Wednesday, March 18, 2026
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खिंच गई देवबंद और सरकार के बीच लकीर!

  • उलेमाओं के सम्मेलन में पारित प्रस्तावों में ‘षड्यंत्रकारी’ शक्तियों से लड़ने का आह्वान
  • छोटे मदरसे और खोलने पर जोर देने वाला बयान सरकार को घेरने की कोशिश तो नही

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: दो दिन पूर्व विश्व प्रसिद्ध दारुल उलूम देवबंद में आयोजित मदरसों के राष्ट्रीय सम्मेलन में जिस तरह उलेमाओं ने तेवर दिखाए उससे देवबंद और सरकार के बीच एक लकीर खिंचती हुई दिख रही है। पूर्व में आयाजित हुए प्रदेश स्तरीय सम्मेलन में उलेमाओं के तेवर नरम थे लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर हुए हालिया सम्मेलन में उलेमाओं के तेवर जरुर तल्ख दिखे। यह तल्खी सीधे सीधे मदरसों में सरकारी हस्तक्षेप पर केन्द्रित रही।

इस सम्मेलन में वैसे तो कई प्रस्ताव पास किए गए हैं, लेकिन इनमें से दो तीन प्रस्ताव ऐसे हैं जिनका यदि विश्लेषण किया जाए तो प्रतीत होता है कि अब देबवंद और सरकार के बीच की खाई गहरी हो सकती है। पास किए गए प्रस्तावों में मदरसा संचालकों का आह्वान किया गया है कि ‘षड्यंत्रकारी शक्तियों को जवाब दिया जाएं।

अब देवबंद (दारुल उलूम) की निगाह में ‘षड्यंत्रकारी शक्तियां’ कौन सी हैं इसका पता तो राजनीतिक विश्लेषक ही बेहतर बता सकते हैं, लेकिन इतना जरूर है कि देबवंद कहीं न कहीं घुमा फिरा कर सरकार पर दोषारोपण करन चाहता है। एक प्रस्ताव ये भी पारित हुआ है कि अब दीनी मकतब (छोटे छोटे मदरसे) खोलें जाएं।

यानि कि सरकार को सीधा चेलेंज कि यदि मदरसों पर अंगुली उठाई जाती है तो मकतब के रूप में और मदरसे खोल दिए जाएंगे। यहां गौर करने वाली बात यह है कि ‘मकतब’ शब्द का इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है। दरअसल, मकतब उस संस्थान को कहते हैं जहां छोटी जगहों में मदरसों को कायम किया जाता है और यहां छोटे छोटे बच्चों को दीनी तालीम दी जाती है।

यह मकतब मस्जिदों में भी खोले जाते हैं। सरकार को एक और सीधा चेलेंज दिया गया और कहा कि मदरसों को न तो कोई मान्यता की जरुरत है और न ही सरकारी मदद की। यहां यह बात काबिल ए गौर है कि उत्तर प्रदेश के दोनों डिप्टी सीएम यह साफ कर चुके हैं कि बिना मान्यता के मदरसों को अवैध माना जाएगा और उनके उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई भी संभव है।

सम्मेलन में एक और बात साफ साफ कही गई कि हमें लैपटॉप वाले लोगों की जरूरत नहीं क्योंकि हमारी पढ़ाई अल्लाह के रास्ते के लिए है। यह भी कोड किया गया कि हमें तकनीक की जरुरत नहीं बल्कि पांच वक्त की नमाज पढ़ाने वालों की जरुरत है।

यह भी कहा गया कि हमारी पढ़ाई मुलाजमत (नौकरी) के लिए नहीं बल्कि अल्लाह के रास्ते के लिए हैं। यानि कि सीधे सीधे इस राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन में उलेमाओं ने एक बार फिर से लोगों के दिलों दिमाग में रुढ़िवादिता पनपाने का बीज बोने का काम कर दिया।

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