Wednesday, June 10, 2026
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वन्य जीव संरक्षण, वाया किताब कुछ जरूरी सवाल

Ravivani 34


32 23जब दिमाग और दुनिया…दोनो का पारा चढ़ रहा हो, खुशियों की हरियाली घट रही हो और मन का रेगिस्तान बढ़ रहा हो तो किसी को आइना भी झूठ लग सकता है। ऐसे वैश्विक माहौल में एक ऐसी भारतीय किताब का आना बेहद अहम् है, जिसे लिखने वाले वे हैं, जिन्होने जंगली जीवों की संवेदनाओं व उनसे इंसानी रिश्तों को खुद जिया है; किताब के संपादक – मनोज कुमार मिश्र, खुद एक वरिष्ठ वन अधिकारी रहे हैं। वाइल्डलाइफ इंडिया@50 – बीते 50 साला अनुभवों से सीखकर, आगे 50 साल बाद वर्ष-2072 की सुन्दर-सजीव भविष्यरेखा गढ़ने की चाहत में लिखी गई एक किताब है। रूपा पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित यह किताब भले ही अंग्रेजी में लिखी गई है, किन्तु इसका दिल हिंदोस्तानी ही है। भाषा सरल है और अंदाज किस्सागोई।वाइल्डलाइफ इंडिया@ 50 नामक इस ताजा किताब की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह खुद भारत के जंगल, जंगली जीव, जंगलात, इंसानी आबादी, वर्तमान कानून और हमारे व्यवहार पर खुली बहस का मंच बनने को तैयार है। यह किताब हवा, चिड़िया व जीवों द्वारा खुद बिखेरे बीजों, छोटी वनस्पतियों, मिट्टी व जल स्त्रोत जैसे जंगल व जंगली जीवों को पुष्ट व प्रभावित करने विभिन्न आयामों को उतने विस्तारित व प्रभावी ढंग से नहीं रख पाई है; बावजूद इसके 517 पेजी इस किताब के कुल 35 लेखकों में शामिल नामी-गिरामी वैज्ञानिक, पत्रकार, अध्ययकर्ता, स्वयंसेवी, लड़ाके और आईएएस व आईएफएस अधिकारियों की तारीफ की जानी चाहिए।

सुरेश चन्द्र शर्मा, हरभजन सिंह पांवला, विनोद कुमार उनियाल, सुधा रमन, कौस्तुभ शर्मा, सुहास, फैय्याज अहमद खुदसर, ऋत्विक दत्ता व प्रेरणा सिंह बिन्द्रा से लेकर ईशान कुकरेती तक। तारीफ इसलिए कि लेखकों ने अपनी कलमकारी से खुद ही खुद के अधिकारिक तौर-तरीकों को आइना दिखाया है। ऐसा ही दिखाया एक आइना शिकार और पर्यटन को लेकर है।

पर्यावरणविदों की यह धारणा जगजाहिर है कि जंगली जीवों के शिकार से जंगल को नुकसान होता है। जंगलात का एक रिटायर्ड आला अफसर ऐसा भी है कि जो इस धारणा को बेझिझक खारिज करता है। आखिरकार क्यों ? पावलगढ़ रिजर्व के पर्यटन और सबरीमाला के तीर्थ का फर्क बताते हैं कि जंगलों को राजमार्ग नहीं, पगडंडियां पसन्द हैं। जंगलों को पर्यटन के लिए खोलने से भी जंगल की शांति और समृद्धि से छेड़छाड़ के अवसर बढ़ जाते हैं। एक अन्य आला अफसर के अनुभव, जंगली जीवों के साथ इंसानी साहचर्य को नुकसानदेह मानने से इंकार करते हैं।

राजनीतिक गलियारों से लेकर समाज की पर्यावरण मंचों पर यह सवाल आए दिन उठता रहता है। मत यह है कि कानून, किताबों में हैं। उन्हे जमीन पर उतारना है तो कानून और जंगल के बीच में इंसानी मन के पुल का बनना और बने रहना जरूरी है। जंगल को व्यापारिक निगाहों से बचाने के लिए क्या सूचना प्रौद्यागिकी को बेहतर इस्तेमाल करने की जरूरत है अथवा सूचना प्रौद्यागिकी कानूनों में किस तरह का बदलाव करना चाहिए ? व्यापार से जुड़े जंगल चुनौतियों से पार पाने में प्रवर्तन निदेशालय की भूमिका क्या है ? क्या वह उसे पूरी ईमानदारी और क्षमता के साथ वाकई निभा रहा है ? जंगल के प्रति हमारा नजरिया व्यापारिक से वापस संरक्षा सुलभ कैसे बने? जंगल के भविष्य की संभावनायें और जरूरतें क्या हैं ? वाइल्डलाइफ इंडिया@ 50 किताब, इस पर विमर्श का मौका देती है।

यह सवाल भी हम उठाते ही हैं कि यदि कानून हैं; लागू करने के लिए हर स्तर पर जंगलात का अमला है तो फिर भारतीय जंगलों की समृद्धि घटती क्यों जा रही है? जंगलात की सीमा क्या है और सामर्थ्य क्या? जंगलात अपने स्तर पर कार्रवाई तो शुरू कर सकते हैं, लेकिन कानूनी संज्ञान लेने के लिए पुलिस पर निर्भर हैं। दिलचस्प है कि जैसे लकड़ी, फल को वनोत्पाद माना जाता है, वैसे ही बाघ, शेर, नेवले को भी। जो सजा लकड़ी काटने व सूखी पत्तियों को नष्ट करने पर है, वही बाघ को क्षति पहुंचाने पर भी।

क्या यह सही है?क्या हम घरेलू मवेशियों के जंगल प्रवेश की रोक पर सवाल उठाएं? यह अलग बात है, किंतु यहां तो राज्यों का रवैये पर ही सवाल है। क्या भारत के वन कानूनों व संबद्ध पक्षों के रवैये तो बदल डालने की जरूरत है? क्या राजनीतिज्ञों व सिविल सेवा अफसरशाही द्वारा जंगलात के अफसरों को तवज्जो न देना भी एक कारण है?
ऐसे जिज्ञासा प्रश्नों के उत्तर में किताब वाइल्डलाइफ इंडिया@50 विरोधाभासों की ओर इशारा करने से नहीं चूकती। ऐसे विरोधाभासों पर सोच विकसित करने के लिए हमेंकिताब के अखिरी दो अध्यायों तक जाना होगा।

बदलते मौसम के वर्तमान दौर और फिर अगले 50 साल बाद के आइने को सामने रखकर वन्यजीव संरक्षक कानूनों में बदलाव व उन्हें लागू करने की कैसी सोच व व्यवस्था की जरूरत है? निवेदिता खांडेकर और नेहा सिन्हा इसे लेकर ‘क्रिस्टल क्लियर’ हैं। संभव है कि किताब के आखिरी पन्नों पर छपे दो लेख, पाठकों को चिंतन के प्रथम पायदान पर ले जाएं। पुस्तक का मुख्य विचार बिंदु भी यही है: सेविंग द वाइल्ड, स्क्यिुरिंग द फ्यूचर।

किताब में जंगल व जंगली जीवों के प्रति इंदिरा गांधी और मेनका गांधी की शासकीय प्रतिबद्धता के दर्शन भी हैं तो बतौर पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावेड़कर राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड के दायित्व बोध को नष्ट करते हुए खुश होने का ट्वीट भी; वनों के प्रति बतौर प्रधानमंत्री देवेगौड़ा और आई के गुजराल जी का सुप्त भाव भी। ऐसे अनेक तथ्य, विश्लेषण, और लीक को चुनौती देते सवालों व सुझावों को समेटे वाइल्डलाइफ इंडिया@50 नामक यह किताब हमारी लोकप्रतिनिधि सभाओं, सरकार, अफसरशाही व नागरिकों को हमारे जंगलों और उनकी परिस्थितिकी को लेकर कुछ बेहतर सोचने व संजीदा होने के लिए चेताने की सामर्थ्य रखती है।

दिलचस्प एहसासों की दुनिया वाइल्डलाइफ इंडिया@50 किताब दो भागों में बंटी है। सालिम अली जैसे अप्रतिम बर्डमैन गुरु की दास्तान को एआर रहमानी जैसे उत्कृष्ट पक्षी विज्ञानी चेले की कलम लिखा पढ़ना बेहद दिलचस्प है। मैट्रिक ड्रॉप आउट सालिम अली के वर्ल्ड फेम बर्डमैन बनने की कहानी; यहीं से शुरू होता किताब का वह दूसरा हिस्सा, जिसमें दस्तावेज से ज्यादा अंदाज़-ए-किस्सागोई है और एहसासों की एक भरी-पूरी दुनिया है।

यहां जंगल संरक्षण के नाम पर लोगों के साथ धोखे की कहानी भी है और साझे की कहानी भी। जंगल हेतु उपयोगी बूमा व ट्रैकिंग आदि तकनीकों की बातें हैं। जंगल कानूनों व संस्थानों के परिचय हैं। चैसिंघा, बारहसिंघा, टाइगर, कठफोड़वा की दास्तान हैं। किताब पढ़ते हुए आप नौजवान जयेन और किशोरउम्र अनीश की जंगल गुरु प्रतिभा से रुबरु होंगे। किसी रिपोर्टर द्वारा किसी जंगल पर किसी रिपोर्टर द्वारा पेश बड़ी पिक्चर का मतलब जानना हो तो ऊषा राय का लिखा अध्याय अवश्य पढ़ना चाहिए-इन द वाइल्ड्स : रिपोर्टर एट लार्ज।

डब्लयू डब्लयू एफ-इंडिया और देहरादून के वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट की दास्ताने गवाह हैं कि कोई इंस्टीट्यूट सिर्फ र्इंट-गारा नहीं होता। जंगल के चुंबक और उसके संपर्क में आने वालों पर जंगल की आभा कितनी प्राकृतिक और निर्मल रूप में चस्पां होती है? क्रमश: शरद गौड़, विश्वास बी़ सावरकर और आर श्रीनिवास मूर्ति के लेख ये आभास कराने में सक्षम हैं। अरुणोदय के प्रदेश के जंगलों और लोगों के बीच टहलती-खोजती अपराजिता दत्ता के एहसास आपको सीखना सिखा सकते हैं। स्टेला जेम्स, नयना जयशंकर और भुवन बालाजी की मन्नार नेशनल पार्क डायरी के पन्ने पलटे बगैर तो पढ़ना अधूरा ही रहने वाला है; अत: जरूर पढ़िएगा।


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