Wednesday, March 25, 2026
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आखिर क्यों धधक रहे जंगल?

 

Samvad 37

 


भारत में अप्रैल के शुरूआत से ही गर्मी का कहर जारी है। मौसम के बदलते मिजाज के साथ उत्तर भारत के अधिकांश राज्य लू की चपेट में हैं। वहीं राजस्थान, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश और मध्य भारत गर्मी से झुलस रहा है। रिकार्ड का तोड़ गर्मी के कारण जंगलों में आग लगने के मामले बढ़ते जा रहे हैं।

कुछ समय पूर्व ही राजस्थान का सरिस्का 90 घंटों तक जलता रहा। इसके साथ ही पिछले कुछ दिनों में जम्मू कश्मीर और हिमाचल सहित देश के कई राज्यों में हजारों हेक्टेयर का जंगल तबाह हो गया। यहां हम आपको बताएंगे कि पिछले दो महीनों में सात राज्यों में कितना जंगली इलाका आग की चपेट में आने से बर्बाद हो गया और गर्मी के दिनों में आखिर क्यों आग लगने की घटनाएं बढ़ जाती हैं?

भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार 28 मार्च से 30 मार्च के बीच में देश के जंगलों में 16 हजार 840आगजनी की घटनाएं दर्ज की गई हैं। इनमें से 211 बड़ी घटनाएं थीं। इनमें मध्यप्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और झारखंड के जंगल शामिल हैं। देश के कई राज्यों के जंगल में आग लगने से वन्य संपदा और वन्य जीवों के जीवन पर खतरा मंडराने लगा है। रियासी जिले के जंगल में 20 मार्च को आग लग गई थी। देखते ही देखते शाम तक आग ने भीषण रूप ले लिया और कई हेक्टेयर क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया। आगजनी की इस घटना से वन संपदा को भारी नुकसान हुआ है।

हिमाचल प्रदेश के पार्वती घाटी के जंगल में आग लग गई। भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु की ग्लेशियोलाजिस्ट की टीम पार्वती घाटी में रिसर्च करने के लिए पहुंची तो उन्होंने जंगल में कई जगह आग लगी देखी। इसके तुरंत बाद उन्होंने आग की सूचना प्रशासन को दी। दो दिन में आग ने विकराल रूप ले लिया था।

राजस्थान के अलवर के सरिस्का टाइगर रिजर्व में 27 मार्च को आग लग गई थी। पहले दिन आग ने 1० किमी का इलाके अपनी चपेट में ले लिया था। अधिकारियों की लापरवाही से 50 घंटे बाद आग 20किमी के क्षेत्र में फैल गई। तीन दिन बाद वायुसेना के दो हेलीकाप्टर और 400 लोगों की मदद से आग पर काबू पाया गया। तब तक 700 हेक्टेयर तक जंगली इलाका बर्बाद हो गया था।

गनीमत यह रही कि आग से सरिस्का टाइगर रिजर्व के जानवरों को नुकसान की कोई बात सामने नहीं आई है।मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ बाघ अभ्यारण्य में पिछले 10 दिनों में 121 जगहों पर आगजनी की घटना दर्ज की गई हैं। सतना के जंगलों में भी आगजनी की 32 छुटपुट घटनाएं दर्ज की गई। प्रदेश के जंगलों में महुआ बीनने वाले लोग सूखे पत्तो में आग लगा देते हैं। इससे इस तरह की घटनाएं बढ़ रहीं हैं।

छत्तीसगढ़ के वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार इस साल अब तक राज्य में 8 हजार 833 जगहों पर आग लगने की घटनाएं हो चुकी हैं। बीते दो दिन में ही जंगलों में आग लगने की 8०० से अधिक घटनाएं सामने आईं हैं। बीते 45 दिन में आग से 16.87 हेक्टेयर जंगल इलाका बर्बाद हो गया है।

असम के गुवाहाटी के वशिष्ठ इलाके के घने जंगल में भीषण आग लग गई थी। वन विभाग की टीम ने कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया। आग से कई हेक्टेयर का इलाका जल गया। उत्तराखंड में अब तक प्रदेश के जंगलों में आगजनी की 115 घटनाएं सामने आ चुकी हैं।

30 मार्च यानी बुधवार रात को बमराड़ी से लेकर सीमार के जंगलों में भयंकर आग लग गई। हालांकि, सुबह तक वन विभाग की टीम ने इस पर काबू पा लिया। आग से 20 हेक्टेयर वन जल गया। एक रिपोर्ट के अनुसार 15 फरवरी से 31 मार्च तक राज्य में 180.02 हेक्टेयर जंगल आग की चपेट में आकर बर्बाद हो चुका है।

अब सवाल यह उठता है कि गर्मी में जंगलों में क्यों लगती है आग? एक्सपर्ट के अनुसार मार्च में सामान्य से अधिक तापमान बढ़ने से आगजनी की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं। जंगल में पेड़ों के सूखे पत्ते और टहनियां ईंधन का काम करते हैं। एक छोटी सी चिंगारी हीट का काम करती है। ऐसे में अगर हवा तेज चल रही हो तो एक जगह लगी आग पूरे जंगल को तबाह करने के लिए काफी है।बताया जाता है कि इंसानी लापरवाही जंगल में आग का सबसे बड़ा कारण बनता है।

पेड़ की टहनियों में घर्षण और सूरज की तेज किरणें जंगल में आग लगने का कारण बनने के लिए काफी हैं, लेकिन इंसानों की लापरवाही के कारण जंगलों में आगजनी की सबसे ज्यादा घटनाएं होती हैं। दरअसल, लोग जंगल में शिकार करने या उत्पाद निकालने के लिए आग लगाते हैं जैसे कि मध्यप्रदेश के जंगल में महुआ निकालने के लिए लोग झाडिड़ों में आग लगाते हैं। कई बार जंगल में जाने वाले लोग बीड़ी और सिगरेट पीकर बिना बुझाए फेंक देते हैं, इससे आग लग जाती है।

एक्सपर्ट रिपोर्ट के अनुसार गर्मी के इस सीजन में गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और ओडिशा के जंगलों में आग लगने की सबसे अधिक संभावना है। इन राज्यों में अधिकतम तापमान सामान्य से 4-6 डिग्री सेल्सियस अधिक रहता है। इस कारण आग लगने की घटनाएं बढ़ जाती हैं।

हाल ही में अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसी ने सैटेलाइट तस्वीरों के माध्यम से दावा किया है कि भारत में कई जगह लैंड सर्फेस तापमान 60 डिग्री सेल्सीयस तक पहुंच चुका है। यह दावा चौंकाने वाला है। यद्यपि भारतीय वैज्ञानिकों ने इस दावे को नकारा है और कहा है कि उपग्रह से तापमान का आकलन भ्रामक हो सकता है। भारतीय वैज्ञानिकों का कहना है कि 60 डिग्री सेल्सियस का मतलब यह है कि बुनियादी ढांचा गलने लगता है जबकि ऐसा कुछ नहीं हुआ। इन्हीं दावों के बीच यह साफ है कि मानव ने जितना प्रकृति को अंगूठा दिखाया है, अब प्रकृति उसे अंगूठा दिखाने लगी है।

मानव ने जंगल उजाड़े और कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए। अब बचे-खुचे जंगल मानव के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। तापमान बढ़ने से जंगलों में सूखे पत्ते और टहनियां ईंधन का काम करती हैं। एक छोटी सी चिंगारी हीट का काम करती है। ऐसे में अगर तेज हवायें चल रही हों तो यह आग पूरे जंगल को तबाह कर देती है। इंसानों की लापरवाही के चलते भी आगजनी की घटनायें बढ़ रही हैं।

जम्मू के रियासी जिले के जंगल, हिमाचल के पार्वती घाटी में, राजस्थान के अलवर के सरिस्का टाइगर रिजर्व, उत्तराखंड में बमराडी से लेकर सीमार के जंगलों में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के जंगलों में आग से प्रकृति तबाह हो चुकी है। गर्मियों में तापमान के कहर ढाने के कारणों में ग्लोबल वामिर्जा तो है ही लेकिन भारत में बढ़ते तापमान का कारण वनों का क्षरण भी है।

यही कारण है कि देहरादून, मंसूरी, पंतनगर, रुडकी का अधिकतम तापमान 2 से लेकर 4 डिग्री तक अधिक दर्ज किया गया। पिछले दिनों मुक्तेश्वर और मसूरी जैसे ठंडे स्थानों पर न्यूनतम तापमान सामान्य से 4 डिग्री अधिक दर्ज किया गया। वनाग्नि की आंच उत्तराखंड हिमालय के लगभग 14 ग्लेशियरों तक पहुंच रही है।

वन्य जीवन अपने आप में एक दुनिया होता है। वनों में जीवधारियों को पर्याप्त भोजन के साथ-साथ सुरक्षित आश्रय भी मिल जाता है इसलिए वन सभी तरह के जीवधारियों का प्राकृतिक आवास होते हैं। तमाम वनस्पतियां और वन्य जीव एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। अब हालात यह है कि जंगलों की आग वनस्पति और वन्य जीवों का अस्तित्व राख में बदल रही है।

बाघ और हिरन जैसे वन्य जीवन तो जान बचाकर सुरक्षित क्षेत्र की ओर भाग सकते हैं। तभी तो बाघों और मनुष्य के लिए खतरनाक जीवों को शहरों की सडकों पर घूमते देखा जाता है मगर उन निरीह जीवों और कीट-पतंगों का क्या हाल होगा जो आग की गति से भाग भी नहीं सकते। जंगलों की आग मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन चुकी है।

इस आग के धुएं में अलग-अलग तरह के कण होते हैं जिनमें कार्बन मोनोआक्साइड भी शामिल है। स्थिति बहुत चिन्ताजनक है। ब्लैक कार्बन ग्लेशियरों को लगातार नुक्सान पहुंचा रहे हैं। ग्लेशियर जब पिघलेंगे तो इस पर जमा ब्लैक कार्बन भी बहेगा। इससे जल प्रदूषित हो जाएगा। यह विडम्बना ही है कि किसी पेड़ के कटने से वन विभाग आम आदमी का जीना हराम कर देता है। उस विभाग को जंगलों के जलने का दोषी क्यों न माना जाए।

कौन नहीं जानता कि राज्यों में अवैध खनन माफिया की तरह वन माफिया भी सक्रि य हैं। हर बार जंगल बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कार्य योजना बनाकर जंगल को बचाने का ढिंढोरा पीटा जाता है लेकिन आग से बचाने के लिए जंगल की प्रवृत्ति को बदलने का कोई प्रयास नहीं किया जाता। मानव और व्यवस्था सब तमाशबीन बनकर देख रहे हैं। मौसम परिवर्तन के चक्र ने अपने पंजे भयंकर रूप से फैला दिए हैं।

जंगल अपनी ही हवाओं को सुरक्षित नहीं रख पा रहा। पंजाब और हरियाणा जंगलों की आग से बचे हुए हैं क्योंकि पंजाब में 3.65 प्रतिशत और हरियाणा में 3.53 प्रतिशत जमीन पर ही जंगल है।

अगर मनुष्य को भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं से अपना बचाव करना है तो उसे प्रकृति से खिलवाड़ करना बंद करना होगा और जंगलों को आग से बचाने के लिए नई योजनाएं बनानी होंगी। वन प्रबंधन के लिए सही योजनाएं नहीं बनाई गई तो हमें भयंकर परिणाम झेलने होंगे।

अशोक भाटिया


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