Wednesday, April 29, 2026
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अमेरिकी हेकड़ी और दुनिया

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अमेरिकी हेकड़ी और दुनिया 2

नए साल के तीन दिन भी नहीं बीते थे कि खुद को दुनिया का चौधरी समझने वाले अमेरिका ने अपनी हेकड़ी दिखाते हुए उन आशंकाओं को और गहरा कर दिया, जिनके तहत कहा जा रहा था कि इस साल नये शीतयुद्ध या कि चौथे विश्वयुद्ध के काले बादल हमारी धरती को की और अनर्थों के हवाले कर सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनय और कानून की कौन कहे, अपनी कांग्रेस तक को किनारे धकेलते हुए उसने वेनेजुएला में जो हिमाकत की है और उसके बाद की और देशों को वैसे ही हश्र के लिए तैयार रहने की जो धमकी दी है, उसे बस इसी एक रूप में देखा जा सकता है। सच पूछिए तो उसकी इस दादागिरी में इस एक बात को छोड़कर कुछ भी नया नहीं है कि वर्तमान एक-ध्रुवीय दुनिया में उसकी निपट निरंकुश बदगुमानियां अपने उस इतिहास को बार-बार दोहराती रहना चाहती हैं, जो गवाह है कि वह किसी भी ऐसे देश की सम्प्रभुता व स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करता जो उसके राष्ट्रीय स्वार्थों के तनिक भी आड़े आता है।

विडम्बना यह कि चौधराहट की लिप्सा से भरे उसके ये राष्ट्रीय स्वार्थ कभी नहीं बदलते-डेमोक्रेट सत्ता में हों तो भी और रिपब्लिकन सत्ता में हों तो भी। इन स्वार्थों की पूर्ति के लिए जघन्य से जघन्य चौधराहट बरतते हुए भी वह अपने को ‘दुनिया का सबसे महान लोकतंत्र’ बताता रहता है। शायद इसलिए कि उसके निकट लोकतंत्र का अर्थ दुनिया की सारी उपलब्धियों को ऊपर ही ऊपर लोक और लूटकर अपने नाम कर लेने का नाम है। तिस पर बेशर्मी की हद यह कि उसके अलबेले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते हुए अनेक युद्धों को रुकवाने के नाम पर अपने लिए नोबेल शांति पुरस्कार की मांग और उसके पक्ष में लाबीइंग करते रहते हैं। लगभग उसी तर्ज पर जैसे उनका देश दुनिया के अनेक देशों की चुनी हुई सरकारों को अपदस्थ कर वहां अपनी कठपुतली सरकारें बनवाने के लिए अनेक प्रपंच (जिनमें आतंकवाद को पैदा करना व शह देना भी शामिल है) रचते हुए आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध के ‘नेतृत्व’ की डींग भी हांकता रहता है। उसके इतिहास में अनेक ऐसी नजीरें हैं, जब उसने किसी देश में खुद आतंकवाद को प्रश्रय देकर उसकी तोहमत उस पर मढ़ दी और अपने स्वार्थ साध लेने के बाद उधर से आंखें मूंद लीं या चुप्पी साध ली।

यहां याद किया जा सकता है कि 2003 में उसने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर 20 मार्च को यह कहते हुए इराक पर हमला कर दिया था कि इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन वहां सामूहिक विनाश के हथियारों का जखीरा रखे हुए हैं, जो अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हो सकता है। इस आक्रमण को उसने ‘आॅपरेशन इराकी फ्रीडम’ नाम दिया था, जो कितना बेवजह था, इसे इस तथ्य की रौशनी में समझ सकते हैं कि उसके द्वारा सद्दाम हुसैन को पकड़ कर फांसी दे देने के बाद भी इराक में सामूहिक विनाश के हथियारों का जखीरा होना कतई साबित नहीं हो पाया। न ही यही कि इराक क्योंकर उस कल्पित जखीरे की बिना पर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे पैदा कर रहा है। लेकिन इस सबको लेकर न अमेरिका कभी किंचित भी शरमाया और न खेद ही जताया।

आज की तारीख में वेनेजुएला की सम्प्रभुता व स्वतंत्रता को रौंदकर उसके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उठा ले जाने के लिए उसने ड्रग तस्करी व गैंगवार समेत जो तोहमतें लगाई हैं, उन्हें भी इसी रूप में समझा जा सकता है और एक पल को उसकी तोहमतों को तथ्य मान लिया जाये तो भी उनको इस तरह एक निर्वाचित राष्ट्रपति को उसके देश का मानमर्दन करते हुए पत्नी समेत उठा ले जाने का आधार बनाने की हिमायत नहीं की जा सकती। लेकिन क्या किया जाये कि अमेरिकी तर्क ‘तूने नहीं तो तेरे बाप ने पानी गंदा किया होगा’ को भी अपनी सीमा नहीं मानते। उससे भी आगे जाकर मार करते हैं और किंचित भी नहीं लजाते। लजाते तो खैर वे गांजा के कुटिल नरसंहारी इजरायल के सिर पर हाथ रखने में भी नहीं हैं। उसके लाखों खून, जिनमें हजारों दुधमुंहे बच्चों का खून भी शामिल है, माफ करते हुए वे शातिर ढिठाई से जताते रहते हैं कि अमेरिकी छतरी के नीचे आ जाने वाले लोगों द्वारा किए जाने वाले अपराधों को अपराध नहीं मानते।

ऐसे में यह समझना भूल होगी कि कुतर्कों की बिना पर वेनेजुएला पर उनका आक्रमण सिर्फ वेनेजुएला के खिलाफ आक्रमण है। यह वास्तव में दुनिया के हर उस देश व व्यक्ति के खिलाफ खुली चेतावनी है जो अमेरिकी साम्राज्यवादी इरादों से अलग रहकर अपना भविष्य खुद तय करना चाहता है। अकारण नहीं कि एक वक्त इराक के तेल पर कब्जे के लिए उस पर किये गये हमले और उसके लोगों की तबाही को सही ठहराने के लिए जैसे झूठ इस्तेमाल किए गए थे, वैसे ही झूठ अब वेनेजुएला के खिलाफ भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं, जिनका एकमात्र मकसद वेनेजुएला के लोगों पर अमेरिका समर्थित कठपुतली सरकार व औपनिवेशिक व्यवस्था थोपना और उसके तेल भंडार पर कब्जा जमाकर उसका दुरुपयोग करना है।

निस्संदेह, यह लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र में अमेरिकी हस्तक्षेप के खूनी इतिहास का नवीनतम अध्याय है, जिसमें चुनाव में हेरफेर करना, लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकारों को उखाड़ फेंकना, लोगों के आंदोलनों को दबाना, संप्रभुता व आत्मनिर्णय का अधिकार छीनना, खून-खराबा करना और विनाश, अधीनता, शोषण व दमन थोपना शामिल रहा है। इससे भी ज्यादा अफसोस की बात यह है कि इस वक्त दुनिया की जो स्थिति है, उसमें अमेरिकी चौधराहट अपने लिए कोई गम्भीर चुनौती नहीं देखती। क्योंकि न कोई ‘दूसरा ध्रुव’ बचा है और न ही संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा बनाए रखने, देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित करने, मानवाधिकारों को बढ़ावा देने और सामाजिक प्रगति हासिल करने के अपने उद्देश्यों को, जिनके लिए उसकी स्थापना की गई थी, पूरे कर पा रहा है। 193 देशों की सदस्यता के बावजूद अनेक निर्णायक अवसरों पर उसके द्वारा निभाई गई भूमिकाएं उसे बड़े व वीटो अधिकार सम्पन्न देशों के प्रभुत्व से आक्रांत संगठन की छवि से बाहर नहीं निकाल पातीं। तिस पर भारत द्वारा प्रवर्तित निर्गुट आंदोलन ने अपनी प्रासंगिकता ही खो दी है। जहां तक भारत का सवाल है, उसकी नरेंद्र मोदी सरकार खुद ही डोनाल्ड ट्रम्प की धमकियों से आक्रांत है और उससे पार पाने में ही अपनी सारी शक्ति लगाने को मजबूर है।

लेकिन यह सवाल अपनी जगह जस का तस है कि दुनिया भर के देश अमेरिकी बदइरादों को कब तक अविचलित खड़े रहकर चुपचाप देखते रहेंगे? और नहीं देखते रहेंगे तो? जवाब भले ही अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन उसके दुनिया भर के लिए चिंतनीय होने में कोई संदेह नहीं है।

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