Saturday, March 14, 2026
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एक धु्रवीय दुनिया बनाने की ओर अग्रसर ट्रंप

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बहुत वर्ष नहीं बीते हैं जब यह दुनिया दो खेमे में बंटी हुई थी जिसमें अमरीकी नेतृत्व में पूंजीवादी और इस्लामिक देश तथा सोवियत संघ के नेतृत्व में साम्यवादी देश विश्व को तथा संयुक्त राष्ट्र संघ को चला रहे थे और शीतयुद्ध के नाम पर आपस में नूरा कुश्ती भी कर रहे थे। भारत, क्यूबा, मिश्र और यूगोस्लाविया के नेतृत्व में गुट निरपेक्ष देशों का एक पृथक संघ भी था जो हकीकत में सोवियत संघ की तरफ झुका हुआ था और उसका ही एक अप्रत्यक्ष विस्तार था। समय बदला, सोवियत संघ में शामिल बहुत से देश रूस से अलग होकर पश्चिमी खेमे में चले गए और साम्यवादी खेमा आर्थिक तथा सैनिक दृष्टि से कमजोर हो गया। उसके कमजोर होते ही गुटनिरपेक्ष आंदोलन भी कमजोर हो कर बिखर गया और क्यूबा को छोड़कर अधिकांश देश अमरीका के पाले में खड़े दिखाई देने लगे। ठीक यही समय था जब चीन अपने खोल से निकल कर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक बड़ा खिलाड़ी बन कर उभरने लगा और रूस की जगह लेने को उतारू हो गया। अफ्रीका, एशिया और लेटिन अमरीका के छोटे छोटे देशों में उसने व्यापार और आसान कर्ज़ के बहाने अपना प्रभाव जमाना आरंभ कर दिया।

अब इस परिस्थिति में एक बार फिर से दुनिया दो ध्रुवीय होती दिखाई देने लगी। चीन और रूस मिलकर एक ध्रुव का निर्माण करने लगे और अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल तक ऐसा होता दिखाई भी देने लगा। ट्रम्प के दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने के बाद से जो घटनाएं घटित हुई, उनसे यह भ्रम भी टूटता सा नजर आने लगा। अमरीका और नाटो देशों ने रूस को अनिर्णीत रूप से जारी युक्रेन युद्ध में उलझाकर उसकी आर्थिक और सैन्य क्षमताओं की सीमाओं को जग जाहिर कर दिया। चीन ने मध्यपूर्व में जो अपना प्रभाव बढ़ाया था उसे भी कम करने के लिए यूएसए ने सऊदी अरब, कतर, तुर्की तथा पाकिस्तान से विभिन्न सैन्य और व्यापार समझौते करके कमजोर किया। यही नहीं चीन और भारत के प्रभाव-क्षेत्र वाले नेपाल और बांग्लादेश में अपनी एजेंसियों के माध्यम से छद्म जन-आंदोलन चलवाकर वहां नेतृत्व परिवर्तन करा दिया और अपने समर्थक लोगों को शासन में बैठा दिया।

अब ट्रम्प ने चीन और रूस की कूटनीतिक शक्ति को ध्वस्त करने के लिए जो सबसे बड़े अभियान चलाये वे थे ईरान और वेनेजुएला में। ईरान एक अघोषित परमाणु शक्ति है और वहां तेल के बड़े भंडार भी हैं। चीन और रूस से उसकी गहरी सैन्य और आर्थिक मित्रता रही है। ऐसे में ईरान को कमजोर करने के लिए इस्राइल से ईरान पर हमला करवाकर तथा अपने सैन्य विमानों से उसके परमाणु ऊर्जा संयंत्रों पर बम बरसा कर उसने चीन और रूस को सीधे चुनौती दी और ये दोनों देश केवल वक्तव्य जारी करके और संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्ताव पेश करके रह गए। दूसरा निर्णायक झटका ट्रम्प ने वेनेजुएला में घुस कर वहां बलात शासन परिवर्तन करके तथा राष्ट्रपति मादुरो को सपत्नीक गिरफ्तार करके अमरीका ले जाकर दिया। वेनेजुएला दक्षिणी अमेरिका का एक तेल संपन्न देश है जिसके पास दुनिया के कुल तेल रिजर्व का लगभग 18 प्रतिशत भाग है।

अमरीका की निगाह बहुत पहले से ही इस तेल संपदा पर लगी हुई थी और वह वेनजुएला को अपने प्रभाव क्षेत्र में लेने के लिए प्रयासरत था जो राष्ट्रपति मादुरो के रहते संभव नहीं हो पा रहा था। वेनेजुएला द्वारा पेट्रोडालर की जगह यूआन आदि मुद्राओं को तेल निर्यात में स्वीकार करने के फैसले ने भी आग में घी डालने का काम किया। चीन और भारत वेनेजुएला से काफी रियायती दरों पर तेल खरीदते थे और रूस से भी उसके अच्छे रिश्ते थे। रूसी हथियार काफी मात्रा में वेनेजुएला ने खरीदे हुए हैं। यहां भी राष्ट्रपति ट्रम्प ने संयुक्त राष्ट्र संघ और दुनिया के समस्त देशों को अंगूठा दिखाते हुए अपनी मनमानी कर ली तथा उस खतरनाक नीति का परिचय दिया जिसमें विश्व आर्डर को सैन्यबल के द्वारा अमरीका के अनुरूप ढ़ालने की बात छुपी है।

अब धीरे धीरे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि विश्व ट्रम्प के नेतृत्व में एक ध्रुवीय होने की तरफ अग्रसर है जिसमें दूसरा ध्रुव चीन और रूस के नेतृत्व में बहुत ही छोटी भूमिका में सिमटता जा रहा है। यह स्थिति द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में जर्मनी और हिटलर के उभरने की परिस्थितियों की तरफ इशारा कर रही हैं। विश्व के देशों को अमरीका और ट्रम्प को इस दादागिरी एवं दुस्साहस से रोकना ही होगा। भारत इस व्यवस्था में बहुत ही नीचे की पायदान पर है क्योंकि ना तो वह सैन्य रूप से और ना ही व्यापारिक रूप से किसी अन्य देश को प्रभावित करने की क्षमता में है । धीरे धीरे मजबूरी में उसे भी अमरीका और ट्रम्प की छतरी के नीचे आना ही होगा क्योंकि चीन उसका हितैषी हो नहीं सकता और पुराने दोस्त रूस ने अपनी अंतरराष्ट्रीय साख और ताकत को कमजोर कर लिया है।

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