल्पिक स्रोतों की ओर धकेल दिया है। जब राज्य अपनी बुनियादी जिम्मेदारी निभाने में असफल होता है, तब बाजार उस खाली स्थान को भर देता है—अक्सर मुनाफे की शर्तों पर।

शहरी भारत में बोतलबंद पानी का उपयोग तेजी से बढ़ा है। महानगरों में तो यह लगभग जीवनशैली का हिस्सा बन चुका है। कार्यालयों, स्कूलों, अस्पतालों और यहां तक कि सरकारी दफ्तरों में भी बड़े जार और बोतलें आम दृश्य हैं। यह स्थिति विडंबनापूर्ण है, क्योंकि इन्हीं शहरों में सबसे विकसित जल अवसंरचना होने का दावा किया जाता है। यदि इतनी सुविधाओं के बावजूद नागरिक सुरक्षित नल का पानी नहीं पी सकते, तो यह प्रशासनिक विफलता का सीधा प्रमाण है। पाइपलाइन की जर्जर हालत, सीवेज और पेयजल लाइनों का आपस में मिलना, तथा नियमित परीक्षण की कमी—ये सभी समस्याएं वर्षों से ज्ञात हैं, लेकिन समाधान आधे-अधूरे ही रहे हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति अलग होते हुए भी उतनी ही चिंताजनक है। वहां बोतलबंद पानी का उपयोग अपेक्षाकृत कम है, लेकिन जैसे-जैसे ग्रामीण बाजारों तक निजी कंपनियों की पहुंच बढ़ रही है, यह निर्भरता वहां भी बढ़ने लगी है। कई इलाकों में भूजल में फ्लोराइड, आर्सेनिक या आयरन की अधिकता के कारण लोग स्थानीय जल स्रोतों से डरने लगे हैं। राज्य द्वारा उपलब्ध कराए गए सामुदायिक नल या हैंडपंप अक्सर या तो खराब रहते हैं या फिर उनका पानी पीने योग्य नहीं होता। ऐसे में जिनके पास आर्थिक क्षमता है, वे बोतलबंद पानी खरीद लेते हैं, जबकि गरीब तबके दूषित पानी पीने को मजबूर रहते हैं। यह स्थिति जल के क्षेत्र में गहरी असमानता को जन्म देती है।

बोतलबंद पानी उद्योग का विस्तार अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। एक ओर यह उद्योग ‘शुद्धता’ और ‘सुरक्षा’ का वादा करता है, वहीं दूसरी ओर इसके नियमन में गंभीर खामियां हैं। कई बार यह पाया गया है कि बाजार में उपलब्ध बोतलबंद पानी भी गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतरता। इसके बावजूद उपभोक्ता इसे नल के पानी से अधिक सुरक्षित मानते हैं। यह धारणा स्वयं में सार्वजनिक जल संस्थानों की साख पर सवाल है। यदि राज्य द्वारा प्रमाणित और नियंत्रित जल आपूर्ति प्रणाली पर नागरिक भरोसा नहीं करते, तो यह लोकतांत्रिक शासन की विश्वसनीयता के लिए भी खतरे की घंटी है।

पर्यावरणीय दृष्टि से बोतलबंद पानी पर निर्भरता अत्यंत विनाशकारी है। प्लास्टिक की बोतलें कचरे के पहाड़ में बदल रही हैं। पुनर्चक्रण की दर बेहद कम है और अधिकांश प्लास्टिक अंतत: नदियों, झीलों और समुद्रों में पहुंच जाता है। इसके अलावा, बोतलबंद पानी के उत्पादन में भी भारी मात्रा में जल और ऊर्जा की खपत होती है। यानी जिस संसाधन की कमी की बात की जा रही है, उसी का अत्यधिक दोहन करके एक कृत्रिम समाधान प्रस्तुत किया जा रहा है। यह विरोधाभास नीति निमार्ताओं की अल्पकालिक सोच को उजागर करता है। सार्वजनिक जल प्रशासन की समस्याएं केवल तकनीकी नहीं हैं; वे संस्थागत और राजनीतिक भी हैं। जल प्रबंधन से जुड़े विभाग अक्सर संसाधनों की कमी, कुशल मानवबल के अभाव और आपसी समन्वय की समस्या से जूझते हैं। इसके अलावा, जल आपूर्ति जैसी बुनियादी सेवा को राजनीतिक प्राथमिकता भी अक्सर नहीं मिलती। चुनावी घोषणाओं में बड़े बांध, नदियों को जोड़ने की परियोजनाएं या स्मार्ट शहरों की बातें तो होती हैं, लेकिन रोजमर्रा की जल आपूर्ति को सुधारने पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है। परिणामस्वरूप, छोटी-छोटी लेकिन महत्वपूर्ण समस्याएं वर्षों तक अनसुलझी रहती हैं।

निजीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति भी इस संकट को गहरा कर रही है। जब सार्वजनिक प्रणालियां कमजोर होती हैं, तो समाधान के रूप में निजी कंपनियों को आगे लाया जाता है। हालांकि कुछ मामलों में इससे दक्षता बढ़ी है, लेकिन अक्सर इसका लाभ केवल उन लोगों को मिलता है जो भुगतान कर सकते हैं। पानी जैसे आवश्यक संसाधन का बाजार आधारित वितरण सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। बोतलबंद पानी इस निजीकरण का सबसे स्पष्ट उदाहरण है, जहां स्वच्छ पानी एक मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि एक उपभोक्ता वस्तु बन जाता है। इस पूरी स्थिति का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बोतलबंद पानी पर निर्भरता धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही है। लोग इसे समस्या के लक्षण के बजाय समाधान के रूप में देखने लगे हैं। इससे सार्वजनिक दबाव कम होता है और प्रशासनिक सुधार की मांग कमजोर पड़ जाती है। जब नागरिक स्वयं वैकल्पिक व्यवस्था कर लेते हैं, तो राज्य पर जवाबदेही का दबाव घट जाता है। यह चुपचाप स्वीकार की गई असफलता भविष्य में और बड़े संकटों को जन्म दे सकती है।

जल को फिर से सार्वजनिक भलाई के रूप में स्थापित किया जाए। इसके लिए सबसे पहले नल के पानी की गुणवत्ता और नियमितता सुनिश्चित करनी होगी। पारदर्शी जल परीक्षण, परिणामों की सार्वजनिक उपलब्धता और शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था नागरिकों का भरोसा बहाल कर सकती है। साथ ही, जल अवसंरचना में निवेश को प्राथमिकता देनी होगी—चाहे वह पाइपलाइन की मरम्मत हो, सीवेज प्रबंधन हो या जल शोधन संयंत्रों का आधुनिकीकरण। इसके साथ-साथ जन जागरूकता भी महत्वपूर्ण है। लोगों को यह समझना होगा कि बोतलबंद पानी दीर्घकालिक समाधान नहीं है। पर्यावरणीय और सामाजिक लागतों के बारे में जानकारी बढ़ाकर उपभोक्ता व्यवहार को बदला जा सकता है। स्कूलों, सामुदायिक संगठनों और स्थानीय निकायों की भूमिका इसमें अहम हो सकती है।

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