
हिंदुस्तान की सबसे पवित्र माने जानी गंगा आज मैली हो चुकी है। करोड़ों लोगों के लिए आस्था और विश्वास की यह नदी, केवल नदी ही नहीं, बल्कि वैतरणी की तरह स्वर्ग से उतरी वह जलधारा है, जिसमें लोगों की आस्था उतनी ही है, जितनी की भगवान में। लेकिन सदियों से इंसानों ने इस गंगा को तो मैला करके छला ही है, अब नेता भी इसके नाम पर करोड़ों-करोड़ों रुपए का घोटाला करके इसके साथ छल रहे हैं। सवाल उठता है कि तो क्या सरस्वती नदी की तरह ही गंगा जी के भी पाताल जाने का समय आ गया है? या क्या उत्तराखंड का गठन केवल गंगा जी को दफन करने के लिए हुआ है? क्या जीवन दायिनी गंगा का विनाश ही एकमात्र रोजगार का साधन है?