- स्वामी प्रसाद मौर्य, धर्मसिंह सैनी, अवतार सिंह भड़ाना, दारा सिंह चौहान, हरपाल सिंह सैनी सरीखे नेताओं ने भाजपा को छोड़कर दिया बड़ा झटका
- भाजपा को मिल रही चुनौतियां, कैसे निपटेंगी पार्टी
रामबोल तोमर |
मेरठ: हाड़कंपा देने वाली ठंड पड़ रही हैं। सर्दी के इस मौसम में लोग घरों में दुबके हुए हैं, लेकिन यूपी की सियासत दलबल से गरमा गई है। प्रथम चरण के लिए आज से प्रत्याशियों का नामांकन आरंभ होगा। ऐसे में भाजपा में जिस तरह से इस्तीफा देने की होड़ लगी हैं, इससे भाजपा को बड़ा झटका लगा है।
यह वैसे ही हो रहा है, जैसे भाजपा ने पश्चिमी बंगाल और उड़ीसा में इसी हथियार को इस्तेमाल किया था। पश्चिमी बंगाल में उसे अच्छी सीटें जरूर मिलीं, लेकिन उड़ीसा में उसका यह फार्मूला सफल नहीं रहा था। यह बात दीगर है कि इस फार्मूले ने उसे पश्चिमी बंगाल में विपक्षी पार्टी के रूप में स्थापित कर दिया। यक्ष प्रश्न यह है कि क्या इस बार समाजवादी पार्टी जिस तरह से भाजपा का ही हथियार अपना रही है।
क्या इसमें सपा को कामयाबी मिलेगी? हर बार की तरह इस बार भी सियासत में चुनाव से पहले दलबदल का खेल शुरू हो गया है। कुछ उसी तर्ज पर जैसे भाजपा ने वर्ष 2017 में बसपा के बड़े नेताओं को तोड़कर किया था, लेकिन इस बार भाजपा के उसी सियासी तीर को समाजवादी पार्टी ने अपना लिया है। देखना होगा कि इस बार यह दल बदल राजनीतिक दलों के लिए कितना फायदेमंद होगा?
प्रदेश में पैर जमाने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने जब काम शुरू किया तो अपने का डर के अलावा उसे दूसरे दलों के बड़े नेताओं का सहारा लेना पड़ा था। सपा के मुकाबले में उस वक्त एक विकल्प बन सकने वाली बहुजन समाज पार्टी के असंतोष का उसने फायदा उठाया। नतीजतन, बसपा के कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक, धर्मसिंह सैनी, दारा सिंह चौहान आदि भाजपा में आए।
अब बड़ा सवाल यह है कि स्वामी प्रसाद मौर्य, धर्मसिंह सैनी, दारा सिंह चौहान, पश्चिमी यूपी के बड़े गुर्जर नेता अवतार सिंह भड़ाना ने भी भाजपा को अलविदा कह दिया। धर्म सिंह सैनी का बड़ा नाम हैं। वह भाजपा में कैबिनेट मंत्री थे, अचानक इस्तीफा देने से पश्चिमी यूपी के पिछड़ों में हलचल पैदा हो गई है।
सपा की यह रणनीति कितनी कारगर होती है, यह तो फिलहाल भविष्य के गर्भ में हैं, मगर इतना अवश्य है कि यूपी की सियासत में जो तूफान खड़ा हो गया हैं। यह तूफान भाजपा कैसे रोक पाएगी? यह भी भाजपा नेताओं के लिए बड़ी चुनौती से कम नहीं हैं। कांग्रेस को इमरान मसूद अलविदा कह चुके हैं। पंकज मलिक और उनके पिता हरेंद्र मलिक पहले ही कांग्रेस को छोड़ चुके हैं।
इस तरह से कांग्रेस में इमरान मसूद, पंकज मलिक ऐसे नाम थे, जो पश्चिमी यूपी की सियासत में अपना वजूद रखते हैं। कांग्रेस जब यूपी से खत्म हो चुकी थी, तब पंकज मलिक और इमरान मसूद ने भी उसका दामन थामा और कांग्रेस के लिए वजूद की लड़ाई भी लड़ी थी। इससे कांग्रेस को भी बड़ा झटका लगा है। पंकज मलिक को सपा ने अपना प्रत्याशी भी घोषित कर दिया हैं।

