Thursday, March 12, 2026
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ग्राउंड पर जीरो, नेतागिरी में बनना चाहें हीरो

  • अब तक न बन सकी हैं बूथ और न ही ब्लॉक की कमेटियां

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: मुंगेरीलाल के हसीन सपने की मिसाल इससे बड़ी क्या होगी कि आंखें तो दिल्ली के राजसिंहासन पर गड़ाई जा रही हैं, लेकिन जब सियासत के अखाड़े में उतरने की बात आती है तो बगले झांकने के अलावा कुछ नहीं किया जा रहा है। जी हां! हम बात कर रहे हैं प्रदेश के सबसे बड़े राजनीतिक संगठन समाजवादी पार्टी की। जहां सब कुछ हवाई किलाबंदी है। नेता बनने की तो यहां सभी को ख्वाहिश है, लेकिन जिनको जिम्मेदार बनाया गया है,

वह खुद वन मैन शो की सियासत में मशगूल दिखाई दे रहे हैं। लापरवाही की इससे बड़ी मिसाल क्या होगी कि चुनाव सिर पर हैं और समाजवादी पार्टी में अब तक न तो बूथ कमेटियां और न ही ब्लॉक में कमेटियों का गठन ही किया जा सका है। लापरवाही की इससे बड़ी मिसाल क्या होगी कि समाजवादी पार्टी के सबसे बडेÞ वोट बैंक कहे जाने वाले मुस्लिम इलाको में सिरे से वोटें गायब हो गई हैं, लेकिन जिम्मेदार सिर्फ बंद कमरों में बैठकर अपने धुरंधर होने के दावे कर रहे हैं।

प्रदेश में सबसे बडेÞ राजनीतिक संगठन होने का माद्दा रखने वाला समाजवादी पार्टी का वजूद इन दिनों सिमटता ही जा रहा है। पूरे देश में भाजपा की लहर होने के बावजूद शहर सीट पर समाजवादी पार्टी ने अपना कब्जा बरकरार रखा, लेकिन निकाय चुनाव में यह भ्रम तिलिस्म की तरह खत्म हो गया। जब सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की मर्जी पर सरधना विधायक अतुल प्रधान की पत्नी व पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष सीमा प्रधान को मेयर बनाने के लिए दिये गये टिकट पर एकजुट होने की जगह संगठन में तीन किनारे बन गये।

अपनी पत्नी को मेयर बनाने का ख्वाब संजोये हुए शहर विधायक रफीक अंसारी के कहने पर भी जब उनकी बात नहीं मानी गई तो वह नाराज हो गये और चुनाव से न सिर्फ अपनी दूरी बना ली बल्कि कोशिश भी नहीं की कि जनता समाजवादी पार्टी के प्रति अपना मोह बरकरार रखे। आपसी गुटबाजी का नतीजा मेयर के चुनाव में जब सामने आया तो उसके बाद भी अपनी कमियों को दूर करने और गुटबाजी को खत्म करने की कोई पहल ही नहीं की गई। जिसका नतीजा यह निकला कि समाजवादी पार्टी का परंपरागत वोटर ही उससे दूर होता जा रहा है

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और इसके लिए संगठन के किसी भी जिम्मेदार के चेहरे पर शिकन तक नहीं आ रही है। कहा यह भी जा रहा है कि अखिलेश यादव के कहने पर भी तीनों विधायकों ने प्रचार प्रसार में भागीदारी नहीं की। गत वर्ष सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के मेरठ में रोड शो से समजावादी पार्टी के शहर विधाक रफीक अंसारी, सिवालखास विधायक गुलाम मौहम्मद तथा किठौर विधायक शाहिद मंजूर ने दूरियां बनाये रखी। समाजवादी पार्टी के उच्च स्तर पर जब गुटबाजी का यह आलम है तो निचले स्तर का खुद ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

2024 का लोकसभा चुनाव जीतने के लिए अखिलेश यादव ने तैयारियां तो जोरदार की हैं। उन्होंने हर बूथ पर 10 सदस्योें की कमेटी बनाकर अल्पसंख्यक, दलित और पिछड़ा वर्ग को भागीदारी करने का मौका दिया है तथा हर कमेटी सदस्यों को अपने बूथ पर 100 वोटरों से सम्पर्क कर जोड़ने का लक्ष्य दिया गया है। लक्ष्य में इन नये लोगों के नाम तथा पूरी जानकारी को आॅन रिकार्ड रखने के लिए निर्देशित किया गया है। इसके साथ ही 10 सदस्यीय 10 बूथ कमेटियों की निगरानी के लिए एक सेक्टर कमेटी तथा सेक्टर कमेटियों की निगरानी के लिए जोन कमेटियां बनाने के लिए निर्देशित किया गया है। साथ ही हर विधानसभा क्षेत्र में नौ जोन बनाये गये हैं।

अब सपा सुप्रीमो के आदेश के इतर देखें तो नगर और जिलाध्यक्ष दो किनारे बनकर रह गये हैं। जिलाध्यक्ष को नगर अध्यक्ष और नगर अध्यक्ष को जिलाध्यक्ष से कोई सरोकार ही नहीं रह गया है। मासिक बैठक में साथ बैठकर एक साथ होने का दावा किया जाता है, लेकिन मीटिंग खत्म और सरोकार खत्म। लोकसभा चुनाव के लिए वर्तमान में सिर्फ भाजपा ही एक मात्र ऐसा संगठन है, जिसने अपने बूथ को पूरी तरह से मजबूत कर दिया है। जबकि समाजवादी पार्टी में अब तक ब्लॉक कमेटियां तो दूर, बूथ कमेटियां तक नहीं बनाई जा सकी हैं। समाजवादी पार्टी में गुटबाजी का खामियाजा पार्टी को निकट भविष्य में होने वाले लोकसभा चुनाव में निश्चित तौर पर भुगतना पड़ सकता है।

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