Friday, March 20, 2026
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पंथ निरपेक्षता के प्रेरणा स्रोत – गणेश शंकर विद्यार्थी

 

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भारत में हिन्दू मुस्लिम ऐक्य की संस्थापना हेतु अपने प्राणों की बलि देने वाले अमर शहीद पत्रकार श्री गणेश विद्यार्थी का जन्म 26 अक्तूबर 1890 को इलाहाबाद के अतरसुइया मोहल्ले में अपने नाना के घर में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री जयनारायण श्रीवास्तव और माता का नाम गोमती देवी था। पिता ग्वालियर रिसायत में गुना जिले के मुगावलों में एक विद्यालय में अध्यापक थे।

विद्यार्थी जी ने पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी के सान्निध्य में 2 नवंबर, 1911 को मात्र 25 रुपये मासिक वेतन की नौकरी से अपने पत्रकार जीवन की शुरूआत की। इस प्रकार वे ‘सरस्वती’ से जुड़े। धीरे-धीरे विभिन्न उतार चढ़ावों को पार कर विद्यार्थी जी ने 9 नवंबर, 1913 को कानपुर से ‘प्रताप’ नामक एक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ किया जिसका मौलिक उद्देश्य भारत में आजादी की मशाल जलाना था।

सन1916 के कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में विद्यार्थी जी गांधी जी के सानिध्य में आये जिनसे प्रभावित होकर उन्होंने अपनी लेखनी को धारदार बनाया। 22 अप्रैल 1918 को ‘फिदा-ए-वतन’ नामक कविता ‘प्रताप’ में प्रकाशित हुई जिसमें देशभक्ति और देश के लिए नवयुवकों को प्रोत्साहित किया गया था

तत्कालीन ब्रितानी सरकार इससे तिलमिला उठी और विद्यार्थी जी को जमानत जमा करने पर ही पत्र के प्रकाशन की अनुमति मिली। चूंकि विद्यार्थी जी जमींदारों, मिल मालिकों आदि के विरूद्ध भी खूब लिखते थे, अत: उनके पत्र को चन्दा देने वाले लोग उनसे नाराज हो गये जिसके कारण ‘प्रताप’ आर्थिक संकट के कगार पर पहुंच गया। जून 1918 में तो उन्हें बन्द करने की भी नौबत आ गयी किन्तु विद्यार्थी जी के अदभ्य साहस के समक्ष आर्थिक संकट की बाधा ने सर झुकाया और दो सप्ताह बाद ही जुलाई मास से प्रताप का प्रकाशन पुन: प्रारम्भ हो गया। जनता के बीच धीरे-धीरे प्रताप की लोकप्रियता बढ़ी और विद्यार्थी जी को 1920 में प्रताप का प्रकाशन दैनिक करना पड़ा।

राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत साहसिक पत्रकारिता के कारण राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान पांच बार जेल की सजा काटने वाले विद्याथीर्जी अपनी बेबाक टिप्पणियों के कारण प्रसिद्ध थे।

1921 के रायबरेली काण्ड पर उनके लेखों के कारण उन पर दो-दो मुकदमे कायम हुए। दोनों ही मुकदमों का निर्णय उनके विरूद्ध गया। उनसे जमानत मांगी गयी जिसे देने से उन्होंने इंकार कर दिया। फलत: 16 अक्तूबर 1921 को उन्हें सजा हो गयी और वे कैद करके लखनऊ जेल भेज दिए गये जहां से वे 22 मई 1922 को छूटे। उसी समय जेल में उन्हें पं. मोती लाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, पुरूषोत्तम दास टंडन, आचार्य कृपलानी आदि नेताओं के साथ रहकर बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला।

विद्यार्थी जी को भाषण देने के लिए दूर-दूर से बुलाया जाने लगा था। 20 मार्च 1923 को फतेहपुर में उन्होंने एक ऐसा क्र ान्तिकारी भाषण दिया कि उन पर देशद्रोह का मुकदमा कायम हो गया और सजा हो गयी। यह सजा काट कर वे 29 जनवरी, 1924 को नैनी सेंट्रल जेल से छूटे। अब वे सही अर्थों में नेता ही नहीं, एक क्रान्तिकारी और क्रान्तिकारियों के रहनुमा बन चुके थे।

विद्याथीर्जी ने ऐतिहासिक काकोरी कांड के मुकदमे की ऐसी सजीव रिपोर्टिंग की कि मुकदमा क्रान्तिकारी दर्शन के प्रचार का साधन बन गया था। उन्होंने प्रताप में कुछ क्रान्तिकारी नारे भी प्रकाशित किए जिनको जेल से चलकर अदालत तक बेड़ियों की धुन पर काकोरी कांड के क्र ान्तिकारी गाते हुए आते थे।

इसके बाद जब रामप्रसाद बिस्मिल गोरखपुर जेल में थे, तभी विद्यार्थी जी ने चोरी-चोरी उनकी आत्मकथा भी मंगाकर ‘प्रताप’ में छाप डाली। जिस समय भगत सिंह अनेक मामलों में भूमिगत थे, तब विद्याथीर्जी ने ‘प्रताप’ में उन्हें सह संपादक के पद पर रख लिया। इसी बीच बलवंत नाम से भगतसिंह के कई लेख भी छपे।

तत्कालीन भारत में जिस तरह से धर्म की संकुचित मीमांसा हो रही थी और उसका भारतीय जनता के ऊपर जो दुष्प्रभाव पड़ रहा था उससे विद्यार्थी जी भलीभांति अवगत थे। 28 अक्तूबर 1924 को प्रताप में ‘धर्म की आड़ में’ नामक अपने चर्चित लेख में विद्यार्थी जी ने लिखा था-‘इस समय देश में धर्म की धूम है। उत्पात किये जाते हैं तो धर्म और ईमान के नाम पर, जिद की जाती है तो धर्म और ईमान के नाम पर। रमुझ पासी और बुद्धू मियां धर्म और ईमान को जानें या न जानें परन्तु उनके नाम पर उबल जाते हैं। देश के सभी शहरों का यही हाल है। यहां धर्म के नाम पर कुछ इने गिने आदमी अपने हीन, स्वार्थों की सिद्धि के लिए करोड़ों आदमियों की शक्ति का दुरूपयोग किया करते हैं।’ और आगे लिखा था, ‘बुद्धि पर पर्दा डाल पहले ईश्वर और आत्म का स्थान अपने लिए ले लेना और फिर धर्म, ईमान, ईश्वर और आत्मा के नाम पर किये जाने वाले इस भीषण व्यापार को रोकने के लिए साहस और दृढ़ता के साथ खड़ा होना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक नित्यप्रति बढ़ते जाने वाले झगड़े कम न होंगे।’

23 मार्च 1931 को जब भगत ंिसंह को फांसी पर लटका दिया गया तो इसकी सूचना अगले दिन सुबह कानुपर पहुंच गयी। सारे शहर में दहशत छा गयी और अचानक हिन्दू मुस्लिम दंगा हो गया। इसी समय विद्यार्थी जी घर से बाहर निकल पड़े, दिन भर शोक सभाओं और हड़तालों के आह्वान में रहे तथा देर रात घर लौटे।

22 मार्च, 1931 को फिर सुबह मार-काट के समाचार मिलने लगे। घर वालों के लाख मना करने पर भी विद्यार्थी जी नहीं माने। उन्होंने प्रण किया कि किसी भी तरह सांप्रदायिक उन्माद को रोकना होगा। कुछ मुस्लिम औरतों को सुरक्षित बचाकर मुस्लिम मोहल्ले में ले जाते हुए तथा वहां फंसे हिन्दू परिवारों को सुरक्षित निकालने की कोशिश में फसादी तत्वों के शिकार हो गये। रात में विद्यार्थी जी घर न पहुंच पाए। उनकी अमर आत्मा मात्र चालीस वर्ष पांच माह की अल्पायु में परमात्मा में विलीन हो चुकी थी।

उनकी मृत्यु पर बड़े-बड़े नेता रो पड़े थे। उस समय कराची में कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा था। जब यह शोक समाचार गांधी को मिला तो उन्होंने ‘विषय निर्धारिणी समिति’ में उसका उल्लेख करते हुए कहा कि ‘गणेश शंकर विद्यार्थी एक मूर्तिमान संस्था थे। सांप्रदायिक एकता के लिए मैं स्वयं भी इस प्रकार का बलिदान देना चाहता था पर गणेश शंकर विद्यार्थी ने ऐसा बलिदान देकर मुझे पराजित कर दिया।’

फर्श पर चटाईयां बिछाकर लेख, समाचार, संपादकीय लिखने से लेकर डिस्पैच तक करने वाले विद्यार्थी जी का इतना रूतबा था कि मुंशी प्रेमचन्द जी को एक बार विद्यार्थी जी की अनुशंसा पर नौकरी मिली थी जबकि प्रेमचन्द जी उनसे उम्र में लगभग दस साल बड़े थे। विद्यार्थी जी के बारे में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लिखा था ‘उनकी शालीनता, सज्जनता, परिश्रमशीलता और ज्ञानार्जन की सदिच्छा ने मुझे मुग्ध कर लिया। उधर वे मुझे शिक्षक या गुरू मानते थे। इधर मैं स्वयं ही कितनी बातों में उन्हें अपना गुरू समझता था।’

आज आजादी के छ: दशक पूरे होने के पश्चात भी भारत में हिन्दू मुस्लिम सद्भाव की आवश्यकता बरकरार है। भारत की एकता और अखंडता के लिए एक बार फिर गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पंथ निरपेक्षता के जीवन्त ॅोत से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है ताकि भारतवासी धर्म और स?प्रदाय के झगड़े भुलकर भाईचारा कायम कर सके और एक आदर्श भारत अपनी ऐतिहासिक गरिमा के अनुकूल ‘जीओ और जीने दो‘ का प्रतीक बन सके।

पवन कुमार मिश्र


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