Sunday, May 31, 2026
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जैसी नीयत, वैसी मुराद

 

Sanskar 4


हम अपनी सोच का दायरा जब तक नहीं बदलेंगे, तब तक सुखी नहीं रह सकते, दुख और कष्ट हमें सताते ही रहेंगे। अपने कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर शुभ की कामना करने से अह्यछा ही होगा और सदा अशुभ सोचने से अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम करेंगे। इसलिए सावधानी बरतना बहुत आवश्यक है।

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हम लोगों ने कल्पवृक्ष और कामधेनुके विषय में पढ़ा भी है और सुना भी है। कहते हैं, ये दोनों मनुष्य की मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं। कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर मनुष्य जो भी कामना करता है, वह अवश्य पूर्ण हो जाती है। हमारे शरीर में हमारा मस्तिष्क कल्पवृक्ष की भाँति होता है। मनुष्य जिस चीज की उत्कट कामना करता है, वह देर-सवेर उसे अवश्य मिल जाती है। जैसी-जैसी कामना वह करता है, उसी के अनुरूप उसे उसका फल मिलता रहता है।

जीवन में आगे बढ़ने के लिए मनुष्य को अपने विचारों पर नियंत्रण रखना चाहिए। मनुष्य के विचारों से ही उसका जीवन स्वर्गमय या नरकमय बनता है। जीवन में सुख या दुख आते हैं, उसके लिए बहुधा उसकी सोच कारण बनती है। मनुष्य के विचार अलादीन के चिराग की तरह होते है। उनसे वह जो मांगता है वह उसे मिल जाता है। यदि उसकी सोच सकारात्मक होगी तो वह अपने जीवनकाल में सकारात्मक कार्य करके प्रसिद्ध हो जाता है और अनुकरणीय बन जाता है।

इसके विपरीत कुछ लोगों को जीवन में दुख-परेशानियां ही मिलती हैं क्योंकि वे सदा अशुभ की ही कामना करते हैं। मनुष्य पहले छककर खा लेता है, फिर कहता है अब तो पेट में दर्द होगा या गैस बनेगी और परेशान करेगी। वास्तव में वैसा हो जाता है। बारिश में मजे लेकर भीगता है और साथ ही कहता है अब तो मुझे खांसी-जुकाम या बुखार हो जाएगा।

अंतत: वह बीमार पड़ जाता है। कभी कहता है कि कहीं मेरा पैर फिसल गया तो टांग में फ्रैक्चर हो जाएगा। जरा-सा कष्ट अथवा परेशानी का सामना करना पड़ जाए तो वह अपनी किस्मत को कोसने लगता है। फिर तो सचमुच ही उसकी किस्मत उसे धोखा दे जाती है यानी खराब हो जाती हैं। बड़े-बुजुर्ग कहते हैं-जैसी नियत वैसी मुराद इस प्रकार हमारा अवचेतन मन कल्पवृक्ष की तरह हमारी इच्छाओं को ईमानदारी से पूर्ण कर देता है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपने मस्तिष्क में सदविचारों को प्रवेश करने की अनुमति दे और कुविचारों को झटक दे। यदि कुविचार मानस में समा जाएंगे तो फिर उनका दुष्परिणाम उसे अवश्य ही भुगतना पड़ेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को सदा सकारात्मक विचारों को प्रश्रय देना चाहिए और नकारात्मक विचारों से मुंह मोड़ लेना चाहिए।

इसी संबंध में एक कहानी वाट्सअप पर पड़ी थी। कुछ संशोधन के बाद आपके साथ साझा कर रही हूं। किसी घने जंगल में कल्पवृक्ष की भांति एक इह्यछापूर्ति वृक्ष था। उसके नीचे बैठ कर कोई भी मनुष्य कामना करता था तो वह तत्क्षण पूर्ण हो जाती थी। यह बात बहुत कम लोग जानते थे। उस घने जंगल में जाने का कोई साहस ही नहीं जुटा पाता था। संयोग से एक बार थका हुआ व्यापारी उस वृक्ष के नीचे आराम करने के लिए बैठ गया। थकावट के कारण उसे पता ही नहीं चला कि कब वह सो गया। जागते ही उसे बहुत जोर की भूख लगी, उसने आस पास देखकर सोचा- काश कुछ खाने को मिल जाए।
तत्काल स्वादिष्ट पकवानों से भरी थाली हवा में तैरती हुई उसके सामने आ गई। व्यापारी ने भरपेट खाना खाया और भूख शान्त होने के बाद सोचने लगा, काश पीने को भी मिल जाता तो अच्छा होता।

तत्काल उसके सामने हवा में तैरते हुए अनेक शरबत आ गए। शरबत पीने के बाद वह आराम से बैठ कर सोचने लगा, कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा हूं। हवा से खाना-पानी प्रकट होते पहले कभी नहीं देखा है और न ही सुना है। अवश्य ही इस पेड़ पर कोई भूत रहता होगा जो खिला- पिलाकर बाद में मुझे भी खा जाएगा। उसके ऐसा सोचते ही पलक झपकते उसके सामने एक भूत आया और उसे खा गया।

यह कहानी हमें यही समझा रही है कि मनुष्य की जैसी सोच होती है, उसे वैसा ही फल मिलता है। यदि उसने नकारात्मक न सोचा होता तो शायद वह उस जंगल से सुरक्षित निकल जाता। घर जाकर परिवार के साथ आराम से रहता परंतु ऐसा हो नहीं सका। अपनी नकारात्मक सोच के कारण उसकी मृत्यु वहीं जंगल में ही हो गई। अपने आसपास ऐसी विचारधारा के लोग हमें मिल जाते हैं। कई बार उन पर क्रोध भी आता है कि जब पता है कि फलां कार्य करके हानि होगी तो उस काम को करो ही नहीं। यदि कर लिया तो फिर परेशान मत हो।

हम अपनी सोच का दायरा जब तक नहीं बदलेंगे, तब तक सुखी नहीं रह सकते, दुख और कष्ट हमें सताते ही रहेंगे। अपने कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर शुभ की कामना करने से अह्यछा ही होगा और सदा अशुभ सोचने से अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम करेंगे। इसलिए सावधानी बरतना बहुत आवश्यक है।

चंद्र प्रभा सूद


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