- अभ्यासरत खिलाड़ी खुद ही एकलव्य बनने का कर रहे प्रयास
- केंद्र, यूपी सरकार दे रही खिलाड़ियों को बढ़ावा, खेल अधिकारी ही लगा रहे पलीता
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: क्रांतिधरा पर प्रतिभाओं की कमी नहीं हैं। दिक्कत है तो सिर्फ प्रतिभाओं को तराशने की। कैलाश प्रकाश स्टेडियम पर प्रति वर्ष सरकार करोड़ों रुपये खर्च करती हैं, लेकिन कलयुग में द्रोणाचार्य स्टेडियम के पास नहीं हैं। प्रशिक्षक है नहीं, खुद ही खिलाड़ी अभ्यास कर प्रशिक्षण ले रहे हैं। अभ्यास कर खुद खिलाड़ी ‘एकलव्य’ बनने की दिशा में प्रयासरत हैं। यह हाल है उस स्टेडियम का, जिसका कभी पूरे पश्चिमी यूपी में नाम होता था।
खिलाड़ी खुद ही अभ्यास करते है तथा सफाई करने के लिए भी विवश हैं। सफाई तक स्टेडियम की तरफ से नहीं करायी जा रही हैं। इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन हैं? क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई की जाएगी? केन्द्र और यूपी सरकार खेल और खिलाड़ियों को बढ़ावा दे रही हैं, लेकिन सरकार की खेल योजनाओं को खेल अधिकारी पलीता लगाने से बाज नहीं आ रहे हैं।
आर्चरी का कोच तक कैलाश प्रकाश स्पोर्ट्स स्टेडियम के पास नहीं हैं। अब इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तरह से खिलाड़ी आगे बढ़ रहे हैं। कोच है नहीं, सफाई करने के लिए खुद ही विवश हैं। इस तरह से तो खिलाड़ी बनने से रहे। फिर रही सही जिला खेल अधिकारी पूरी कर देते हैं। फाइलों को रोक कर बैठ जाते हैं। यही नहीं, अन्य कोच भी इसमें खिलाड़ियों का प्रशिक्षण देने के लिए लगाये जा सकते हैं, लेकिन यहां का तो हाल ही बुरा हैं।

पश्चिमी यूपी में मेरठ से हर साल प्रतिभावान खिलाड़ी निकलते हैं। यह खिलाड़ी तमाम प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर पदक जीतकर लाते हैं, लेकिन, जनपद के कैलाश प्रकाश स्पोर्ट्स स्टेडियम में कोच न होने के चलते यहां के खिलाड़ियों ने जो सपने बुने थे, वो टूट रहे हैं। खिलाड़ियों का कहना है कि वो कोच नियुक्त किए जाने के लिए अधिकारियों से कई बार गुहार लगा चुके हैं, लेकिन, आश्वासन के अलावा अभी तक इस बारे में कोई विचार नहीं किया गया है।
सरधना के सवाला में स्पोर्टस यूनिवर्सिटी की स्थापना तो की जा रही है, लेकिन यहां बने कैलाश प्रकाश स्पोर्ट्स स्टेडियम के हालातों पर क्यों ध्यान नहीं दिया जा रहा हैं, यह बड़ा सवाल है। कोच लंबे समय से नहीं है। आखिर इसके लिए जवाबदेही किसकी हैं? कोच को संविदा पर रखा जा सकता हैं, मगर यहां तो इस दिशा में भी कदम नहीं बढ़ाये जा रहे हैं। पूछने पर जिला खेल अधिकारी तर्क देने लगते हैं, लेकिन सुविधाओं पर कोई बात ही नहीं करते।
इससे जनपद के भावी खिलाड़ियों को प्रशिक्षण नहीं मिल रहा है। खिलाड़ी खुद ही लक्ष्य पर निशाना साधने के लिए दिन भर जुटे रहते हैं, लेकिन इसमें कितने कामयाब होंगे, यह तो समय ही बतायेगा, लेकिन खुद ही प्रशिक्षण का कितना लाभ मिलेगा, फिलहाल यह कहना मुश्किल हैं।
भेदने में लगे हुए हैं। इसके अलावा उन्हें सीनियर खिलाड़ियों का कुछ सहयोग मिलता रहता है। खिलाड़ी बताते हैं कि उन्हें आवश्यक खेल सामग्री भी उपलब्ध नहीं कराई जाती। सभी खिलाड़ी चंदे के पैसे इकट्ठा कर जरूरत का सामान खुद ही लेकर आते हैं। ये हालात है स्पोर्ट्स स्टेडियम के। आखिर इसके जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई की जाएगी। ये खिलाड़ी चंदा एकत्र करते है, उसी से अपना काम चलाते हैं।
क्षेत्रीय क्रीड़ाधिकारी गदाधर बारीकी ने भी खिलाड़ियों को सुविधा उपलब्ध कराने की तरफ से मुंह मोड रखा हैं। खिलाड़ियों को खुद के हाल पर छोड़ दिया गया है। यहां कुल 15 खेलों में प्रशिक्षण की सुविधा है। बाकी खेलों के लिए प्रशिक्षक तक नहीं हैं। प्रशिक्षक मिलने की उम्मीद के दावे किये जाते हैं, मगर प्रशिक्षक नहीं मिले। इसमें क्षेत्रीय क्रीडाधिकारी की भी बड़ी लापरवाही सामने आ रही हैं।

