ब्रह्मलीन महंत पीठाधीश्वर अवेद्यनाथ जैसे प्रभावशाली, सर्वस्वीकार्य, हर किसके लिए बड़े महाराज के करीब दो दशक के संरक्षण के बाद 9 सितंबर 2014 को उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गोरक्षपीठ उत्तराधिकारी से पीठाधीश्वर बने थे। नाथपंथ की सबसे बड़ी पीठ माने जाने वाली इस पीठ पर योगीजी के गुरु महंत अवेद्यनाथ 34 साल तक और उनके गुरु ब्रह्मलीन महंत दिग्विजय 45 वर्ष तक पीठाधीश्वर रहे। उल्लेखनीय है कि 12 सितंबर 2014 को महंत अवेद्यनाथ ब्रह्मलीन हुए थे। 14 सितंबर को उनको समाधि देने के पहले उनका नाथ पंथ और सनातन धर्म की परंपरा के अनुसार अभिषेक किया गया। उसके बाद पंचों (रेवती रमण दास, पीडी जैन,अरुणेश शाही, धर्मेंद्र वर्मा और मारकंडेय यादव) ने उनको पीठाधीश्वर का आसन ग्रहण कराया।
क्यों खास है गोरकाशपीठ
गोरखपुर स्थित गोरक्षपीठ खुद में बेहद खास है। पिछले 100 साल में धर्म, समाज और राजनीति के हर क्षेत्र में इस पीठ के पीठाधीश्वरों ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। यह पूर्वांचल की अध्यक्षीय पीठ है। श्रद्धा का ऐसा केंद्र जिसके आगे बड़े बड़े नतमस्तक होते रहे हैं। पीठ जिसके सर पर हाथ रख दे वह सांसद, मेयर, चेयरमैन एमएलसी और विधायक बन जाता है। इतिहास इसका गवाह है। यह पीठ लोक का धड़कन और विश्वास है। संकट की साथी है। भटकने पर मार्गदर्शक और हताशा में उत्साह का संचार करने वाली है। पीठ की सामाजिक समरसता की बेहद मजबूत और गहरी जड़ें सारे जातीय समीकरणों और दलीय समीकरणों पर भारी पड़ती है। पीठ का संदेश या सुझाव आदेश सरीखा होता है।
पीठ का विस्तार
पीठ का विस्तार केवल गोरखपुर या पूर्वांचल तक नहीं। इसका विस्तार उत्तराखंड से मीनाक्षीपुरम तक। नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, म्यामांर से पाकिस्तान (पेशावर) तक। पांच देशों एवं देश के दस राज्यों में नाथ पंथ से जुड़े पांच हजार से अधिक मठ- मन्दिरों के किसी भी विवाद पर अंतिम निर्णय गोरक्षपीठ का ही होता है।
यह पीठ समाज से छुआछूत, जात-पात और अंधविश्वास का विरोध करने वाली एक ताकत। समाज में शिक्षा की अलख जगाने वाली जोत। अशक्तों के सस्ते उपचार के लिए नए दरवाजे खोलने वाली संस्था और गो वंश की रक्षक भी है।