Wednesday, March 18, 2026
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Bada Mangal 2025: तनाव और भय से मुक्ति चाहिए? बड़े मंगल पर जरूर करें ये एक कार्य

नमस्कार, दैनिक जनवाणी डॉटकॉम वेबसाइट पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनंदन है। हर वर्ष ज्येष्ठ मास के मंगलवार को “बड़ा मंगल” के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन पवनपुत्र हनुमान जी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ माह के मंगलवार को ही हनुमान जी की पहली बार प्रभु श्रीराम से भेंट हुई थी। साथ ही इसी दिन उन्हें अमरत्व का वरदान प्राप्त हुआ था। इसी कारण इस तिथि को बजरंगबली की उपासना के लिए अत्यंत शुभ और फलदायक माना जाता है।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, वीर बजरंगी हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए ज्येष्ठ माह के मंगलवार को विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। इस दिन देशभर के हनुमान मंदिरों में भक्तों द्वारा पूजा, पाठ, हवन, भंडारे और हनुमान चालीसा के पाठ जैसे धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। हालाँकि पूरे भारत में यह पर्व श्रद्धा से मनाया जाता है, लेकिन उत्तर प्रदेश में इसकी रौनक कुछ खास देखने को मिलती है। इस बार ज्येष्ठ माह में दूसरा बड़ा मंगल 20 मई को मनाया जा रहा है। इस दिन बजरंग बली की पूजा के लिए कई शुभ योग बने हुए हैं। ऐसे में हनुमान चालीसा का पाठ अवश्य करें, इसके प्रभाव से तनाव में कमी, डर की समाप्ति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती हैं। आइए इस शक्तिशाली चालीसा के बारे में जानते हैं।

हनुमान चालीसा

दोहा

श्रीगुरु चरन सरोज रज निजमनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।

चौपाई

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।
रामदूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।

महावीर विक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।
कंचन वरन विराज सुवेसा।
कानन कुण्डल कुंचित केसा।।

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै।
शंकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग वन्दन।।

विद्यावान गुणी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
विकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचंद्र के काज संवारे।।

लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा।
नारद सारद सहित अहीसा।।

जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा।।

तुम्हरो मंत्र विभीषन माना।
लंकेश्वर भये सब जग जाना।।
जुग सहस्र योजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।

राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डरना।।

आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै।।

नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै।।

सब पर राम तपस्वी राजा।
तिनके काज सकल तुम साजा।
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोई अमित जीवन फल पावै।।

चारों युग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु-संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे।।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस वर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।।

तुम्हरे भजन राम को भावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै।।
अन्त काल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई।।

और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेई सर्व सुख करई।।
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।

जै जै जै हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहिं बंदि महा सुख होई।।

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा।।

दोहा

पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

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