Saturday, April 11, 2026
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पाक जम्हूरियत के खलनायक

 

Samvad 12


Arvind jaytilakदो दशक पहले प्रसिद्ध पत्रकार और फ्राइडे टाइम्स के संपादक नजम सेठी ने कहा था कि ‘पचास वर्ष बाद भी पाकिस्तानी यह तय नहीं कर पाए हैं कि एक राष्ट्र के रुप में वे कौन हैं, किसमें विश्वास रखते हैं और किस दिशा में जाना चाहते हैं। वे यह तय नहीं कर पाए हैं कि दक्षिण एशिया के अंग हैं या मध्य-पूर्व के। सऊदी अरब और ईरान जैसे कट्टर इस्लामी हैं या जार्डन व मिश्र जैसे उदार राज्य।’ गौर करें तो आज भी पाकिस्तान की शिनाख्त कमोबेश वैसी ही है। उसके हुक्मरान पाकिस्तान को किस दिशा में ले जाना चाह रहे हैं, उन्हें खुद पता नहीं। नतीजा सामने है। पाकिस्तानी हुक्मरानों की विफलता से जम्हूरियत को बार-बार लहूलुहान होना पड़ रहा है। नेशनल असेंबली, सेना और सुप्रीम कोर्ट के बीच जम्हूरियत की सांस अंटकी हुई है।

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दो राय नहीं कि अविश्वास प्रस्ताव के मसले पर इमरान खान ने विपक्ष को पटकनी देकर सियासी बढ़त बना ली है। लेकिन खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। असली खेल तो सेना खेलेगी। जिस तरह सेनाध्यक्ष कमर बाजवा ने इमरान खान के विचारों से इतर अमेरिका का समर्थन और रूस का विरोध किया है, उससे साफ है कि वह सर्कस का शेर बनने को तैयार हैं। यानी अमेरिका के इशारे पर नाचने को तैयार हैं। इमरान खान अमेरिका पर अपनी सरकार गिराने का आरोप लगाया है। सेना ने इससे इंकार किया है। उधर, नई सरकार के गठन तक आईएमएफ ने पाकिस्तान को दी जाने वाली फंडिंग रोक दी है। पहले से महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रहे पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़नी तय हैं।

पाकिस्तान में जम्हूरियत इतनी कमजोर है कि अपनी आजादी के 9 साल बाद तक पाकिस्ताान संविधान नहीं बना पाया था। तब तक चार प्रधानमंत्री, चार गवर्नर जनरल और एक राष्ट्रपति देश पर शासन कर चुके थे। 1956 में पाकिस्तान गणतंत्र बना और राष्ट्रपति पद का आविष्कार हुआ। रिपब्लिकन पार्टी के इस्कंदर मिर्जा पहले राष्ट्रपति बने और उन्होंने अयूब खान को चीफ आॅफ आर्मी नियुक्त किया। यहीं से सेना ने तख्ता पलट का खेल शुरू हो गया।

7 अक्टूबर, 1958 को जनरल अयूब खान ने राष्ट्रपति मेजर जनरल इस्कंदर मिर्जा की सरकार का तख्ता पलट कर देश में मॉर्शल लॉ लागू कर दिया। तथ्य यह भी कि इससे पहले राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा ने प्रधानमंत्री फिरोज खान नून को गद्दी से उतारा था और ठीक 13 दिन बाद अयूब खान ने मिर्जा की गद्दी से उतार दिया। जब अयूब खान ने सैन्य विद्रोह किया जुल्फीकार अली भुट्टो ने अयूब खान का साथ दिया। ईनाम के तौर पर अयूब खान ने जुल्फिकार अली भुट्टो को देश का विदेशमंत्री बना दिया। लेकिन दोनों के बीच इसकदर विवाद बढ़ा कि जुल्फिकार अली भुटटो को 1966 में इस्तीफा देना पड़ा।

अयूब खान ने पाकिस्तान पर 9 साल शासन किया और सेना को इसकदर ताकतवर बना दिया कि वह जब चाहे जम्हूरियत को रौंद सकती है। सेना की बढ़ती ताकत का खामियाजा खुद अयूब खान को भी भुगतना पड़ा। 1969 में याहया खान ने तख्तापलट कर अयूब खान को सत्ता से बेदखल कर दिया। मजेदार बात यह कि जब जनरल मूसा रिटायर हुए तब अयूब खान ने तीन जनरलों को सुपरशीड करके याहया खान को सेनाध्यक्ष बनाया था। जबकि उसकी क्षमता एक डिविजनल कमांडर से अधिक नहीं थी। अयूब ने उसे इसलिए बनाया कि वह उसके लिए खतरा साबित नहीं होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

याहया खान शराब पीने के लिए इतना बदनाम था कि रात दस बजे के बाद उसके आदेशों को नहीं माना जाता था। इस बात का उल्लेख प्रमुख विद्वान देवेश्वर की किताब ‘पाकिस्तान एट द हेल्स’ में है। इसमें कहा गया है कि उस समय के चीफ आॅफ स्टाफ जनरल अब्दुल हमीद खान ने राज्यों के आला सैनिक अधिकारियों का ताकीद कर रखा था कि रात दस बजे के बाद राष्ट्रपति याहया खान के दिए गए मौखिक आदेशों का तभी पालन किया जाए जब उसकी पुष्टि राष्ट्रपति कार्यालय कर दे। कहा जाता है कि एक बार याहया खान इतने नशे में था कि उसने 1971 के युद्ध के ठीक दस दिन पहले अमेरिकी न्यू यार्कर मैगजीन के रिपोर्टर बॉब शैपली को बता दिया कि पाकिस्तान भारत पर हमला करेगा।

ऐसे में समझना कठिन नहीं रह जाता कि पाकिस्तान का भविष्य किन लोगों के हाथ में रहा। 1973 में पाकिस्तानी कानून के तहत जब देश एक संसदीय गणतंत्र बना तो तत्कालनी राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो प्रधानमंत्री बनने के लिए राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन चार साल बाद ही 4 जुलाई, 1977 को सेनाध्यक्ष जियाउल हक ने जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार का तख्ता पलट दिया। उसने देश में मार्शल लागू कर भुट्टो को फांसी पर चढ़ा दिया। 1988 में जियाउल हक की एक विमान हादसे में मौत हो गयी।

1997 के आमचुनाव में नवाज शरीफ की जीत हुई और वे प्रधानमंत्री बने। 1998 में नवाज शरीफ ने सेना की कमान संभालने के लिए दो वरिष्ठ जनरलों की वरिष्ठता को नजरअंदाज परवेज मुशर्रफ को आगे किया। परवेज मुशर्रफ की महत्वकांक्षा नवाज शरीफ और पाकिस्तान दोनों पर भारी पड़ी। मुशर्रफ ने सत्ता पर कब्जा के लिए कारगिल युद्ध का दांव खेला और 1999 में तख्तापलट कर नवाज शरीफ को सत्ता से बेदखल कर दिया।

एक रोज जब जनरल परवेज मुशर्रफ श्रीलंका में थे नवाज शरीफ ने उन्हें शक के आधार पर सेनाध्यक्ष के पद से हटा दिया और जनरल अजीज को सेनाध्यक्ष बनाया। चूंकि जनरल अजीज परवेज मुशर्रफ के आदमी थे लिहाजा परवेज मुशर्रफ के श्रीलंका से लौटते ही नवाज शरीफ को जेल में डाल दिया गया और परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान के राष्ट्रपति बन गए। नवाज शरीफ को एक बार फिर पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला। उस समय सेनाध्यश जनरल राहिल शरीफ थे। जनरल राहिल शरीफ नवाज शरीफ को उखाड़ फेंकने की हरसंभव कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुआ। लेकिन वह अपने पूरे कार्यकाल तक नवाज की गर्दन को पैरों तले दबाए रखा।

अब जब इमरान खान गद्दी से हाथ धो बैठे हैं तो उन्हें भारत की विदेशनीति पसंद आ रही है। उधर, सेनाध्यक्ष बाजवा भी कश्मीर मसले पर भारत से बातचीत का राग अलाप रहे हैं। दरअसल वैश्विक पटल पर दोनों ही अपनी छवि दुरुस्त करना चाहते हैं। इसका मुख्य कारण विश्व भर में भारत की बढ़ती साख और रुस-अमेरिका से निकटता है। इससे पाकिस्तान बैकफुट आ गया है।

कश्मीर मसले पर पाकिस्तान को न तो रूस से समर्थन मिल रहा है और न ही अमेरिका से। ऐसे में कश्मीर पर पाकिस्तान का घुटनों के बल भारत से बातचीत का निवेदन करना तनिक भी कुतुहल पैदा नहीं करता। बहरहाल मौजू सवाल यह है कि पाकिस्तान का भविष्य क्या होगा?


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