Tuesday, March 17, 2026
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युवा झेल रहे बेरोजगारी की मार

Nazariya


RAMSHARAN JOSHIफेसबुक पर मोदी-नेतृत्व के भाजपा सत्ता प्रतिष्ठान के चरित्र से पोस्टों पर नजर पड़ी। तीनों ही बेहद दिलचस्प और आश्चर्यजनक। तीनों ही असली हैं, फर्ज़ी नहीं हैं। तीनों मोदी-सरकार की भीषण नाकामियों का ताजा आख्यान हैं। हम पहली पोस्ट पर चर्चा करते हैं। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने अत्यंत आश्चर्यजनक आत्मस्वीकृति की है। विगत मंगलवार को ‘भारत रोजगार रिपोर्ट 2024: युवा रोजगार, शिक्षा और कौशलह्व जारी करने के अवसर पर बोलते हुए नागेश्वरन कहते है कि यह सोचना गलत है कि सरकार सभी सामाजिक-आर्थिक समस्याओं, विशेष रूप से बेरोजगारी का समाधान कर सकती है। वे कहते हैं कि इस समस्या के सम्बन्ध में हर जगह बोलता रहूंगा, लेकिन सरकार इसका समाधान करेगी, यह सोच गलत है। अब आर्थिक सलाहकार की इस सोच की कुछ चीर -फाड़ की जाए।
18वीं लोकसभा के लिए मतदान करीब हैं। इस पृष्ठभूमि में मोदी-सरकार के आला आर्थिक सलाहकर का यह कथन किस बात का संकेत देता है? क्या यह मान लिया जाए कि मोदी-सरकार रोजगार सृजन और उपलब्ध कराने के क्षेत्र में नाकाम हो चुकी है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमृत महोत्सव काल में कहते रहे हैं कि प्रतिवर्ष 2 करोड़ नौकरियां देंगे। अब तक सरकार ने कितनी नौकरियां दीं हैं, इसका लेखा-जोखा जारी किया है? क्या प्रधानमंत्री के उक्त कथन या जबानी संकल्प से मुख्य सलाहकार अवगत हैं? चूंकि चुनावों की घोषणा और आचार संहिता लागू हो चुकी है तब नागेश्वरन अपने हाथ खड़े कर रहे हैं और लोगों के मानस को बदलने का प्रयास कर रहे हैं कि वे भीषण बेरोजगारी के लिए सरकार को दोषी या अपराधी न ठहराएं। क्या सलाहकार बतलायेंगे कि नौकरियां ईश्वर या दैवी शक्ति देगी? हिन्दुओं के 36 करोड़ देवी-देवता हैं, कौनसा देवता बेरोजगारी का समाधान करेगा? अयोध्या में भव्यता के साथ राम जन्मभूमि मंदिर के बन जाने के बाद भी मोदी-सरकार असफल क्यों है?

चंद कॉरपोरेट घरानों की दौलत में अकूत इजाफा होने के बाद भी रोजगार मोर्चे पर मोदी-सरकार बेबस क्यों दिखाई दे रही है? क्या सलाहकार महोदय इस पर प्रकाश डालेंगे? क्या वे अंतरष्ट्रीय श्रम संगठन की ताजा रिपोर्ट का अध्ययन करेंगे जिसमें कहा गया है कि भारत के युवा संसार में 83 प्रतिशत बेरोजगारी फैली हुई है? एक तरह से नौकरीविहीनता महामारी की तरह फैल रही है। मुख्य आर्थिक सलाहकार की बहुमूल्य राय है कि सरकार सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती। नागेश्वरन बतलायेंगे कि राज्य और सरकार के मूलभूत कर्त्तव्य क्या हैं? दोनों संस्थाएं अस्तित्व में क्यों और कैसे आर्इं? क्या सरकार का काम और उत्तरदायित्व समाज का कुशल प्रबंधन नहीं है? क्या सरकार का काम समाज में व्याप्त असमानता, गुरबत, भूख, बेरोजगारी, ऊंच-नीच के भाव, साम्प्रदायिकता को समाप्त करना नहीं है? क्या अपने नागरिकों को गरिमापूर्ण जीवन उपलब्ध कराना नहीं है? क्या राज्य और सरकार सिर्फ कानून -व्यवस्था बनाये रखने और सरहदी शत्रुओं से लड़ने के लिए ही हैं?

एक विख्यात वकील व एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण की है। उनकी पोस्ट बतलाती है कि ‘उत्तर प्रदेश में 62 चपरासी पदों के लिए 3700 पीएचडी, 28000 स्नातोकत्तर और 50000 स्नातक लोगों ने अपनी अर्ज़िया दी हैं। आज का जॉब-संकट इस सीमा तक पहुंच चुका है।’ क्या मुख्य सलाहकार प्रशांत भूषण के आंकड़ों की व्याख्या करने की जहमत उठाएंगे? एक पोस्ट का संबंध मोदी-सरकार की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री पति डॉ. परकाला प्रभाकर के वीडियो से है। सोशल मीडिया पर चल रहे वीडियो और पोस्ट में प्रभाकर स्पष्ट शब्दों में बतलाते हैं कि चुनावी बांड भारत ही नहीं, दुनिया का सबसे बड़ा महाघोटाला है।

इस सम्बन्ध में आला सलाहकार का क्या कहना है? वे किन शब्दों में इस ऐतिहासिक महाघोटाले की व्याख्या करेंगे? क्या इसका संबंध देश की अर्थव्यवस्था से नहीं है? प्रभाकर कोई मामूली अर्थशास्त्री नहीं हैं। उनका महत्व इसलिए नहीं है कि वे जेएनयू की पूर्व छात्रा और वर्तमान वित्तमंत्री के पति हैं। वे स्वयं भी उसी विश्वविद्यालय के छात्र रह चुके हैं और भारतीय राजनैतिक अर्थशास्त्री हैं। लंदन स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स में शिक्षित रहे हैं। राज्य की पोलिटिकल इकोनॉमी पर बारीकी पकड़ रखते है। इसलिए उन्होंने चुनावी बांड को दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला कहा है। अब हमारे बड़बोले और मीडिया अनुरागी प्रधानमंत्री को आला सलाहकार की क्या सलाह रहेगी? क्या वे जनता के साथ अपनी सलाह को साझा करेंगे? क्योंकि, हजारों करोड़ रुपए के घोटाले का रिश्ता देश की अर्थ व्यवस्था से न रहे, यह तो नामुमकिन है। (वैसे मोदी है तो मुमकिन है)।

उपलब्ध आंकड़ों से साफ जाहिर है कि मोदी-सरकार घोटाले की जिÞम्मेदारी से अपना मुंह नहीं मोड़ सकती। किन-किन दुश्चक्रों के माध्यम से धन पशुओं यानी कंपनियों को अवैध ढंग से लाभ पहुंचाया गया है, यह स्वत: सिद्ध है। यहां तक कि फर्जी कंपनियों का इस्तेमाल किया गया और ऐसी कंपनियों से बॉन्डों के रूप में करोड़ों रुपये का चंदा लिया गया जिन पर नकली दवाइयों के बनाने का आरोप है। क्या यह देश के नागरिकों के जीवन के साथ खिलवाड़ नहीं है? क्या यह हिंदुत्व है? क्या इसे ‘रामराज’ कहा जाए? क्या मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन 140 करोड़ भारतीय जन के प्रति अपनी जिÞम्मेदारी सत्यनिष्ठा के साथ निभाएंगे? हम भारतवासी सवालों का जवाब चाहते हैं।


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