- कृषि वैज्ञानिक ने कीट फसल बचाव के उपाय बताए
जनवाणी संवाददाता |
शामली: जनपद में गन्ना फसल में टॉप बोरर (चोटी छेदक) कीट का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को टॉप बोरर कीट के प्रति सजग रहने की सलाह देते हुए समय पर उपचार का सुझाव दिया है।
कृषि विज्ञान केेंद्र के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डा. विकास कुमार, शामली शुगर मिल के एडिशनल जीएम केन केपीएस सरोहा एवं दिनेश कुमार अग्रहरि ने संयुक्त रूप से ग्राम कुड़ाना, गोहरनी, बनत, जलालापुर, समसपुर, मालैंडी एवं बधैव गांवों का भ्रमण किया। भ्रमण के बाद डा. विकास मलिक ने बताया कि किसानों के लिए यह समय बहुत ही संवेदनशील हो चुका है क्योंकि क्षेत्र में गन्ना फसल में टॉप बोरर कीट का प्रकोप प्रारंभ हो चुका है।
पौधा गन्ना कटने के उपरांत जो वाटर शूट (कल्ले) छोड़े जा रहे हैं, उन पर इस इस कीट का प्रकोप प्रारंभ हो चुका है। इसलिएइस समय किसानों को सबसे ज्यादा सजग रहने की आवश्यकता है। यदि उनके खेत में टॉप बोरर दिखाई दे तो तुरंत नियंत्रण के प्रयास प्रारंभ कर देने चाहिए।
इस कीट के नियंत्रण के लिए समेकित कीट प्रबंधन बेहद आवश्यक है। केवल हम रासायनिक दवाओं पर ही आश्रित ना रहें जिससे पूर्ण रूप से नियंत्रित करने में कठिनाइयां हो रही है। अत: समेकित कीट प्रबंधन का प्रयोग करेंगे तो किसानों द्वारा कम खर्च में अच्छा प्रबंधन किया जा सकता है।
टॉप बोरर प्रबंधन के उपाय
समय पर उचित मात्रा में उर्वरक देने से गन्ना फसल पर कीट आक्रमण का सामना करने में सक्षम हो जाती है।
सिंचित फसल में कीट के शलभ आकृषित होते हैं। अत: हल्की सिंचाई करनी चाहिए। जलभराव की स्थिति में इस कीट द्वारा अधिक क्षति पहुंचाई जाती है।
नत्रजनीय उर्वरकों की अधिक मात्रा भी इस कीट को आकर्षित करती है।
फसल के प्रारंभिक अवस्थाओं में पत्तियों पर उपस्थित टॉप बोरर कीट के नर एवं मादा को सुबह या सांय के समय हाथ से पकड़ कर आसानी से मारा जा सकता है। पत्तियों पर पाए जाने वाले अंड समूह को एकत्रित कर नष्ट करने तथा प्रभावित गन्ने को काट कर नष्ट कर टॉप बोरर कीट का प्रभावशाली नियंत्रण संभव है। चोटी बेधक के अंड परजीवी परजीवी ट्राईकोग्रमा जापोनिकम के पांच ट्राईको कार्ड प्रति हेक्टेयर की दर से जुलाई के प्रथम सप्ताह से अगस्त माह तक 20 दिनों के अंतराल पर खेत में छोड़ने से कीट के अंडे परजीवी द्वारा समाप्त कर दिए जाते हैं जिनसे सुड़िया नहीं निकलती और फसल की सुरक्षा हो जाती है। यदि संभव हो तो वाटर सूट (कल्ले) ना छोड़े जाएं।
पूर्व से ही सावधानी को ध्यान में रखते हुए 2 कुंड के मध्य के बीच की दूरी को भी बढ़ाकर ट्रेंच तकनीकी का प्रयोग करने से इस को कंट्रोल करने में सहायता मिलेगी। फसल में 10 प्रतिशत से अधिक नुकसान होने की दशा में क्लोरेंट्रानिलिप्रोल की 150 मिलीलीटर मात्रा 400 लीटर पानी में घोल बनाकर पौधों की जड़ों में ड्रेंसचिग करने से अच्छे परिणाम प्राप्त हुए हैं।

