Monday, April 20, 2026
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कांग्रेस क्यों रह गई पीछे?

 

Samvad 38


Rituparn Devइसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। उसके बाद भी चिंतन करना बताता है कि उम्मीदें बाकी है। सच में चिंतन से ही सार निकलता है। लेकिन क्या कांग्रेस के उदयपुर चिन्तन शिविर में सिवाय शीर्ष नेताओं की मौजूदगी और उनके उनके बनाए स्क्रिप्ट के अलावा धरातल की विषय वस्तु पर भी विचार हुआ होगा? जवाब क्या है कहने की जरूरत नहीं, सबको पता है, नहीं। उदयपुर में संगठन को लेकर किस तरह की चिंता की गई यह तो अंदरखाने की बात है, लेकिन देश के लिए जो संदेश निकला, उसमें युवाओं का नष्ट होता भविष्य, बेरोजगारी, जबरदस्त मंहगाई, मुद्रा स्फीति और रूस-यूक्रेन युद्ध के असर पर पूरा ध्यान केंद्रित दिखाया गया। कांग्रेस कुछ राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों के साथ 2024 की रणनीति में अभी से जुटी लग रही है जो ठीक भी है।

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लेकिन क्या 2 अक्टूबर गांधी जयन्ती से भारत जोड़ो पदयात्रा कर पार्टी का जनता बीच जाने का ऐलान लोगों से पुराना रिश्ता दोबारा जोड़ पाएगा?
कांग्रेस कितनी सफल होगी वक्त बताएगा। लेकिन जिस तरह से भाजपा अपनी सर्वोच्च लोकप्रियता के शिखर पर नित नए कीर्तिमान बनाती जा रही है, वैसा कुछ कांग्रेस में कभी दिखा नहीं। हो सकता है तब लोगों की सोच और समझ अलग रही हो, न सोशल मीडिया का जमाना था और न न्यूज चैनलों की भरमार थी। चुनिंदा विकल्पों पर निर्भरता से लोगों की बातें भी एक दूसरे तक खुलकर नहीं पहुंच पाती थीं। आज परिस्थितियां एकदम अलग हैं।

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस ने देश के लिए किया कुछ नहीं। कांग्रेसी हुकूमत में देश ने कई कीर्तिमान और आर्थिक मोर्चों पर जबरदस्त सफलता पाई। उतार-चढ़ाव के बावजूद दुश्मनों ने भारत की ताकत का लोहा माना। कुछ लादे तो कुछ जबरन थोपे युद्धों ने भी बेहद मजबूत किया। तमाम उद्योग और कल-कारखाने स्थापित हुए। विश्व मंच पर भारत की अलग धमक व चमक दिखी।

अर्थशास्त्री पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नीतियों ने बुरे दौर में भी देश को संभाले रखा। लेकिन कांग्रेस ने हमेशा एक ही गलती की थी कि संगठन और लोगों के बीच जुड़े रहने की जहमत नहीं उठाई। इसे चाहे लगातार सत्ता में बने रहने की खुमारी कहें या सत्ता सुख भोग चुके नेताओं की अनदेखी तब इस बारे में चिंतन नहीं किया गया कि क्यों कांग्रेस से लोग छिटकते जा रहे हैं?

आम व नए मतदाताओं की रुचि क्यों घट रही है? स्पष्ट बहुमत तक न पहुंच पाने पर ईमानदार आत्ममंथन या चिन्तन क्यों नहीं हुए? सब कुछ जानते हुए भी इससे एकदम बेखबर कांग्रेस की, बजाए खुद को जनता के बीच मजबूत बनाए रखने के गठबंधन जरिए सरकार में बने रहने की दिलचस्पी ज्यादा थी।

नतीजा सामने है ऐसे ही पेंचों में फंसकर कांग्रेस दिनों दिन कमजोर होती चली गई। देश की बड़ी पार्टियों में शुमार होने के बावजूद लोग अब दूसरों को कांग्रेस के विकल्प के रूप में देखने और सोचने लगे हैं।

यूं तो 1967 में कांग्रेस के वर्चस्व को पहली चुनौती मिली और यह सिलसिला किसी न किसी रूप में लगातार चलता रहा। इंदिरा जी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति लहर में कांग्रेस ने एक बार फिर सारे कीर्तिमान ध्वस्त करते हुए 415 लोकसभा सीटें जीतकर जो रिकॉर्ड बनाया वह इस तरह ध्वस्त होगा किसी ने नहीं सोचा होगा। 1951-52 में हुए पहले आम चुनाव से लेकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर तक कांग्रेस को कोई दूसरी पार्टी टक्कर नहीं दे सकी।

बीच में 1977 में इंदिरा गांधी की सरकार गिरी भी तो बहुत जल्द जोरदार वापसी कर ली। लेकिन न तब और न अब जनता के बीच घुसपैठ बनाने को लेकर पार्टी कभी गंभीर दिखी। हां, पिछले दो आम चुनावों में कांग्रेस का ऐसा बुरा हाल हुआ कि उसे मुख्य विपक्षी दल का दर्जा मिलना भी मुश्किल हो गया।

इतना तो समझ आता है कि देश के मजबूत लोकतंत्र की हिमायती जनता भी चाहती है कि निरंकुश कोई भी दल न हो पाए। इसलिए समय-समय पर जबरदस्त प्रयोग करती है। केंद्र में भले ही भाजपा को खासा बहुमत देकर बिठाया हो, लेकिन राज्यों में अलग-अलग जनादेश देकर मजबूत लोकतंत्र बनाया है।

हो सकता है कांग्रेस भी देर आयद, दुरुस्त आयद की तर्ज पर उदयपुर नव चिन्तन शिविर में मंथन से वो अमृत निकालना चाह रही हो जिससे एक बार फिर सब ठीक होने लगे। लेकिन सवाल वही कि जबरदस्त निकले जहर को पिएगा कौन? जो दिख रहा है उससे तो यही लगता है आराम तलब और फाइव स्टार कल्चर में ढल चुके अधिकतर कांग्रेसी सेवादल, युवक कांग्रेस, महिला कांग्रेस के उस दौर को फिर जिन्दा कर पाएंगे जहां बड़े-बड़े शिविर और बैठकें जमीन पर होती थीं।

जबरदस्त अनुशासन और एक-दूसरे का सम्मान था। पद की गरिमा थी। पद प्रभाव से या जुगाड़ से नहीं कबाड़ा जाता था, बल्कि क्षमतावानों, ऊर्जावानों को ढ़ूढ़कर दिया जाता था। आज परिस्थितियां ठीक उलट है। देश, राज्य, जिलों में पार्टी के शीर्ष लंबरदारों को भले ही न दिखे, लेकिन पब्लिक सब जानती है कि उनके नगर, शहर या वार्ड का कौन सा कांग्रेसी, पार्टी के प्रति कितना आस्थावान है?

कौन विज्ञप्तिवीर है जो ऊंचे पदों पर बैठे आकाओं के चरणवंदन के सहारे और प्रायोजित या पेड न्यूज से खुद को महिमामंडित करा पार्टी में सुशोभित है। चिन्तन शिविर में इस पर भी कुछ मनन हुआ हो तो अच्छा है वरना ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, सुनील जाखड़ की उपेक्षाओं के उदाहरण सामने हैं।

भले ही राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस परिवारवाद के आरोपों से घिरी हो लेकिन सच को स्वीकारना होगा कि भाजपा में तय समय में देश से लेकर नगर तक पार्टी की कमान नए चेहरे को देकर जिस तरह लोगों को जोड़ा जा रहा है और कार्यकर्ताओं की फौज तैयार हो रही है वो गजब की सोशल इंजीनियरिंग है और बड़ा आकर्षण भी। जबकि कांग्रेस उन्हीं चेहरों से बाहर नहीं निकल पा रही है।

स्व. शरद जोशी भी अपना लिखा पढ़ ठहाके लगा रहे होंगे ‘कभी देश आगे बढ़ा, कभी कांग्रेस आगे बढ़ी, कभी दोनें आगे बढ़ गए, कभी दोनों नहीं बढ़ पाए, फिर यूं हुआ कि देश आगे बढ़ गया और कांग्रेस पीछे रह गई। यह कांग्रेस की महायात्रा है, खादी भंडार से आरंभ हुई और सचिवालय में समाप्त हो गई।’

लोकतंत्र के लिए मतदाता की नकेल अहम है। काश, कांग्रेस समझती और इस भ्रम से बाहर आ पाती कि लोकतंत्र को कम से कम दो मजबूत पार्टियों की जरूरत है।


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