- हादसा हुआ तो सीधे जिम्मेदार होंगे नगरायुक्त
- शहर में जगह-जगह लगे हैं विशालकाय होर्डिंग्स
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: मुंबई में हुए होर्डिग हादसे से क्या मेरठ नगर निगम के अधिकारी सबक लेंगे? होर्डिग्स निर्माण स्टेक्चर की नगर निगम कोई जांच नहीं करता। इसका क्या मानक है, उसकी रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं की गई। महानगर में ज्यादातर होर्डिग्स अवैध लगे हुए हैं। जहां मन में आ रहा है, वहीं होर्डिंग लगाये जा रहे हैं। कई बार ‘जनवाणी’ ने अवैध होर्डिग्स को लेकर आगाह भी किया,
मगर नगर निगम ने आंखें और कान दोनों बंद कर रखे हैं। यह मौसम आंधी और तूफान का माना जाता है। मौसम वैज्ञानिक भी इस बावत आगाह कर रहे हैं। लेकिन नगर निगम आंखें मूंदे है। शायद मुंबई जैसे हादसे का नगर निगम के अधिकारी इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में अगर कोई हादसा होता है तो सीधी जिम्मेदारी नगरायुक्त डा. अमित पाल शर्मा की ही मानी जाएगी।
मुंबई में तेज आंधी से होर्डिंग उखड़कर पेट्रोल पंप पर जा गिरा, जिसमें 14 लोगों की मौत हो गई। हादसे में 80 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। महाराष्टÑ के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे भी हादसे के बाद मौके पर पहुंचे और अफसोस जताया। ये हादसा घाटकोपर में 100 फीट ऊंचा और 250 टन वजनी लोहे का होर्डिंग एक पेट्रोल पंप पर जा गिरा। इसमें जनहानि तो हुई ही, काफी नुकसान भी हुआ। अब इसका स्टेक्चर आॅडिट, लाइसेंस था या नहीं, इसके जांच के आदेश दिये हैं। मुंबई में हुई हादसे को लेकर अफसरों से लेकर मुख्यमंत्री तक कार्रवाई के लिए तत्पर हो गए,

लेकिन मेरठ में भी ऐसे हादसे कभी हो सकते हैं। इस तरफ नगर आयुक्त का कोई ध्यान नहीं है। ‘जनवाणी’ ने अवैध होर्डिग्स के खिलाफ अभियान चला रखा हैं। ज्यादातर होर्डिग्स अवैध लगे हुए हैं। कंकरखेड़ा, डिफेंस कॉलोनी, मवाना रोड, रोहटा रोड, बागपत रोड, हापुड़ रोड, गढ़ रोड समेत शहर भर में अवैध होर्डिग्स लगे हुए हैं। बड़ी बात ये है कि शहर में अवैध होर्डिग्स के स्टेक्चर की कभी जांच ही नहीं की गई? होर्डिग्स कितने ऊंचे स्वीकृत हैं और लगे कितने ऊंचे हैं, इसकी कभी जांच नहीं हुई।
यहां तो लाइसेंस ही नहीं है तो फिर कैसे होर्डिग्स लगने दिये गए। बीच सड़क पर होर्डिग्स लगा दिये गए। सड़क खोद दी गई। इसकी कोई अनुमति नहीं ली गई, लेकिन इसके लिए आला अफसरों ने किसी की जवाबदेही तय नहीं की। पूरे शहर के डिवाइडर तोड़कर यूनीपोल लगाये जा रहे हैं। सरकारी सम्पत्ति को नष्ट जा रहा है, नियमानुसार तो इस मामले में होर्डिंग्स लगाने वालों के खिलाफ एफआईआर होनी चाहिए।
एंटी करप्शन को दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा रहे नगरायुक्त?
नगर निगम में भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के अलावा कुछ नहीं किया जाता। एंटी करप्शन इंस्पेक्टर की तरफ से एक पत्र नगरायुक्त डा. अमित पाल शर्मा को लिखा, जिसमें पूछा गया है कि गृहकर निरीक्षक अनुपम राणा के दो वर्ष के कार्यकाल में कितने लोगों के गृहकर में संशोधन किया गया हैं? इसमें बड़े घोटाले की प्रबल संभावनाएं बनी हुई हैं। इसी वजह से 60 दिन बीतने के बाद भी पत्र का जवाब नहीं दिया गया हैं। हालांकि कर निरीक्षक अनुपम राणा फिलहाल हाईकोर्ट से गिरफ्तारी पर स्टे लेकर नगर निगम में ड्यूटी कर रहे हैं। उस पर किसी तरह की कार्रवाई नगरायुक्त ने नहीं की हैं।
शहर के ईव्ज चौराहे पर व्यापारी नेता सुधांशु महाराज की शॉप हैं। इस पर नगर निगम ने चार लाख का गृहकर लगा दिया था। मामले को लेकर सुधांशु महाराज नगर निगम के कर निरीक्षक अनुपम राणा से मिले। बताया कि गृहकर ज्यादा बना दिया गया हैं। इसमें कर निरीक्षक ने रास्ते बताते हुए घूस की मांग की, जिसके बाद सुधांशु महाराज ने एंटी करप्शन से संपर्क किया। एंटी करप्शन की टीम ने नगर निगम में छापा मारकर रिश्वत लेते हुए निगम कर्मी दीपक व एक अन्य को रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया था, जबकि कर निरीक्षक अनुपम राणा फरार हो गए थे। हालांकि एंटी करप्शन की टीम ने देहली गेट थाने में जो एफआईआर दर्ज करायी हैं, उसमें अनुपम राणा को भी अभियुक्त बनाया गया हैं।
इसके बाद ही अनुपम राणा हाईकोर्ट की शरण में चले गए थे तथा गिरफ्तारी पर हाईकोर्ट से स्टे ले लिया था। बड़ा सवाल ये है कि एंटी करप्शन निरीक्षक की तरफ से एक पत्र नगरायुक्त डा. अमित पाल शर्मा को भेजा गया था, जिसमें गृहकर निरीक्षक अनुपम राणा के दो वर्ष के कार्यकाल में गृहकर के कितने मामलों में संशोधन किया गया हैं। किसी का 10 लाख गृहकर था, जिसे घटाकर दो लाख कर दिया गया। इस तरह के कितने मामले सामने आये हैं, इसके दस्तावेज उपलब्ध कराने की मांग की गई थी। 60 दिन बाद भी इसके दस्तावेज नगर निगम की तरफ से एंटी करप्शन टीम को उपलब्ध ही नहीं कराये गए हैं। क्योंकि इसकी जो विवेचना चल रही हैं, उसमें भी इन दस्तावेजों को उल्लेख करना अनिवार्य होता हैं। मामले की मुख्यमंत्री से भी शिकायत की गयी है।

