Thursday, March 19, 2026
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बढ़ती ही जा रही है अवसाद की बीमारी

 

Sehat 7


भागदौड़ की व्यस्त जिंदगी के कारण उपजने वाली बीमारी अवसाद का प्रभाव सबसे अधिक महिलाओं पर ही पड़ता है। घर से लेकर बाहर तक का जीवन इतना व्यस्त होता जा रहा है कि महिलाएं इसकी गिरफ्त में फंसकर अपनी मानसिक शान्ति को खोने लगती हैं तथा भय,क्रोध, घबराहट, अरूचि आदि अनेक बीमारियों का शिकार होती जा रही हैं। अवसाद के लक्षण मानसिक बीमारी के अलावा शारीरिक बाह्य लक्षणों के साथ भी उभर कर आने लगते हैं।

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सिर, सीना, कमर, शरीर में दर्द का प्रकोप बढ़ने लगता है, दिल की धडकन बढ़ जाती है, किसी काम में मन नहीं लगता, साथ ही आत्मविश्वास भी कम होने लगता है। अवसाद के घेरे में आकर स्त्रियों का स्वभाव चिड़चिड़ा होने लगता है, शारीरिक फिटनेस के साथ ही सुंदरता नष्ट होने लगती है।

अवसाद के शिकार सिर्फ वयस्क ही नहीं होते बल्कि बच्चे भी इस महामारी के पंजे में फंस जाते हैं। जो बच्चे परिस्थितियों से जूझने की क्षमता नहीं रखते, उनमें मनोवैज्ञानिक रूप से अवसाद की छाया देखी जाती है। बस्ते का बढ़ता बोझ, होमवर्क करने की मजबूरी, ट्यूशन की मानसिकता आदि अनेक ऐसे कारण हैं जिनसे छोटी उम्र में ही बच्चों को डिप्रेशन का शिकार हो जाना होता है।

पारिवारिक परिस्थितियां भी कई बार डिप्रेशन का कारण बन जाया करती हैं। आर्थिक क्षति, नौकरी चली जाना, परिवारीजन की आकस्मिक मौत या दुर्घटना आदि अनेक ऐसे कारण होते हैं, जो डिप्रेशन के कारण बन जाते हैं।

डिप्रेशन का एक रूप मैनिक डिप्रेशन साइकोसिस होता है जिसे बाई पोलर इफेक्टिव डिसआर्डर भी कहा जाता है। इसके एक छोर पर डिप्रेशन और दूसरे छोर पर मेनिया होती है। यह कई सालों तक चलता रहता है और इसका उपचार भी जटिल होता है। इससे ग्रसित व्यक्ति का मन किसी काम में नहीं लगता और हमेशा बिस्तर पकड़े रहता है।

एक पैथोलॉजिकल डिप्रेशन होता है। यह एक प्रकार का सामान्य डिप्रेशन होता है जिसका दौर अधिक से अधिक एक महीने तक रहता है और समय के साथ-साथ इसका दौर कम होने लगता है। साइकोथिरेपी के तहत ही इसका उपचार संभव होता है। हालांकि हर मरीज को इसकी जरूरत नहीं होती लेकिन इसका फायदा पहुंचता अवश्य है।

डिप्रेशन का उपचार औषधियों एवं साइकोथिरेपी के माध्यम से किया जाता है। डिप्रेशन का रोगी उपचार तो प्रारंभ कर देता है परंतु धैर्य के साथ उपचार नहीं करता। ऐसा माना जाता है कि डिप्रेशन का दौर तीन से चार महीने का होता है। इस कारण मरीज का इलाज छह माह से एक साल तक चलता है। अगर मरीज बीच में ही उपचार छोड़ देता है तो उसे फिर से डिप्रेशन का शिकार होना पड़ सकता है।

डिप्रेशन की महामारी पर अंकुश लगाने का कारगर उपाय योग ही है। ध्यान एवं योग से कुछ खास तरह के हार्मोन उत्सर्जित होते हैं जिनसे अवसाद से राहत मिलती है। अगर अवसाद पर आत्मसंयम से नियंत्रण नहीं किया गया तो निश्चित ही अवसाद की महामारी एक बहुत बड़ी संख्या को काल के गाल में समा लेगी।

आनंद कुमार अनंत


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