- लोकसभा हो या विधानसभा चुनाव, सभी में नकारी गर्इं महिला प्रत्याशी
- दर्जनों महिला उम्मीदवारों ने मेरठ से भाग्य आजमाया
- मात्र दो महिला उम्मीदवारों पर ही भरोसा कर पाए मेरठ के मतदाता
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: अब इसे मेरठ की रणभूमि की तासीर कहें या फिर कुछ और कि यहां के अधिकतर मतदाताओं को किसी भी पार्टी की महिला उम्मीदवार नहीं भातीं। वो उनके चुनावी वादों पर भी ज्यादा यकीन नहीं करते और यही कारण है कि चाहे विधान सभा का चुनाव हो अथवा लोक सभा का, महिला प्रत्याशियों को वोट देने में मेरठ के मतदाता हमेशा कंजूसी बरतते आए हैं। यही कारण है कि मेरठ की किसी भी विधान सभा सीट से लेकर लोकसभा सीट पर इक्का-दुक्का ही महिला उम्मीदवार चुनाव जीत पार्इं।
सब जानते हैं कि मेरठ रण भूमि रही है। अब चाहे यहां जंग-ए-आजादी को ले लें अथवा महाभारतकाल को। दोनों ही मामलों में मेरठ की सरजमीं पर ‘शहादतें’ दर्ज की गर्इं। कहा जाता है कि इसी के चलते मेरठ के लोगों के मिजाज में ‘गर्मी’ है। माना यह भी जाता है कि चूंकि मेरठ रणभूमि है लिहाजा यहां के मतदाता भी किसी भी चुनाव में महिला प्रत्याशियों के मुकाबले पुरुष प्रत्याशियों पर ज्यादा भरोसा करते हैं।
यही कारण भी है कि जंग-ए-आजादी के बाद जब देश आजाद हुआ और देश में लोकतंत्र की स्थापना के बाद पहला आम चुनाव हुआ तो तब से लेकर अब तक मेरठ में मात्र दो महिला प्रत्याशी ही चुनाव जीत पार्इं हैं। हालांकि विधान परिषद व राज्य सभा निर्वाचन इससे अलग है, लेकिन विधान सभा और लोकसभा के इतिहास में मेरठ से सिर्फ मोहसिना किदवई व श्रद्धा देवी ही चुनाव जीत संसद और विधानसभा पहुंच पार्इं। राजनीतिक जानकारों के अनुसार यहां पर सबसे पहले 1967 में किठौर विधान सभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर श्रद्धा देवी चुनाव जीतकर विधान सभा पहुंची।

इसके अलावा 1980 व 1984 में हुए चुनावों में मेरठ लोकसभा सीट पर कांग्रेस की ही मोहसिना किदवई चुनाव जीत कर संसद पहुंची। राजनीतिक डायरी के कई पन्ने पलटने के बावजूद हमें कोई ऐसी महिला प्रत्याशी नहीं मिली इनके अलावा जो चुनाव जीती हो। शहर के कई बुजुर्ग राजनीतिज्ञ भी यही मानते हैं कि मेरठ से मोहसिना किदवई एवं श्रद्धा देवी के अलावा कोई तीसरा न तो संसद पहुंचा और न ही विधान सभा।
इन महिला प्रत्याशियों ने आजमाई अपनी किस्मत
मेरठ की विभिन्न विधान सभा एवं लोकसभा सीट पर वैसे तो कई निर्दलीय महिला उम्मीदवारों ने भी ताल ठोंकी, लेकिन मुख्य दलों से जिन महिला उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरीं उनकी संख्या लगभग एक दर्जन है। 1969 में यहां शकुन्तला पुन्डीकाक्ष शहर सीट पर कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़ी लेकिन हार गर्इं। 1971 में मेरठ शहर सीट से प्रो. हुस्ना बेगम ने भी किस्मत आजमाई, लेकिन उनके हिस्से में भी रुसवाई आई।
इसके अलावा मेरठ लोकसभा सीट पर वरिष्ठ कांग्रेस नेता अम्बिका सोनी भी चुनाव लड़ीं, लेकिन हार गर्इं। 1984 में भाजपा ने शहर सीट से शकुन्तला कौशिक को उतारा, लेकिन जनता ने उन्हें भी नकार दिया। पिछले कुछ चुनावों में भी महिला प्रत्याशियों का यही हाल रहा। 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने बहुत उम्मीदों के साथ यहां फिल्म अभिनेत्री नगमा को चुनाव लड़ाया, लेकिन वो भी पार्टी की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पार्इं। 2022 के विधानसभा चुनावों में एक और फिल्म अभिनेत्री अर्चना गौतम ने हस्तिनापुर से चुनाव लड़ा, लेकिन जनता ने उन्हें भी हरा दिया।
इसी चुनाव में किठौर से बबीता गुर्जर चुनाव लड़ी, लेकिन चुनाव हार गर्इं। एक बार खरखौदा से शारदा त्यागी ने चुनाव लड़ा था, हालांकि यह चुनाव बाद में रद्द हो गया था। कुल मिलाकर मेरठ के मतदाताओं का मिजाज ज्यादातर महिला उम्मीदवारों के मिजाज से मेल नहीं खा पाया और यही करण भी रहा कि मेरठ के अधिकतर मतदाताओं ने अपनी पसंद के हिसाब से पुरुष प्रत्याशी को ही अपना नुमाइन्दा चुना।
आजाद महिला उम्मीदवारों को तो कोई नामलेवा तक नहीं
राजनीतिक लोगों के अनुसार इस दौरान कई महिला उम्मीदवारों ने आजाद उम्मीदवार के रूप में भी पर्चे दाखिल किए और चुनावी मैदान में ताल ठोंकी, लेकिन किसी भी आजाद महिला उम्मीदवार को मेरठ के मतदाताओं ने अपना समर्थन नहीं दिया। इन आजाद महिला उम्मीदवारों ने लोकसभा से लेकर विधान सभा चुनावों तक में अपना भाग्य आजमाया, लेकिन कामयाबी हासिल करने से कोसों दूर रहीं।

