Thursday, February 12, 2026
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विक्रम गोखले और मीडिया का पीपली लाइव

Ravivani 33


23 नवंबर 2022 को मीडिया के बड़े वर्ग से जो गलती हुई, उसने पत्रकारिता के मौजूदा हालात को बेपर्दा तो किया ही साथ ही 2010 में रिलीज हुई फिल्म पीपली लाइव की भी याद दिला दी। बॉलीवुड और मराठी सिनेमा के वेटरन एक्टर विक्रम गोखले के क्रिटिकल अंगों ने 23 नवंबर को काम करना बंद कर दिया। 77 साल के विक्रम गोखले को 5 नवंबर को पुणे के दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। दिल और गुर्दे से जुड़ी दिक्कतों से जूझ रहे विक्रम गोखले 23 नवंबर दोपहर को कोमा में चले गए।

उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया। लेकिन 23 नवंबर की शाम होते होते कई मीडिया हाउसेज ने एक्टर-निर्देशक अनंत महादेवन के हवाले से विक्रम गोखले के निधन की खबर जारी कर दी। डिजिटल पोर्टल्स पर धड़ाधड़ पब्लिश होने से सोशल मीडिया पर भी विक्रम गोखले को श्रद्धांजलि देने का तांता लग गया। एक्टर अजय देवगन ने पोस्ट में विक्रम गोखले को भावभीने शब्दों में याद किया। बुधवार आधी रात को एक अंग्रेजी अखबार के एंटरटेन्मेंट पोर्टल ने विक्रम गोखले की पत्नी व्रुषाली गोखले के हवाले से निधन की खबर को अफवाह बताया।

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व्रुषाली गोखले ने ये भी बताया कि उनके पति की उम्र 82 साल नहीं 77 साल है। दिलचस्प है कि 23 नवंबर को विक्रम गोखले के निधन की सूचना देने वाली सभी रिपोर्ट्स में विक्रम गोखले की उम्र 82 साल ही बताई गई। साफ है कि जिस पोर्टल या मीडिया हाउस ने सबसे पहले जैसे खबर दी, उसे बाकी सब ने भी आंख मूंद कर चेप दिया। इसीलिए हर जगह विक्रम गोखले 82 साल के ही दिखे। निधन की खबर पब्लिश करने से पहले किसी ने उनके किसी परिजन, डॉक्टर या अस्पताल से पुष्टि करने की जेहमत भी नहीं उठाई।

अगर ऐसा किया होता तो यूं शर्मसार नहीं होना पड़ता। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने सच्चाई सामने आने पर खबर को ठीक कर लिया। लेकिन जिन अखबारों ने इसे छाप दिया, वो कैसे गलती ठीक करते? क्यों किसी सेलेब्रिटी के गंभीर रूप से बीमार होने पर बुरी खबर देने की जल्दी हो जाती है। यूट्यूब, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और वॉटसऐप पर कथित बुरी खबर को जल्दी से जल्दी पोस्ट करने के लिए हमारी उंगलियां मचलने लगती हैं। सोशल मीडिया पर कोई नियामक अंकुश नहीं लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया अगर किसी शख्स के निधन की पुष्टि किए बिना ही खबर जारी कर देता है तो वो अक्षम्य है।

1857 गदर का शहर बनाम नाथूरामगोडसेनगर!

मेरठ में जन्म और पढ़ाई होने की वजह से इस शहर की सबसे बड़ी पहचान मेरे लिए हमेशा यही रही- 1857 गदर से मेरठ का जुड़ाव। बाबा औघड़नाथ मंदिर (काली पलटन मंदिर के नाम से मशहूर) की पवित्र जमीन से शुरू हुआ क्रांति का वो अलख जिसका नतीजा 90 साल बाद 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजी हुकूमत से स्वतंत्रता के रूप में मिला। इस स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूतों में माने जाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को 30 जनवरी 1948 को गोली मार कर मौत की नींद सुला दिया गया।

अहिंसा के पुजारी बापू की हत्या करने वाले शख्स का नाम था- नाथूराम गोडसे। अब उसी गोडसे के नाम पर मेरठ शहर का नाम बदले जाने की आवाज मेरठ से ही उठी है। ये आवाज उठाने वाला संगठन है-हिन्दू महासभा। 22 नवंबर 2022 को मेरठ में इस संगठन ने प्रेस वार्ता के दौरान दिसंबर में प्रस्तावित शहरी निकाय चुनाव लड़ने का ऐलान किया।

हिन्दू महासभा ने चुनाव घोषणापत्र जारी करने के साथ ये इरादा भी जताया कि अगर चुनाव में उनका मेयर चुन कर आता है तो मेरठ का नाम बदल कर नाथूरामगोडसे नगर कर दिया जाएगा। हिन्दू महासभा ने साफ किया कि उसका नाली, खड़ंजों, सड़क जैसे मुद्दों से कोई लेना देना नहीं है, उनका मुद्दा गांधीवाद को मिटाना और गोडसेवाद को फैलाना है। ‘ग’ से गांधी, ‘ग’ से गोडसे। वाकई शरीर नश्वर होता है लेकिन विचार अजर अमर रहता है…हे राम!

स्लॉग ओवर

दो पक्की सहेलियों में से एक की शादी तय हो गई।
शादी वाली से दूसरी सहेली ने पूछा- और शादी की सब तैयारियां हो गईं?
शादी वाली सहेली- हां, दोनों सिम नाले में फेंक दिए, फोन भी फॉर्मेट कर दिया, फेसबुक भी बंद कर दिया। बस तू अपना मुंह बंद रखना।

                                                                                                       खुशदीप सहगल


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