Wednesday, March 25, 2026
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क्यों दिलाई जा रही है दंगों की याद

Samvad 9


 

Rohit Koshikराजनीति और सत्ता में लगातार परिवर्तन होता रहता है। अगर यह परिवर्तन न हो तो राजनीति और सत्ता दोनों ही जड़ हो जाती हैं। यह जड़ता स्वयं सत्ता और सत्ताधारी राजनेताओं द्वारा अपना हित साधने के लिए तो शुभ हो सकती है लेकिन राजनीति के लिए कतई शुभ नहीं होती है। इस समय उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और जयंत चौधरी, योगी सरकार को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। दूसरी तरफ भाजपा यह प्रचार कर रही है कि अगर अखिलेश यादव सत्ता में आ गए तो गुडों और माफियाओं की सरकार बनेगी और हमारी बहु-बेटियां सुरक्षित नहीं रहेगी। भाजपा का यह कुप्रचार उनकी बौखलाहट ही दिखा रहा है। दरअसल अखिलेश और जयंत उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बना सकते हैं।

अखिलेश और जयंत के बारे में यह टिप्पणी अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकती है। लेकिन यदि गंभीरता से इस टिप्पणी पर विचार किया जाए तो हम इसके निहितार्थ आसानी से समझ सकते हैं। युवा राजनेता परंपरागत सोच से हटकर वैज्ञानिक सोच वाले होते हैं और किसी न किसी रूप में इसका फायदा समाज को मिलता है। हम केवल परंपरागत दृष्टिकोण के सहारे किसी भी राज्य का संपूर्ण विकास नहीं कर सकते। किसी भी राज्य के संपूर्ण विकास के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण होना बहुत जरूरी है। यह सुखद है कि अखिलेश यादव और जयंत चौधरी युवा होने के नाते एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हैं। जाहिर है इसका फायदा उत्तर प्रदेश को मिलेगा।

किसी भी राज्य का सच्चा विकास तभी हो सकता है जब उस राज्य की सरकार धर्मनिरपेक्ष हो। सच्चे विकास का अर्थ केवल भौतिक विकास नहीं है। सच्चे विकास का अर्थ है एक ऐसा विकास जिसमें सभी धर्मों और जातियों के लिए समान अवसर हों। धर्म के नाम पर किसी से भेदभाव न किया जाए। यह सुखद है कि अखिलेश और जयंत का दृष्टिकोण धर्मनिरपेक्ष है। हालांकि अखिलेश यादव पर मुसलमानों के तुष्टिकरण का आरोप लगता रहता है। यहां सवाल यह है कि क्या मुसलमानों के हितों के बारे में सोचना तुष्टिकरण की परिधि में आता है ? सवाल यह भी कि अल्पसंख्यकों के हितों के बारे में राजनेता ही क्यों सोचे? क्या अल्पसंख्यकों के हितों के बारे में सभी बहुसंख्यकों को नहीं सोचना चाहिए? अखिलेश और जयंत का एक बड़ा गुण उनकी विनम्रता है।

दोनों ही युवा राजनेताओं को नाराज होते हुए नहीं देखा गया है। यह बात अलग है कि टीवी चैनलों के पक्षपातपूर्ण रवैये के कारण अखिलेश एक-दो बार नाराज हुए हैं। लेकिन सामान्य तौर पर वे नाराज नहीं होते हैं और उनके चेहरे पर मुस्कान और सौम्यता विराजमान रहती है। जयंत के चेहरे से भी धैर्य और मुस्कान झलकती रहती है। दरअसल राजनेताओं के चेहरों पर विराजमान मुस्कान और सौम्यता भी समाज में एक विश्वास पैदा करती है।

अखिलेश यादव पर एक आरोप यह लगाया जा रहा है कि उनके राज में प्रदेश की कानून व्यवस्था बहुत खराब थी। आम जनता भी यह मानकर चल रही है कि उनके राज में कानून व्यवस्था की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी और योगी राज में कानून व्यवस्था में बहुत सुधार हुआ है। हालांकि इस बात में पूरी सच्चाई नहीं है। योगी राज में भी जगह-जगह अपराध हो रहे हैं। दरअसल भाजपा नेताओं द्वारा कुछ इस तरह प्रचार किया जा रहा है कि जैसे अखिलेश राज में केवल जंगल राज था और इसके अलावा कुछ था ही नहीं। यह बात भी प्रचारित की जा रही है कि अगर दोबारा अखिलेश राज आ गया तो पुन: गुडा राज आ जाएगा और मुसलमान हावी हो जाएंगे। अगर भाजपा के इस प्रचार का गंभीरता से विश्लेषण किया जाए तो यह बात भी आधारहीन ही नजर आएगी। यानी अभी भी दूसरे तरीके से एक धर्म के खिलाफ नफरत परोसी जा रही है।

इस बार अखिलेश यादव द्वारा कानून व्यवस्था पर ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है, ताकि ऐसे लोगों का मुंह बंद किया जा सके। अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल में अनेक सराहनीय और महत्वपूर्ण कार्य किए। उन्होंने आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे का निर्माण कराया। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘यूपी 100 पुलिस सेवा’ और ‘108 एंबुलेंस फ्री सेवा’ प्रारम्भ की। अखिलेश ने लखनऊ मेट्रो रेल, लखनऊ इंटरनेशलन क्रिकेट स्टेडियम, जनेश्वर मिश्र पार्क, जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर, लखनऊ-बलिया पूर्वांचल एक्सप्रेसवे जैसी योजनाओं को साकार करने में महत्वपूर्ण कार्य किया। इसलिए अखिलेश राज को जंगल राज घोषित करना किसी भी दृष्टि से तर्कसंगत नहीं

जयंत चौधरी दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं तथा उन्होंने लंदन स्कूल और इकोनोमिक्स से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की है। इसलिए उनके उच्च शिक्षित होने के फायदा भी प्रदेश को मिलेगा। गौरतलब है 2017 के विधानसभा चुनावों और 2019 के लोकसभा चुनावों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिकांश किसानों ने भाजपा को वोट दिया था। लेकिन जिस तरह किसानों से सलाह किए बगैर कृषि बिल लाया गया और किसान आंदोलन के दौरान किसानों को परजीवी, आंदोलनजीवी और खालिस्तानी कहा कहा, उससे किसानों का भाजपा से मोह भंग हो गया।

इन सभी बातों का अर्थ यह नहीं है कि अखिलेश यादव और जयंत चौधरी में कोई कमी नहीं है। एक आम इंसान की तरह ही अखिलेश और जयंत में भी कई कमियां हो सकती हैं। लेकिन इस कठिन दौर में सबसे बड़ा सवाल यह है कि हम कैसी सरकार चुनना चाहेंगे? क्या हम ऐसी सरकार चुनना चाहेंगे जो खोखले नारों के साथ धर्म के नाम पर समाज को बांटने की कोशिश करती हो या फिर एक धर्मनिरपेक्ष सरकार चुनना चाहेंगे जो दलितों, अल्पसंख्यकों और किसानों के हितों का ध्यान रखने का दावा करती हो? यह दुर्भाग्यपूर्ण ही आज भाजपा उत्तर प्रदेश में पुराने जख्म कुरेद रही है, ताकि पुन: जनता को 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों की याद दिलाई जा सके। भाजपा चाह रही है जनता अभी भी दंगों की तपन महसूस करे। वह इस तपन के माध्यम से ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ठंडी हो चुकी अपनी राजनीति में चिंगारी लगाना चाहती है।

अपना अस्तित्व बचाने के लिए भाषा की गरिमा का भी ध्यान नहीं रखा जा रहा है। इस सारे माहौल में भाषा की गरिमा बार-बार तार-तार हो रही है। सवाल यह है कि जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोग विशेषत: जाट और मुसलमान आपसी कटुता भूलकर एक मंच पर आ गए हैं तो उन्हें 2013 के दंगों की याद क्यों दिलाई जा रही है? क्या साफ-सुथरी राजनीति के लिए दंगों को भूलकर आगे बढ़ना जरूरी नहीं है? निश्चित रूप से ऐसे माहौल में अखिलेश यादव और जयंत चौधरी से बहुत उम्मीदें हैं।


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