जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: टोक्यो ओलिंपिक में 20 KM वीमेन रेस वॉक में मेरठ की बेटी प्रियंका गोस्वामी मेडल से चूक गईं। 20 किमी की रेस वॉक में प्रियंका ने शुरुआत के 6 किमी तक अच्छा प्रदर्शन किया। वह टॉप-5 एथलीट में शामिल रहीं। इसके बाद कुछ देर के लिए प्रियंका टॉप-4 और फिर टॉप-3 में आ गईं। लेकिन 10 किमी की रेसवॉक के बाद प्रियंका पिछड़ती चली गईं। प्रियंका ने एक घंटा 29 मिनट 12 सेकेंड +3.24 सेकंड का समय ज्यादा लिया। वह 17वें नंबर पर रहीं।
बेटी के प्रदर्शन मां अनीता ने कहा, वह भले ही मेडल न जीत पाई, मगर उसने अच्छा खेला। बेटी की मनपसंद खीर खिलाकर स्वागत किया। घर में जश्न मनाया। वहीं, पिता मदनपाल ने कहा कोच साथ नहीं गए, इसलिए कमी रह गई। आगे और अच्छा करेगी।

प्रियंका रेस वॉक के लिए यूपी की इकलौती एथलीट थीं। मेरठ में माधवपुरम की प्रियंका ने रांची में 20 किलोमीटर की वॉक 1:28:45 घंटे में पूरा कर नया रिकॉर्ड बनाया था। साथ ही ओलिंपिक के लिए चुनी गईं। पिछले साल राजस्थान की एथलीट भावना जाट ने 20 किलोमीटर की पैदल चाल 1:29:54 घंटे में पूरी की थी। प्रियंका ने भावना जाट के रिकार्ड को ब्रेक किया था।
मूलत: मुजफ्फरनगर के बुढ़ाना के सागड़ी गांव में जन्मीं प्रियंका का जीवन संघर्षों से भरा रहा। पिता मदनपाल गोस्वामी बताते हैं कि बेटी ने यहां तक पहुंचने के लिए बहुत संघर्ष किया है। बचपन से उसे खेलना पसंद था। खिलाड़ियों का बैग (किट) देखकर उसी बैग को लेने की जिद करती थी। आर्थिक हालात खराब होने के कारण उसकी मांग पूरी नहीं कर सकता था। उस बैग को हासिल करने के लिए बेटी ने खेलना शुरू किया। आज उसकी मेहनत से घर पदक से भरा है।
कनोहर लाल, बीके माहेश्वरी स्कूल से शिक्षा के बाद प्रियंका ने पटियाला से बीए किया। पिता 4 हजार रुपए भेजते थे जिससे गुजारा नहीं होता था तो प्रियंका एक वक्त का खाना गुरुद्वारे में लंगर में खाती थी। प्रियंका का छोटा भाई कपिल बॉक्सिंग में प्रदेश स्तर तक खेला है।

प्रियंका के पिता मदनपाल यूपी रोडवेज में कंडक्टर थे। 2006 में मुजफ्फरनगर से मेरठ आ गए। 2010 में रोडवेज के अफसरों की मिलीभगत के कारण पिता पर गलत आरोप लगा और मुदकमा दर्ज कराकर उन्हें निलंबित कर दिया। इसके बाद उन्होंने घर का खर्च चलाने के लिए किराए पर टैक्सी चलाई, किराना स्टोर खोला और आटा चक्की चलाकर बेटी को अभ्यास कराया। स्कूल और स्टेडियम आने-जाने में परेशानी न आए इसके लिए पिता ने घर का एक हिस्सा (घेर) बेचकर स्कूटी दिलाई।
पटियाला में 2014-15 में ग्रेजुएशन करने के बाद प्रियंका का बेंगलुरू साईं सेंटर में चयन हो गया। इसके बाद उन्हें निशुल्क प्रशिक्षण मिलना शुरू हुआ। 2018 में खेल कोटे से रेलवे में क्लर्क की नौकरी मिल गई। 2011 में प्रियंका ने पटियाला के नेताजी सुभाषचंद्र बोस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (एनआइएस) में दाखिला लिया। मेरठ में कैलाश प्रकाश स्टेडियम में कोच गौरव त्यागी ने प्रियंका के खेल को निखारा।
पिता के लिए न्याय की मांग करती बेटी
अंतराष्ट्रीय एथलीट प्रियंका अपने पिता के लिए सरकार से न्याय की मांग कर रही हैं। आज भी मदनपाल बहाली के लिए प्रयास कर रहे हैं मगर नौकरी नहीं मिली। 11 साल से प्रियंका अपने पिता के साथ सरकार से न्याय की मांग कर रही है। सीएम से हुए संवाद में प्रियंका ने पिता के लिए नौकरी की मांग की थी।

