Friday, February 20, 2026
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वंदे पुतरम

 

Ravivani 28


वन्दे मातरम मालूम भी था और जेहन में भी यही था। घर में बचपन से अम्मा को सबके लिए जीते देखा था तो लगता एक यही रिश्ता है जो निशर्त और निशर्त सिर्फ़ आपकी सेवा करता है। आप रोते हैं तो रोती है, आप हंसते है तो मुस्कुरा देती है। बाबूजी कहते थे, ‘बाप को गोली मार दो और गया में पिंड दान कर दो तो पित्र ऋण से मुक्ति मिल सकती है। लेकिन जो मां अपने पेट में नौ महीने पाल आपको रक्त, मज्जा और हड्डी देती है उससे आप कभी उसके ऋण से मुक्त नहीं हो सकते। अम्मा की छोटी-मोटी चालाकियों को भी उनकी मजबूरी समझ नजरअन्दाज कर देती लेकिन फिर लगता क्या उनके भी दो रूप हैं?

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अपने मुसलमान दोस्तों को भी देखती तो वो भी लगभग ऐसी ही सोच रखते हैं कि मां के कदमों के नीचे जन्नत होती है। ना केवल पेट में थोड़े समय तक हम मां का दूध पीकर ही बड़े होते हैं। मेरी शादी में तो विदाई पर अम्मा बेहोश ही हो गयी थी। अम्मा ने बरसों से बुने अपने सपने मेरी गठरी में बांध दिए थे, मानो उनके अरमान ही खत्म हो गए हों। ऐसा ही और कहिए इससे ज्यादा वो अपने बेटे यानी भाई से रखती थीं। भाई को खांसी भी आए तो दर्द अम्मा की छाती में होता था। सचमुच मेरी अम्मा पूजनीय थीं।

शादी हुई तो मां मिली जिनकी चिकनी चिकनी बीबाई, हाथ चिकने और साफ सुथरी कॉटन की प्रेस हुई साड़ी और पूरे घर पर उनका कमांड, अम्मा से बिलकुल विपरीत। मुझे एक नई दुनिया के दर्शन हुए। बच्चे ही मां-मां करते आगे पीछे करते। पूरे घर की चाबी, पैसों की आलमारी…सब पर मां का एकछत्र राज्य था। पूरे समय मुझे कम दहेज का उलाहना देती रहीं, लेकिन मजाल है कि किसी ने आवाज उठाई हो।

बल्कि सो कॉल्ड प्रबुद्ध आईआईएम में फैकल्टी पति, जो मेरे सहकर्मी भी थे, ने उल्टे मुझे ही समझाया,‘अरे मुझे कोई भी कम से कम बीस लाख दहेज दे दे देता, वो तो मैं तुम्हारे प्यार में पड़ गया। किसी का भी इतना नुकसान हो तो वो तो बट नैचरल है चिल्लाएगा ही। शुक्र मानो तुम्हें बाल खींच घर से बाहर नहीं निकाला। हमारे गांव में तो सास बहू को मारती भी है और बहू चुप रहती है।’

मैंने अपने डार्लिंग का एक नया रूप देखा। शादी में पति की एकलौती बहन आई थी, वो भी मां की सेवा में लगी रहती। जब मां बाबूजी सोते तो बेचारी ननद अपनी चार महीने की बेटी को पेड़ के नीचे बगीचे में सुलाने जाती। पूरे घर में सन्नाटा छा जाता कि मां सोने जा रही हैं। पहले मां बाबूजी खाना खाते और जो बच जाता वो हम सब। मुझे लगा मुझे अपने हक के लिए लड़ना पड़ेगा पर यहां तो सबने हथियार डाले हुए थे। शादी के बाद देवर को लगा कि भाभी को पास के ढाबे में ले जाकर वहां की फेमस धाबेली खिलाना चाहिए, जो उन दिनों दस रुपए में आती थी। पति और देवर दोनों की जेब खाली थी, सारे पैसे मां के पास रहते थे।

मां से मिन्नतें की गईं, जो ठुकरा दी गईं। बड़े मुश्किल से दूसरे दिन उन्होंने फेंक कर तीस रुपए दिए। गाड़ी तो ससुर की कम्पनी की थी ही, शान से बैठ कर उस ढाबे में गए। वहां जाकर दोनों भाई ऐसे खा रहे थे, मानो छप्पन भोग खा रहे हों। मुझे चाय की तलब लगी, पर दोनों भाइयों या कहिए हम तीनों की जेब खाली थी। एक बार भी मां के पैसे देने में नानुकूर करने की शिकायत नहीं, बल्कि तीस रुपये देने के लिए आभारी थे। घर पर कोई भी मिठाई आती पहले मां उन्हें गिनती फिर एक एक सबको देती। बीच-बीच में उनके बेटे ही निकाल खा जाते तो दोबारा फिर गिन पूछती कि ‘किसने खाया?’ नौकर चाकर तो डरे रहते और उनसे दूर-दूर ही रहते।

ऐसी अनेक घटनाएं मुझे मजबूर करती थीं कि मैं पति और देवर को कहूं,‘वन्दे पुतरम’। एक दिन ससुर जी को बड़ा जोश आ गया कि नई बहू को जो पैसे शादी में बतौर कैश गिफ़्ट में मिले थे, से एक गहना दिलाया जाए। मां तो गुस्से में फनफना रहीं थी और बार-बार मेरे घर वालों को दहेज ना देने का ताना दिए जा रही थीं। दोनों वन्दे पुतरम चुपचाप बुत बने मां का ड्रामा देख रहे थे। अचानक ससुर जी और मेरे पति की मर्दानगी जाग उठी और दोनों मां पर चिल्लाने लगे।

मां डर गईं और मार्केट जाने के लिए मान गईं। वहां जाकर तो मां ने जो कहर मचाया वो तो सबकी सोच से परे था। गहने के बजाय एक साड़ी की दुकान में घुस गईं, मरते क्या ना करते हम लोग भी उसी दुकान में जा पहुंचे। वहां पति देव ने मेरे लिए बहुत अच्छी साड़ी पसंद की और दुकानदार से पैक कर बिल देने के लिए कहा। सब कुछ तैय्यार हो गया, लेकिन पैसे तो मां के पर्स में थे। जैसे ही पति ने पैकेट और बिल हाथ में लिया तो मां वहां नजर नहीं आईं। यहां वहां ढूंढ़ा तो पाया मां तो पर्स ले बाहर खड़ी हैं। मां को साड़ी पसंद नहीं आई इससे वो बाहर चली आईं। तीनों पुरुषों की इसकी आदत थी, इसलिए उन्हें सब नॉर्मल ही लगा। मेरा तो गुस्सा खौल रहा था।

चुपचाप इसलिए रही क्योंकि उसके सिवा और कोई चारा भी जो ना था। खैर किसी तरह वहां पंद्रह दिन बिताए और फिर हम बैंगलोर के लिए निकल पड़े। इसी बीच ऐसी कई घटनाएं हुईं, जो बार-बार मुझे पुत्र देवो भव कहने पर मजबूर करी थीं।

हमारी ज़िन्दगी ठीक-ठाक ही चल रही थी सिवाय इसके कि साल में एक महीने के लिए मां जरूर आतीं और कभी मेरी चप्पल जैसी लाल चप्पल तो कभी मेरे कंगन जैसे कंगन की डिमांड और बेटा सब कुछ छोड़ बड़ी शिद्दत से अपनी मां की फरमाइश पूरी करने में लग जाता। एक बार तो हद्द ही हो गई, मेरी चप्पल लाल रंग की थी और उस दुकान में ठीक वैसी चप्पल जामुनी रंग में थी। मुझे लगा चप्पल का कॉम्प्टिशन था रंग का नहीं, मैं ले आई। मां ने चप्पल फेंक दी कि उन्हें लाल ही चप्पल चाहिए।

मुझे भी गुस्सा आया मैंने पति से कहा,‘हद है तुम्हारे मां के शौक की! इस उमर में भी लाल चाहिए मेरी ले लें।’ पति ने आव देखा ना ताव, मेरे गाल पर एक तमाचा जड़ दिया। मैं तो जैसे पागल हो गई और अहम की चोट मजबूर कर रही थी कि इस आदमी को छोड़ना ही बेहतर है। पति ने माफी मांगी और दोस्तों ने सुलह करवाई पर मां टस से मस नहीं हुईं, बल्कि अपने बेटे के मुझ पर हाथ उठाने को मर्दानगी की संज्ञा दी। हमारी एक हफ़्ते की मूक लड़ाई ने उन्हें बड़ा बल दिया।

मैं हर बार अवाक हो जाती कि इस बेटे का मां के लिए इतना प्यार कैसे है, जबकि मां में ऐसी चीज कोई भी न थी, जिसके लिए बेटे दीवाने हों। फिर मेरा बेटा हुआ, पर यहां समीकरण ठीक उल्टे थे। मैं बचपन से ही अपने बेटे की दीवानी थी। उसके लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार थी। यहां तक कि किचन में भी काम करते वक़्त वो मेरी पीठ पर बंधा रहता। पति चिढ़ाते कि,‘तुम तो बस वन्दे पुतरम करती रहो। बेटा क्या आया तुम्हारी तो दुनिया बदल गई।’

रात को बेटा मेरी छाती पर चढ़ कर सोता, कई बार तो सांस भी रुक सी जाती, लेकिन मजाल है कि मैंने खुद से शिकायत की हो। बेटा सारी सब्जियां डलवा कर मुझसे वेजिटेबल पुलाव बनवाता, फिर मैं सारी सब्जियां चुन कर बाहर निकालती। मैं और बेटा शाम को रोज पास के मैदान में खेलने जाते। मैं बॉलिंग करती और बेटा बैटिंग, मैं सिर्फ़ इधर से उधर दौड़ कर बॉल उठा बेटे को देती। एक अजब-सा रिश्ता था, जो कभी मुझे खुद से भी शिकायत नहीं करने देता था। शायद सभी मांएं इसी तरह होती हैं।

एक बार तो हद ही हो गई, जिसका पता आज तक पति देव को नहीं है। बैंगलोर के चिन्नास्वामी स्टेडियम में इंडिया वेस्टइंडीज का क्रिकेट मैच होने वाला था और दोनों टीम एक दिन प्रैक्टिस और दूसरे दिन मैच के लिए आने वाली थीं। बेटे ने ज़िद पकड़ ली कि कैप्टन सौरभ गांगुली से हाथ मिलाना है, बस फिर क्या था मेरा दिमाग लग गया कि इसे कैसे अंजाम दिया जाए। उन दिनों सेल फोन भी नहीं थे। खुद स्कूटर से इधर-उधर चक्कर लगाया, लेकिन निराशा ही हाथ लगी, क्योंकि सारी टिकट बिक चुकी थीं।

मैच के एक दिन पहले मैं टीम आने के पहले बेटे को लेकर स्टेडियम पहुंच गई। वहां टू व्हीलर पार्किंग स्टैंड के मालिक के पास पहुंच उससे मिन्नतें कीं कि बेटे को क्रिकेट टीम से मिला दिया जाए। मेरी बेचैनी और पुत्र प्रेम देख उसे भी दया आई और उसने एक महिला कॉन्स्टबल से मिन्नत की कि वो मेरे बेटे को अपने साथ अंदर ले जाए और अपना छोटा भाई बताकर उसे वहां सौरभ गांगुली के दर्शन करा दे।

उस कॉन्स्टेबल को मुझ पर रहम आ गया शायद वो भी किसी की मां थी और अपना बिलखता बच्चा घर छोड़ आई थी, बस फर्क़ इतना था कि मेरे दिमाग की तरह उसके दिमाग ने छलांग नहीं लगाई थी कि ये भी किया जा सकता था। उसके बाद कॉन्स्टेबल और बेटा अंदर, गेट पर बड़ा-सा ताला, सुरक्षाबलों और पुलिस का पहरा। बेटा अंदर स्टेडियम में और मैं बाहर टू व्हीलर स्टैंड के मालिक के साथ एक टूटी चेयर में बैठी बेटे के इंतजार में। विशाल स्टेडिम के इतने सारे गेट, लगभग भूल भूलैय्या की तरह, डर-सा लगने लगा अगर बेटा गुम गया तो। ये तो मालूम था कि जब सौरभ गांगुली को पहचानता है तो मां-बाप का नाम तो मालूम ही है।

उन दिनों सेल फोन भी नहीं था, इससे पति देव को भी मालूम नहीं था कि हम कहां हैं? ये एक तस्सली थी। बेटे के अंदर जाने के घंटे भर बाद खिलाड़ियों की बस आई और बंदूक धारियों के साथ सारे अंदर चले गए। चूंकि मैं दरवाजे के पास ही थी, इससे सारे खिलाड़ियों की एक झलक मुझे भी मिल गई। उसके बाद तो मेरी जो धड़कनें तेज हुईं कि अगर…मेरा बेटा ना आया, किड्नैप हो गया तो क्या करूंगी?

चार घंटे बाद खिलाड़ी बाहर निकले और उसके बाद पूरी सुरक्षा बलों और पुलिस की सेना। बेटे का तो दूर-दूर तक पता नहीं था। मैं बदहवास कभी इस गेट तो कभी उस गेट की तरफ दौड़ रही थी। किस्मत से सिर्फ़ प्रैक्टिस मैच था इससे लोगों की भीड़ भी नहीं थी। अचानक बेटू ने पीछे से आकर मेरी चुन्नी का कोना पकड़ लिया,‘मम्मा मैंने सौरभ से हाथ मिलाया। उन्होंने मेरे गाल भी खींचे।’
मेरी सांस में सांस आई। बिना यहां-वहां देखे मैंने बेटे की उंगली पकड़ी, आॅटो लिया और सीधे घर। आज भी वो कॉन्स्टेबल और साइकल स्टैंड वाला मुझे याद करते होंगे कि,‘एक थी मां।’

मेरा ये वन्दे पुतरम का जज्बा समय के साथ बढ़ता गया और पति का मां के प्रति लगाव बरकरार रहा। मां बुढ़ापे के साथ और जटिल होती गईं। पति मुझे टोकते,‘ये तुम जो दिन भर बेटे के आगे डोलते रहती हो ना, छोड़ो ये और अब पति की भी वंदना करो। क्या सोच रही हो ये रहेगा तुम्हारे साथ? अभी शादी तो होने दो।’

मैं सोचती काश…तुम भी ऐसे होते। शादी के बाद अपनी मां से अपनी नाभि काट कर अलग कर पाते।

बेटा बड़ा हो गया और उसके जीवन में उसकी गर्ल फ्रेंड भी आ गई। जब भी बाहर जाता है, मेरे टोकने पर कहता है,‘माइंड योर बिजनेस, स्टॉप पैरेंटिंग मी! आई एम ग्रोन अप, मैं कहां जाता हूं, किससे मिलता हूं, आपसे इसका कोई वास्ता नहीं। स्टॉप आस्किंग, थोड़ा पति पर ध्यान दें, दिन भर अपनी मां से चिपके रहते हैं।’

वहां पति और उनकी विधवा मां का बॉन्ड और बढ़ता जा रहा है। मां कभी नए कंगन तो कभी नई चप्पल अपने बेटे के साथ खरीद रही है और मेरा बेटा अपनी गर्लफ्रेंड की नई-नई फरमाइशें पूरी करने में व्यस्त है।

पति वन्दे पुतरम यानी ऐसा भी बेटा होता है का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं और यहां मैं खाली हाथ वन्दे पुतरम यानी पुत्र कि अंध भक्ति में लीन हूं।

डॉ संगीता झा


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