Wednesday, April 15, 2026
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क्रांतिधरा के चार साहित्यकारों को मिला पुरस्कार

  • किशन स्वरूप और शिवानंद सिंह सहयोगी को साहित्य भूषण पुरस्कार
  • आईजी प्रवीण कुमार और कवि अरुण कुमार मानव को सर्जना पुरस्कार

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: क्रांतिधरा के चार साहित्यकारों को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के द्वारा मंगलवार को विभिन्न पुरस्कार प्रदान करने की घोषणा की गई है। इसमें ढाई लाख रुपये की पुरस्कार राशि वाला साहित्य भूषण सम्मान शिवानंद सिंह सहयोगी, किशन स्वरूप, सर्जना पुरस्कार पुलिस महानिरीक्षक प्रवीण कुमार और अरुण कुमार मानव को प्रदान किया गया है। पुरस्कार की घोषणा होते ही सभी विजेताओं के घरों में बधाइयोंं का तांता लग गया। एक शहर से चार लोगोंं को पुरस्कार मिलना बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

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अलीगढ़ के रहने वाले किशन स्वरुप ने 14 साल की उम्र से लिखना शुरू कर दिया था। बिजली विभाग में 35 साल नौकरी करने के दौरान साहित्य की खुलकर सेवा की। जूनियर इंजीनियर से लेकर महाप्रबंधक तक के सफर में किशन स्वरुप ने कविता और गजलों पर ज्यादा जोर दिया। उनके काव्य संग्रहों में संबोधन, संभावना, पथ के पांवड़े, गजल संग्रहों में बूंद बूंद सागर में, जमीन की तलाश में, घुटन और घुटन, आसमान मेरा भी है, समेटे हुए पल, तन्हा सफर, दर्द के पैबंद, अगला पड़ाव, क्या नाम दूं, गजाला, मां, फिर एक बार, अनायस, आहट, कशमकश, दुविधा, दरीचे, परिन्दे, किसके आगे हाथ पधारें, जो है सो है, अहसास, कल से कल तक और गहरे पानी पैठ जैसे संग्रह लिखे हैं।

उनकोे पन्द्रह से अधिक सम्मान मिल चुके हैं। पुरस्कार की घोषणा पर किशन स्वरुप और उनका परिवार बेहद खुशी महसूस कर रहा है। उनके दोस्तों और प्रशंसकों के द्वारा बधाइयों का सिलसिला लगातार चल रहा है। बलिया के रहने वाले शिवानंद सिंह सहयोगी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं और उनको साहित्य सृजन का शौक शुरू से रहा है। उनके काव्य संग्रह एक शून्य, जीवन की हलचल, गांव वाला घर, समय की पुकार, मां जीत ही जाएगी, बिखरा आसमान के अलावा घर मुंडेर की सोन चिरैया, दुमदार दोहे, मेरे गीतों का पाथेय संग्रह, यादों के पंछी, कुंडलियों का गांव, सूरज भी क्यों बंधक काफी सराही गई थी।

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इसके अलावा भी उनके तमाम गीत और नवगीत प्रकाशित हो चुके हैं। उनको टोंटी वाला नल और यह तो सच है प्रकाशित होने वाला है। वह पच्चीस से अधिक साहित्यिक संस्थाओं और गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। इसके अलावा तमाम ई पत्रिकाओं पर लगातार लिख रहे हैं। इसके अलावा अरुण कुमार मानव को डा. रांगेय राघव पुरस्कार उनकी पुस्तक आजाद हवायें के लिये मिला है। उनको पुरस्कार राशि के रुप में चालीस हजार रुपये मिले हैं।

‘वह एक और मन’ के लिए आईजी को पुरस्कार

आईजी प्रवीण कुमार जहां एक कुशल आईपीएस अफसर हैं तो वहीं उनकी जिÞन्दगी का एक पहलू साहित्य से जुड़ा है। सख्त पुलिस अधिकारी होने के साथ कानून की किताबें लिखने का शौक है और उनका एक नया चेहरा लोगों के सामने तब आया जब उनको हिंदी साहित्य संस्थान की तरफ से उनके काव्य संग्रह ‘वह एक और मन’ विजयदेव नारायण साही पुरस्कार से नवाजा गया। खुद आईजी प्रवीण कुमार ने ट्वीट कर इस बात की जानकारी दी है। उन्होंने लिखा कि उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान को कोटिश: आभार!

एक पुलिस अफसर की जिन्दगी का ये कोना कितना साहित्यिक है। आईजी प्रवीण कुमार ने ट्वीटर पर इन कविताओं को शेयर किया है। जैसे एक कविता में कवि प्रवीण कुमार कहते हैं कि इजहार करने के भी सलीके हुआ करते हैं, वरना फर्क कहां आदमी और लाश में है। कहने लिखने के पहले जरा सोच लो, कहीं वो न बिछड़ जाए तो तेरे पास में है….एक अन्य कविता में वो लिखते हैं, कि जिन्दगी में कभी यूं भी किया जाता है, वफा मिले न मिले साथ लिया जाता है, जब दूसरा पैर ही पहले की खिलाफत कर दे, तब कदमों से नहीं हौसलों से चला जाता है।

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एक अन्य कविता में कवि प्रवीण कुमार लिखते हैं कि क्षण भर सी ये दुनिया है पर क्षण क्षण का इसमें मतलब है,उतनी ही दुनिया मान करे जितना कृतित्व में करतब है। आईजी प्रवीण कुमार को मिले इस सम्मान से ट्वीटर पर उनके चाहने वालों में बधाई देने वालों का तांता लगा है। सभी बहुत बहुत शुभकामनाएं देते हुए नजर आ रहे हैं। किताब का शीर्षक वह एक और मन भी साहित्य प्रेमियों को खासा लुभा रहा है।

दैनिक जनवाणी को उन्होंने बताया कि ग्रेजुएशन के बाद लिखने का शौक शुरु हुआ था जो बदस्तूर जारी है। कानून की किताबें लिखने का शौक है। एक किताब पहले छप चुकी है और दूसरी किताब रेवन्यू लॉ पर लिख रहे हैं। उनकी किताब ‘वह एक और मन’ गत वर्ष 15 अगसत को प्रकाशित हुई थी। उनका कहना है साहित्य सृजन आगे भी चलता रहेगा।

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