- महानगर में आवारा गोवंश को लेकर निगम और पशुपालन विभाग ने खड़े किये हाथ
- दोनों विभागों के लापरवाह रवैय्ये से शायद जनता को नहीं मिल सकेगी निजात
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के द्वारा संचालित योजनाएं मेरठ महानगर में किस तरह से परवान चढ़ रही है। उसका अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है। आवारा गोवंश को लेकर जनपद में स्थलीय समीक्षा के लिये लखनऊ से कृषि उत्पादन आयुक्त विशेष सचिव (नोडल अधिकारी) के रूप में परिवेक्षक देवेंद्र कुमार कुशवाहा को नियुक्त किया गया था।
वह समीक्षा कर वापस लौट गये, लेकिन गोशाला एवं सड़कों पर हालात जस के तस बने हुए हैं। आज भी हजारों की संख्या में आवारा गोवंश सड़कों पर खूल में घूमता देखा जा सकता है। महानगर में आवारा गोवंश के सर्वे को लेकर नगर निगम व पशुपालन विभाग ने हाथ खडेÞ कर दिये हैं और आवारा गोवंश को लेकर दोनों विभाग आमने-सामने है।
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार कि सबसे बड़ी प्राथमिकता है, जिसमें आवारा गोवंश खेतों व सड़कों पर खुले में न घूमे, उसके लिये भी स्वयं मुख्यमंत्री अपने स्तर से संज्ञान ले रहे हैं। तभी तो उन्होने शासन स्तर से नोडल अधिकारी नियुक्त कर स्थलीय जांच के लिये प्रदेश के 75 जनपदों में 5 से 7 अप्रैल के बीच निरीक्षण के लिये भेजे थे।
वह जांच कर वापस लौट गये, लेकिन महानगर में आवारा गोवंश के हालात जस के तस बने हुये हैं। महानगर में आवारा गोवंश जो सड़कों पर खुले में घूम रहा है। उसके सर्वे और जनता को कब तक निजात मिल सकेगी। उसके लिये जनवाणी ने पशुपालन एवं नगर निगम विभाग के अधिकारियों से बात की दोनो ही विभागों ने आवारा गोवंश के सर्वे की जिम्मेदारी उनके विभाग की नहीं है।
यह कहते हुए हाथ खडेÞ कर दिये। लखनऊ से परिक्षेक के निरीक्षण के बाद भी हालात जस के तस बने हुये हैं और आवारा गोवंश से महानगर की जनता को कैसे निजात मिले। उसको लेकर कोई भविष्य के लिये प्लान भी तैयार दिखाई नहीं पड़ रहा। आवारा गोवंश जिसके द्वारा सड़कों पर सड़क हादसों में बढ़ोतरी एवं खेतों में फसलों को नुकसान जो हो रहा है।

उसके लिये दो जनवरी 2019 के बजट में गो आश्रय स्थल, कान्हा उपवन गोशालाओं के निर्माण के लिये प्रावधान किया गया। जिसमें प्रदेश के 75 जनपदों के लिये पहली बार में 1500 करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान किया गया था। उसके बाद बजट में करोड़ों रुपये का कई बार प्रावधान कर विभिन्न योजनाओं के माध्यम से धन को खर्च भी किया गया।
उसके बावजूद आवारा गोवंश की समस्या का समाधान नहीं हो सका। योजना के शुरू हुये 4 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन समस्या जनपद में जस की तस बनी हुई है। यदि कोई गोवंश व अन्य पशुओं को खुला छोड़ता है तो उसकी रोकथाम के लिये टेगिंग कराई गई थी। ताकि टेगिंग के आधार पर यह तय किया जा सके कि आवारा गोवंश किसने छोड़ा है। सरकार ने अच्छा खासा बजट टेगिंग पर खर्च किया था। महानगर में हजारों की संख्या में आवारा गोवंश घूम रहा है, लेकिन निगम एवं पशुपालन विभाग आंखें मूंदे बैठा है।
सर्वे एवं पशुओं में टेगिंग का कार्य पशुपालन का होता है। नगर निगम का कार्य आवारा गोवंश का सर्वे कराने का कार्य नहीं है। वह तो जहां से शिकायत या सूचना मिलती है। उन जगहों से गोवंश पकड़कर गोशाला भिजवा देता है। ज्यादातार आवारा गोवंश के मामले की जिम्मेदारी पशुपालन विभाग की होती है, नगर निगम की नहीं।
-डा. हरपाल सिंह प्रभारी चिकित्सा एवं चिकित्सा स्वास्थ्य एवं कल्याण अधिकारी नगर निगमआवारा गोवंश के सर्वे एवं उन्हे पकड़ने का कार्य नगर निगम का होता है। पशुपालन विभाग का कार्य आवारा गोवंश के सर्वे का नहीं जिन पशुओं को नगर निगम पकड़ता है। उनकी टेगिंग करना व बीमारी आदि की देखभाल करने का होता है। -डा. अखिलेश गर्ग, मुख्य जिला पशु चिकित्साधिकारी

