Wednesday, April 1, 2026
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तेरा ही तेरा

Amritvani


श्री गुरुनानक देव जी के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना, जिसके बाद से गुरु नानक देव जी संत हो गए। वे जागीरदार की नौकरी करते थे। उनका काम था सिपाहियों को राशन बांटना। वे पूरा दिन गेहूं, दाल, चना तोल करके सिपाहियों को देते रहते थे। एक दिन गिनती में कुछ गड़बड़ी हो गई। सारा हिसाब किताब ही अस्त व्यस्त हो गया। नापते तौलते समय गिनती बारह तक तो सही रही। तेरह के आते- आते उन्हें तेरह से तेरा और तेरे का ख्याल आ गया।

फिर तो उनके मुख से चौदह नहीं निकल सका। फिर जितने भी पल्ले तौलने के लिए भरे, उनके लिए उनके मुख से तेरा तेरा ही चलने लगा। वहां इकट्ठी हुई भीड़ ने उनसे कहा कि यह क्या कर रहे हो? गुरु नानक जी ने उत्तर दिया कि अब इससे आगे और क्या गिनती हो सकती है! यही गिनती सही है कि अब सब तेरा ही तेरा हो गया है। तब उनकी वह नौकरी तो छूट गई और इससे बड़ी परमात्मा की नौकरी मिल गई। और उसी के सेवक हो गए, संत हो गए।

जब कोई उनसे पूछता कि यह रोशनी जिंदगी में कैसे आई? उनका जवाब होता कि यह सब तेरा ही तेरा की रोशनी है। महात्मा फरमाते हैं कि कर्म से बंधने के लिए ‘मैं’ और ‘मेरा’ चाहिए। तब मैं बन जाता है ‘पक्षी’ और मेरा बन जाता है ‘पिंजरा’। जिस दिन मैं और मेरा छोड़कर तू और तेरा हो जाता है , उस दिन सब दुविधाएं समाप्त हो जाती हैं , पक्षी पिंजरे से मुक्त हो जाता है और जीवन कर्म यज्ञ बन जाता है।

प्रस्तुति: राजेंद्र कुमार शर्मा


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